जिस कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम्’ गूंजा, उसी कांग्रेस ने मौलाना सैयद मुहम्मद अली की राय को संपूर्ण मुस्लिम समुदाय की भावना मान लिया। 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने गीत के तथाकथित ‘आपत्तिजनक अंशों’ को हटाने का निर्णय लिया। एक दशक बाद 1947 में मजहब के आधार पर देश का बंटवारा हुआ।

‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष केवल स्मरण का क्षण नहीं, बल्कि हम भारतीयों के लिए आत्मचेतना और एकात्मता के पुनर्जागरण का अवसर है। यह गीत हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व के उस भाव को प्रतिध्वनित करता है, जिसने विविध प्रांतों, भाषाओं और परंपराओं को एक साझा श्रद्धा-सूत्र में बांधा है। बंगाल की मिट्टी में जन्मी यह रचना धीरे-धीरे समूचे राष्ट्र की आत्मा बन गई। दक्षिण के संतों से लेकर उत्तर के क्रांतिकारियों और उत्तर-पूर्व के समर्पित युवाओं तक, सबको इसने मातृभूमि की एक ही पुकार में एकत्रित किया।
आज जब भाषा, जाति और क्षेत्र के आधार पर समाज को विभाजित करने वाली राजनीति सक्रिय दिखाई देती है, तब ‘वंदे मातरम्’ हमें स्मरण कराता है कि हमारी पहचान का आधार कोई भू-खंड नहीं, बल्कि भारत माता है-संस्कृति, स्मृति और संकल्प की वह शाश्वत शक्ति, जो हमें सदैव एक सूत्र में बांधती आई है। यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आध्यात्मिक ध्वजा बनकर उभरा। इसने भारत को केवल एक भू-राजनैतिक सत्ता नहीं, बल्कि मातृछाया के रूप में देखा-एक ऐसी आध्यात्मिक सत्ता, जो समर्पण और स्वाभिमान का प्रतीक है। यही कारण था कि यह गीत क्रांति के रण में भी गूंजा और मौन तप में भी।
आज के संदर्भ में ‘वंदे मातरम्’ आत्मनर्भरता, स्वदेशी नवाचार और राष्ट्रीय स्वाभिमान का मंत्र बन गया है। यह भारत भूमि का वह उद्घोष है, जिसकी भावना सीमाओं से परे जाकर समूची मानवता को प्रेरित कर सकती है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने 28 अक्तूबर, 1916 को अपने पुत्र रथींद्रनाथ को लिखे पत्र में कहा था, ‘‘हमारा ‘वंदे मातरम्’ मंत्र किसी प्रांत की मिट्टी की आराधना नहीं, बल्कि धरती माता का वंदन है। यदि हम इसे सही अर्थों में साध लें, तो भविष्यकाल में यह मंत्र केवल भारत में नहीं, संपूर्ण विश्व में अनुगूंजित होगा।’’
वैदिक उद्घोष ‘माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या’ (पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं) धरती को देखने का सनातन भाव है। इसलिए यह कोई राजनीतिक उद्घोष नहीं था, ऋषि-स्वभाव से निकला हुआ कथन था। यह वह चेतना थी, जो भारत को जगतगुरु मानती है और राष्ट्रभक्ति को विश्व कल्याण का माध्यम समझती है। ‘वंदे मातरम्’ केवल राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का शाश्वत आह्वान है। किंतु प्रश्न उठता है, जिस गीत में विश्व के लिए करुणा थी, समस्त वसुधा के लिए आत्मीयता थी, उसी के स्वरों को सबसे पहले आघात कहां से पहुंचा?
