छोटी गिरफ्तारियों का दावा, बड़े माफिया अब भी आज़ाद
पंजाब सरकार युद्ध नशे के खिलाफ अभियान का दावा करती है, लेकिन सच्चाई यह है कि ज्यादातर गिरफ्तारियां छोटे आरोपियों की हो रही हैं। बड़े तस्कर और राजनीतिक संरक्षण वाले माफिया आज भी सुरक्षित हैं।
03 नवंबर, 2026 – चडीगढ़ : पंजाब सरकार युद्ध नशियां विरुद्ध अभियान चला कर हजारों आरोपियों की गिरफ्तारी के दावे करती है पर सच्चाई यह है कि ये गिरफ्तारियां अधिकतर छोटे मोटे आरोपियों की हो रही है जबकि बड़े मगरमच्छ आज भी मौज़ कर रहे हैं।
समय के साथ गहरी हुई जड़ें
पंजाब की पवित्र धरती पर नशे की बीमारी कोई रातों-रात पैदा हुई समस्या नहीं है। यह एक ऐसी धीरे-धीरे फैलने वाली बीमारी है, जिसकी जड़ें समय के साथ गहरी होती गईं, लेकिन आज के दौर में इसने ऐसे भयानक पैर पसार लिए हैं कि यह एक स्वस्थ समाज के लिए नासूर बन चुकी है।
पंजाब के गांवों में पुराने समय के पारंपरिक नशे, जैसे कि भुक्की (डोडा) या शुद्ध अफीम जैसी चीज़ों का इस्तेमाल ज़्यादातर शौकिया, थकावट मिटाने या बड़ी उम्र के लोगों तक सीमित था। परंतु समय के चक्र ने ऐसा मोड़ लिया कि इन पारंपरिक नशों की जगह अब बेहद घातक और ज़हरीले सिंथेटिक नशों जैसे ‘चिट्टा’ (हेरोइन), ‘स्मैक’, ‘मेडिकल नशे’ और फार्मास्युटिकल ओपियोइड्स ने ले ली है।
पिछले पंद्रह-बीस वर्षों के काले दौर में सिंथेटिक नशों का यह कारोबार तेजी से बढ़ा है। आज पंजाब के हर गांव और हर गली में नशे की ओवरडोज के कारण हो रही मौतें रोज़ाना अखबारों की सुर्खियां बनती हैं।
40 प्रतिशत आरोपी नशा पीड़ित
सवाल यह पैदा होता है कि लगातार पुलिस कार्रवाइयों, रोज़ाना के मुकदमों और गिरफ्तारियों के दावों के बावजूद यह ज़हर खत्म क्यों नहीं हो रहा? इसके मास्टरमाइंड, सफेदपोश नेता, भ्रष्ट अफसरशाही और बड़े तस्कर हमेशा कानून की लंबी पहुंच से बाहर क्यों रहते हैं? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक 40 प्रतिशत से अधिक गिरफ्तारियां सिर्फ नशा करने वाले बीमार पीड़ितों की होती हैं— जिन्हें सजा की नहीं बल्कि इलाज की ज़रूरत है। दूसरी ओर, असली सप्लाई चेन चलाने वाले बड़े माफिया राजनीतिक संरक्षण के तहत ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी जी रहे हैं।
राज्य की बेरोजगारी दर भी उच्च स्तर पर
इस भयानक तबाही के मूल में यदि सबसे बड़ा आर्थिक कारण देखा जाए, तो वह है बेरोजगारी और भविष्य का अंधेरा। अप्रैल से जून 2026 के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार पंजाब में बेरोजगारी की स्थिति बहुत ही चिंताजनक और भयानक रूप धारण कर चुकी है: कुल युवाओं में बेरोजगारी दर 22.3 प्रतिशत है (जबकि राष्ट्रीय औसत 15.9 प्रतिशत है)।
चुनावों में नशे का प्रचलन
पंजाब में राजनीतिक नैतिकता का स्तर इतना गिर चुका है कि पंचायत चुनावों से लेकर संसदीय चुनावों तक नशे, शराब और पैसे के खुलेआम इस्तेमाल के आरोप लगते हैं। अगर पंजाब को इस नासूर से बचाना है और इसकी जवानी को वापस पटरी पर लाना है, तो सिर्फ पुलिस की लाठी वाली ताकत से काम नहीं चलेगा। मेहनतकश जनता, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, वकीलों और युवाओं को अपने साझे संघर्षों का दायरा विशाल करना होगा। हमें एकजुट होकर नशा तस्करों और उनके संरक्षकों के घिनौने गठजोड़ का ज़ोरदार पर्दाफाश करना चाहिए।
पांचजन्य