सरकार ने हालात से निपटने को तैयार की रणनीति
03 अप्रैल, 2025 – नई दिल्ली : (विवेक तिवारी) : जलवायु परिवर्तन के चलते आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा संकट पैदा हो सकता है। सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक बदलते मौसम के चलते आने वाले समय में गेहूं और चावल के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से वर्षा पैटर्न पूर्वानुमान और फसल उपज पर किए गए अध्ययन के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के चलते वर्षा आधारित चावल के उत्पादन में 2050 तक 20 फीसदी तक, वहीं सिंचित खेती में 5 फीसदी तक की कमी आ सकती है। इसी दौरान गेहूं का उत्पादन 19.3 फीसदी तक घट सकता है। सरकार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए सिंचाई के लिए जल प्रबंधन के साथ ही नई और बढ़ती गर्मी को बर्दाश्त करने वाली प्रजातियों को विकसित करने पर जोर दे रही है।
सरकार जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई तरह से तैयारी कर रही है। प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों एवं संवेदनशील जिलों एवं क्षेत्रों के लिए उपयुक्त जलवायु अनुकूल कृषि प्रौद्योगिकी विकसित की जा रही है। इसके तहत स्थान के आधार पर मिट्टी के पोषक तत्वों के प्रबंधन पर काम किया जा रहा है। वहीं अनुपूरक सिंचाई, सूक्ष्म सिंचाई, पानी की बेहतर निकासी, मृदा में सुधार आदि को बढ़ाने का भी प्रयास किया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल प्रोटोकॉल के मुताबिक कृषि में जोखिम और संवेदनशीलता का मूल्यांकन भी किया है। कुल 109 जिलों को अति उच्च और 201 जिलों को अत्यधिक संवेदना के तौर पर चिन्हित किया गया है। कुल 151 जिलों में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से अनुकूल उपाय अपनाए जा रहे हैं। मौसम की अनियमित स्थिति से मुकाबला करने के लिए कुल 651 जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजना भी विकसित की गई है।
हाल ही में सरकार की ओर से दी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप हो रही असमय बारिश और बढ़ती गर्मी से गेहूं के उत्पादन में गिरावट और स्वाद में बदलाव की आशंका है। कृषि मंत्रालय और देश के प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों की ओर से अगले दो दशकों में फसलों के उत्पादन मॉडलों पर किए गए अध्ययनों का यह परिणाम चिंताजनक है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा के किसान भी अपने अनुभव से इन अध्ययन रिपोर्ट से सहमत हैं। जलवायु परिवर्तन के इन दुष्प्रभावों से निपटने के लिए गर्मी सह सकने वाली किस्मों के बीज और बुवाई के कैलेंडर में बदलाव किया जा रहा है। इसके शुरुआती प्रयोग सकारात्मक हैं। तमाम अध्ययनों में खास तौर से फरवरी में बढ़ते तापमान पर चिंता जताई गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने देश के 573 ग्रामीण जिलों में जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि पर खतरे का आकलन किया है। इस आकलन के अनुसार 2020 से 2049 तक 256 जिलों में अधिकतम तापमान 1 से 1.3 डिग्री सेल्सियस और 157 जिलों में 1.3 से 1.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की उम्मीद है। इससे गेहूं की खेती प्रभावित होगी। इंटरनेशनल सेंटर फॉर मेज एंड व्हीट रिसर्च के प्रोग्राम निदेशक डॉ. पीके अग्रवाल के एक अध्ययन के मुताबिक तापमान एक डिग्री बढ़ने से भारत में गेहूं का उत्पादन 4 से 5 मिलियन टन तक घट सकता है। तापमान 3 से 5 डिग्री बढ़ने पर उत्पादन में 19 से 27 मीट्रिक टन तक कमी आएगी।
गेहूं में पोषक तत्व घटे, स्वाद पर भी असर
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और विधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल से जुड़े कई संस्थानों के वैज्ञानिकों के शोध में गेहूं और चावल में पोषण कम होने की बात सामने आयी है। इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता सोवन देबनाथ बताते हैं कि चावल व गेहूं में आवश्यक पोषक तत्वों का घनत्व अब उतना नहीं है, जितना 50 साल पहले होता था। इनमें मुख्य रूप से जिंक और आयरन की कमी हो गई है।
इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक नरेश कुमार कहते हैं, 2022 में मार्च के पहले सप्ताह से ही हीट वेव शुरू हो गई और पूरे महीने बनी रही। उससे गेहूं की फसल को काफी नुकसान पहुंचा। मौसम में इस बदलाव से गेहूं उत्पादन लगभग 40 लाख टन कम रह गया। 1976 से 2010 के औसत तापमान से अगर 2010 से 2040 तक के औसत तापमान का अनुमान लगाया जाए तो कहा जा सकता है कि इसमें एक से डेढ़ डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होगी। बारिश भी 6 से 12 फीसदी ज्यादा होगी। यह असमय गर्मी और तेज बारिश फसलों को काफी नुकसान पहुंचा सकती है। यह भी संभव है कि कई रोज बहुत बारिश हो जाए और बाकी महीना सूखा रहे। अध्ययन बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के चलते विभिन्न फसलों का उत्पादन 5 से 6 फीसदी तक कम हुआ है। कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझने के लिए 2016 की एक सरकारी रिपोर्ट का जिक्र करना ठीक होगा। इसमें अनुमान लगाया गया है कि तापमान में 2.5 डिग्री से 4.9 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होने पर चावल की पैदावार 32-40 प्रतिशत और गेहूं की 41-52 प्रतिशत कम हो जाएगी।
पांच साल से फरवरी में बढ़ रही है गर्मी
केरल कृषि विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के फैजाबाद कृषि विश्वविद्यालय और हरियाणा के हिसार स्थित कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने 1970 से 2019 के डेटा का अध्ययन किया। इससे पता चलता है कि फरवरी में न्यूनतम तापमान 5 से 8 डिग्री के बीच रहता है। लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान फरवरी में कई दिन औसत तापमान इससे 5 डिग्री तक ज्यादा दर्ज किया गया। सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राईलैंड एग्रीकल्चर के वैज्ञानिक डॉ. चंद्रशेखर के मुताबिक, पूर्वी उत्तर प्रदेश में फरवरी में बढ़ते तापमान ने गेहूं की फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। इस साल 14 फरवरी से 11 मार्च तक रात में तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया गया। 30 जनवरी को रात का तापमान सामान्य से 7.5 डिग्री अधिक था।
बचाव के लिए समय में करना होगा बदलाव
इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक नरेश कुमार कहते हैं, गेहूं और चावल की फसल पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए हमें कुछ बातों का ध्यान रखना होगा। सबसे पहले तो हमें गेहूं की बुआई समय से लगभग 15 दिन पहले करनी होगी। ऐसा करने से फरवरी में फसल में दाने तैयार हो चुके होंगे। तब गर्मी बढ़ने से उत्पादन पर असर कम होगा। किसानों को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि सरकार की ओर से जारी की गई गेहूं की हीट रजिस्टेंट किस्मों के बीज लगाएं। किसान किसी भी किस्म का बीज 4 साल से ज्यादा न लगाएं। बीज पुराना होने पर उत्पादन में कमी आती है। फसल को किस पोषक तत्व की जरूरत है, इसका खास ख्याल रखना होगा। इन बातों का ध्यान रखा जाए तो 2040 तक गेहूं उत्पादन 15 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. भान भी कहते हैं कि गेहूं की बुवाई समय से करीब 15 दिन पहले की जाए तो फसल को बढ़ती गर्मी से बचाया जा सकता है। अगर फसल तैयार होते समय गर्मी काफी बढ़ जाए तो बेहतर पोषण और सिंचाई बढ़ाकर नुकसान को कम किया जा सकता है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक गेहूं पूरी दुनिया की 20 फीसदी खाद्य जरूरत पूरी करता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते सदी के अंत तक दुनिया का आधा से अधिक गेहूं उत्पादन प्रभावित हो सकता है। यह रिपोर्ट साइंस एडवांस पत्रिका में प्रकाशित हुई है। वर्ष के उस समय सूखे की स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक मॉडल बनाया गया जब गेहूं उगाया जाता है, फिर 27 जलवायु मॉडल से सिमुलेशन कर विश्लेषण किया गया। परिणाम बताते हैं कि अगर जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो ग्लोबल वार्मिंग दुनिया के 60% गेहूं उगाने वाले क्षेत्रों में बड़े सूखे का कारण बन सकती है।
सौजन्य : दैनिक जागरण
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