उत्तर स्पष्ट है-जहां सत्ता की राजनीति ने राष्ट्रभाव से ऊपर स्वयं को प्रतिष्ठित किया, वहीं इस गीत के मूलभाव को विखंडित कर दिया गया। कांग्रेस ने अपने अधिवेशनों में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गायन पर रोक लगा दी। यह विरोध अचानक नहीं फूटा। यह तुष्टिकरण से से शुरु हुआ, असहिष्णुता में बदला और अंततः सांस्कृतिक आत्मसमर्पण में परिणत हुआ। कांग्रेस ने मौलाना सैयद मुहम्मद अली की राय को संपूर्ण मुस्लिम समुदाय की भावना मान लिया और परिणामस्वरूप 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने गीत के तथाकथित ‘आपत्तिजनक अंशों’ को हटाने का निर्णय लिया। उसी क्षण राष्ट्रवादी चिंतक रामानंद चट्टोपाध्याय ने चेताया था, “यदि यह गीत विभाजित होता है, तो यह देश भी विभाजित हो जाएगा।” उनकी यह चेतावनी अब इतिहास के पन्नों पर अंकित है। पर उस समय, सत्ता के मोह ने चेतना की आवाज को मौन कर दिया था। सत्य यह है कि जब किसी राष्ट्र की आत्मा को उसके ही गीत से काटा जाता है, तब विभाजन केवल भू-रेखाओं का नहीं, आत्माओं का होता है।
‘वंदे मातरम्’ को जिसने मातृभूमि की भक्ति के रूप में देखा, उसके लिए यह आराधना थी और जिसने इसे सत्ता की दृष्टि से मापा, उसके लिए यह विवाद बना। सत्य यह है कि यह गीत आज भी हमें उस एकात्म चेतना की याद दिलाता है, जो भारत को विश्व बंधुत्व का मार्ग दिखाती है।
कभी सोचा है? जिनके मन में राष्ट्र नहीं, केवल सत्ता थी, उन्होंने पहले ‘वंदे मातरम्’ को विभाजित किया और उसी विभाजन की मानसिकता ने आगे चलकर भारत के वास्तविक विभाजन का मार्ग तैयार किया। जहां राष्ट्रभाव कमजोर पड़ा, वहीं विभाजन की रेखा खिंची और जहां मातृभूमि के प्रति निष्ठा डगमगाई, वहां राजनीति टुकड़ों का खेल बनकर रह गई।
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं था, वह भारत की आत्मा की वह लय थी, जो मानवता के सामने उसकी अध्यात्म चेतना को प्रकट करने जा रही थी। वह एक ऐसा घोष, जिसे सीमाओं से परे जाकर विश्व में गूंजना था। परंतु कांग्रेस की संकीर्ण दृष्टि ने उस स्वर को बार-बार कुंठित किया। जिस गीत ने भारतीय जनमानस को एक सूत्र में बांधा, उसी को विवाद का विषय बना कर राष्ट्र की आत्मा पर प्रहार किया गया। यही वह क्षण था, जब सत्ता की राजनीति ने संस्कृति की साधना को परास्त कर दिया।
आज जब हम ‘वंदे मातरम्’ का स्वर फिर से बुलंद करते हैं, तो यह केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की पुनर्प्राप्ति है। यह वह जागरण है, जो हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र मात्र कोई सत्ता-तंत्र नहीं होता-वह उन सब व्यवस्थाओं से ऊपर, हमारी चेतना का सर्वोच्च केंद्र होता है। ‘वंदे मातरम्’ उसका प्राण-मंत्र है। वह गीत, जो कभी विभाजन की राजनीति के विरुद्ध दृढ़ होकर खड़ा था, वही आज पुनः राष्ट्रीय एकता का शंख बनकर गूंज रहा है। यह गीत हमें सिखाता है कि जहां भूमि को माता माना जाता है, वहां मनुष्य केवल नागरिक नहीं रहता, वह उत्तरदायी पुत्र बन जाता है। और जहां पुत्र का कर्तव्य जीवित रहता है, वहां राष्ट्र अमर रहता है। ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, वह भारत की आत्मा का स्पंदन है, जो हर पीढ़ी को स्मरण कराता है कि मातृभूमि से प्रेम ही राष्ट्र के अमरत्व का सूत्र है।
लंका विजय के बाद जब विभीषण ने राम से लंका का राजपाट संभालने को कहा, तो राम ने उन्हें लंकापति कहकर सम्मानित किया और उनका राज्याभिषेक किया। फिर अपने अनुज लक्ष्मण से कहा- अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।
अर्थात् हे लक्ष्मण! यह लंका सोने से बनी है, फिर भी मुझे अच्छी नहीं लगती, क्योंकि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। राम के इस वचन में समस्त भारतीय संस्कृति का मर्म निहित है-भूभाग नहीं, भावना ही राष्ट्र है। यही भावना ‘वंदे मातरम्’ के स्वर में भी बहती है।
राम ने स्वर्ण-समृद्ध लंका को त्यागकर मातृभूमि के प्रति निष्ठा दिखाई और उसी निष्ठा का रुप भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में ‘वंदे मातरम्’ बनकर प्रकट हुआ। यह गीत याद दिलाता है कि राष्ट्र की पहचान उसकी सत्ता में नहीं, बल्कि उसके संस्कार में है। उसकी शक्ति उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके पुत्रों की भक्ति में है।
इसलिए जब आज हम ‘वंदे मातरम्’ गाते हैं, तो वह केवल स्वर नहीं, संकल्प है-मातृभूमि के प्रति उसी निष्ठा का, जिसने राम को वापस अयोध्या लौटने के लिए प्रेरित किया था और जिसने भारत को जगाया था।
पंचजन्य