हाल ही में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, अयोध्या मंदिर और महाकुंभ जैसे आयोजनों में युवाओं की बढ़ती भागीदारी भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के प्रति उनके गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। इंटरनेट मीडिया पर भी वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को साझा कर रहे हैं। सद्गुरु और प्रेमानंद जी महाराज जैसे आध्यात्मिक गुरुओं से प्रेरित होकर, युवा तीर्थयात्राओं और धार्मिक स्थलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल रहा है। यह प्रवृत्ति भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक सकारात्मक संकेत है।
डॉ. आशीष त्रिपाठी

हाल में गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर में चार दिवसीय ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का आयोजन किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सम्मिलित हुए। यह उत्सव भारत के लोगों और भारत की सभ्यता की जीवटता का सर्वोत्तम प्रमाण है। इस देश को अनेक आततायियों ने लूटा, यहां के लोगों पर बर्बरता की और यहां की सभ्यता को नष्ट करने के क्रूर प्रयास किए, लेकिन भारत की संतति ने संघर्ष किया और बार-बार उठ खड़े होकर अपनी अमूल्य धरोहर को संजोने और संरक्षित करने का अटूट प्रयास किया। पिछले एक दशक में देश ऐसी कई घटनाओं का साक्षी रहा है जिसमें भारत के खोए हुए स्वाभिमान और गौरव को पुनः प्रतिष्ठित किया गया है।
अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण इस बात का अनुपम उदाहरण है। एक बड़े संघर्ष के बाद जब यहां मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ तो रामलला के दर्शन लाभ के लिए देश-विदेश से श्रद्धालुओं का आगमन हुआ। आज भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। इन श्रद्धालुओं में सर्वाधिक संख्या देश के युवाओं की है। पिछले वर्ष प्रयागराज में हुए महाकुंभ में करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इन श्रद्धालुओं में भी देश के युवा वर्ग की संख्या सर्वाधिक देखी गई। इस प्रकार के धार्मिक आयोजनों में भारत के युवाओं की बढ़ती सहभागिता देखना अपने आप में एक बहुत ही सुखद अनुभव है। इंटरनेट मीडिया के इस युग में युवा अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को लेकर बहुत ही मुखर हैं। वे इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विषय में अपने विचार साझा कर रहे हैं।
हाल के वर्षों में धार्मिक यात्राओं और भारत के तीर्थों पर पहुंचने वाले तीर्थयात्रियों में देश के युवा वर्ग की भागीदारी बड़ी मात्रा में देखी जा सकती है। भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर देश के कोने-कोने से युवा पहुंच रहे हैं। तकनीकी, मेडिकल, प्रबंधन, मानविकी और दूसरे अनेक क्षेत्रों में शिक्षा हासिल कर रहे ये नौजवान अध्यात्म और धर्म को लेकर बहुत ही आग्रही दिखाई पड़ते हैं। वे हर वर्ष ग्रीष्मकाल में होने वाली चार धाम यात्रा में जा रहे हैं। वे प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में केदारनाथ धाम जाने के लिए दुर्गम पहाड़ी मार्गों पर ट्रैकिंग करते हुए दिखाई देते हैं। वे अपनी इन यात्राओं की सुंदर स्मृतियों को इंटरनेट मीडिया पर भी साझा करते हैं और दूसरों को भी ऐसी आध्यात्मिक-धार्मिक यात्रा के लिए प्रेरित करते हैं। भारत के सुदूर इलाकों में स्थित मंदिरों, मठों और आश्रमों तक इन युवाओं की पहुंच के कारण आसपास के स्थानीय लोगों को सामाजिक और आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो रहे हैं।

पिछले दिनों उत्तराखंड सरकार के एक सर्वे में उत्तराखंड के प्रसिद्ध कैंची धाम के विषय में कुछ आंकड़े सामने आए जिससे यह पता चलता है कि बाबा नीब करौरी के इस स्थान पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। इन श्रद्धालुओं में अधिकतम संख्या 15 से 30 वर्ष के युवाओं की है। इससे यह भी पता चला कि यहां आने वाले युवा आध्यात्मिक उन्नति और शांति के लिए ऐसे स्थानों पर प्रवास करते हैं। सूचना के अनगिनत माध्यमों ने भारत की धार्मिक और आध्यात्मिक जगत की जानकारी हर वर्ग और समूह तक पहुंचा दी है, जिससे प्रभावित होकर आज की युवा पीढ़ी ऐसे स्थानों पर जा रही है और संस्कृति का विस्तार कर रही है।
आज भारत के संतों और आध्यात्मिक चिंतकों के विचारों से प्रभावित होकर भी युवा आध्यात्मिक धारा से जुड़े रहे हैं। जैसे कि ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव अपने संबोधनों में अध्यात्म को विज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। वे वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से आध्यात्मिकता के सूक्ष्म सूत्रों को उद्घाटित करते हैं। उनके अभियानों और आयोजनों में हजारों की संख्या में युवक-युवतियां सहभागी होते हैं। वृंदावन में निवास करने वाले सुप्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज के विचारों से भी सैकड़ों की संख्या में लोग प्रेरित हो रहे हैं। प्रेमानंद जी अपने वक्तव्यों में धर्म को सेवा और आचरण से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। उनकी कही बातों का प्रभाव युवाओं पर खासा दिखाई पड़ता है।
आज भारतीय समाज में इस प्रकार के सकारात्मक परिवर्तन बेहद सुखद और संतोषप्रद हैं। दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक उथल-पुथल है और वहां का युवा वर्ग हिंसक आंदोलनों में सड़कों पर है। ऐसी परिस्थिति में भारत के युवाओं का अपनी जड़ों से जुड़ना और आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ना एक अच्छा संकेत है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘अपने राष्ट्र को, इसकी महान संस्कृति को, इसकी सभ्यता, यहां के धर्म को जानो और अपने महिमापूर्ण अतीत को मत भूलो, स्मरण करो कि हम कौन हैं? किन महान पूर्वजों का रक्त हमारी शिराओं में प्रवाहित हो रहा है? एक ऐसे महान भारत की नींव रखो, जो विश्व का पथ-प्रदर्शन कर सके।’
इससे प्रेरित हो देश की युवा पीढ़ी योग, ध्यान और आध्यात्मिकता को अपने जीवन में आत्मसात कर, अपने महान पूर्वजों को स्मरण कर देश के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक अमूल्य योगदान दे रही है। भारत की पुरातन सभ्यता और संस्कृति से आज के समाज का पुनर्जागरण हो रहा है। यह परिवर्तन भारत को एक नई दिशा दे रहा है और नए भारत का निर्माण कर रहा है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)
दैनिक जागरण