ट्रंप की यह विदेश नीति न केवल दुनिया के प्रति अमेरिका की पारंपरिक भूमिका के मूल सिद्धांतों को चुनौती दे रही है, बल्कि आधुनिक विश्व व्यवस्था से जुड़ी व्यापक मान्यताओं को भी झकझोर रही है। दूसरों को नसीहत देने वाला अमेरिका अब खुद ही उन स्थापित परंपराओं को दरकिनार कर रहा है, जिनकी पैरवी वह खुद करता रहा है। इस परिवर्तन के प्रभाव बहुत दूरगामी होंगे।
हर्ष वी. पंत
अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल को एक साल बीत गया है। इस एक वर्ष के दौरान उन्होंने अपनी नाटकीय नीतियों से वैश्विक ढांचे की दशा-दिशा ही बदल दी है। यहां तक कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी भी उनके अप्रत्याशित रवैये से कुछ परेशान हो चुके हैं। महीनों तक नोबेल शांति पुरस्कार के लिए खुद ही अपनी पैरवी करते रहे ट्रंप ने नव वर्ष की शुरुआत में ही नए तेवर अपना लिए।
तीन जनवरी को वेनेजुएला में महज कुछ घंटों के दौरान ही सत्ता पलट करने में सफल रहे ट्रंप उसके बाद ईरान और ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामकता दिखाने लगे। बीते दिनों ईरान में अनियंत्रित हुए विरोध-प्रदर्शनों के निर्ममता से दमन को लेकर भी उन्होंने चेताया कि अगर सत्ता ने अपना शिकंजा और कड़ा किया तो वे कोई कड़ा कदम उठाने से संकोच नहीं करेंगे। जब हजारों की तादाद में प्रदर्शनकारियों के मारे जाने की खबरें आईं तो ट्रंप ने कहा कि अमेरिका कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है और ईरान को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी।
इसके लिए उन्होंने पिछले साल ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने का उदाहरण भी सामने रखा। ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान ने प्रदर्शनकारियों की हत्या और गिरफ्तार लोगों को फांसी दिए जाने जैसे आरोपों से इन्कार किया है और ट्रंप ने भी अपने निजी सूत्रों का हवाला दिया कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। यह बात अलग है कि ईरान में जिन लोगों एवं संस्थाओं पर प्रदर्शनकारियों के दमन और विदेशी बाजार में तेल की कालाबाजारी के आरोप हैं, उन पर ट्रंप प्रशासन ने नए सिरे से और कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इतना ही नहीं, ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाकर भी उन्होंने ईरान और उसके सहयोगियों को कड़ा संदेश दिया।
ईरान से इतर ग्रीनलैंड का मामला ट्रंप के नजरिये से कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिख रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इसमें उन्हीं देशों का अमेरिका के साथ टकराव बढ़ता दिख रहा है, जो द्वितीय महायुद्ध के बाद से ही अमेरिका के घनिष्ठ मित्र रहे हैं। ट्रंप इन देशों के साथ उसी आत्मीयता को तार-तार कर रहे हैं। उन्होंने एआइ जनित तस्वीर के माध्यम से पोस्ट किया कि 2026 से ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा बन गया है। वैसे ग्रीनलैंड के प्रति ट्रंप का यह नजरिया कोई नया नहीं है। अपने पहले कार्यकाल में भी ग्रीनलैंड का मुद्दा उनकी “राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति” का एक केंद्र बिंदु रहा है।
इसे अक्सर “डोनरो डोक्ट्रिन” के रूप में प्रस्तुत किया गया। वे आर्कटिक क्षेत्र को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मोर्चे के रूप में देखते हैं, जिसे किसी भी तरह अमेरिकी नियंत्रण में लाना आवश्यक है। ट्रंप प्रशासन शक्ति प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से भी अपने इस रुख को सही ठहराता है। ट्रंप बार-बार दोहराते रहे हैं कि ग्रीनलैंड रूसी और चीनी जहाजों से घिरा हुआ है और उसके पास स्वयं पर कब्जे के किसी प्रयास का प्रतिरोध करने की सैन्य क्षमता नहीं है। अमेरिका की सुरक्षा के लिए ट्रंप जिस महत्वाकांक्षी ‘गोल्डन डोम’ परियोजना पर काम कर रहे हैं, उसे सिरे चढ़ाने के लिए भी ग्रीनलैंड की जमीन की जरूरत पड़ेगी।
सामरिक बढ़त के अलावा संसाधनों की दृष्टि से भी ग्रीनलैंड का बहुत महत्व है। यह द्वीप उन दुर्लभ खनिजों और यूरेनियम के अकूत भंडारों का खजाना है, जो पर्यावरण अनुकूलन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए अहम उपकरणों से लेकर उन्नत रक्षा साजोसामान बनाने में काम आते हैं। हालांकि ट्रंप इसका उतना बखान नहीं करते, लेकिन ग्रीनलैंड में एक विशेष दूत की नियुक्ति और अमेरिकी संसद में ‘मेक ग्रीनलैंड ग्रेट अगेन’ एक्ट को बढ़ावा देना तो यही संकेत करता है कि इस द्वीप के संसाधनों के दोहन में उनकी गहरी रुचि है। यही कारण है कि ट्रंप ने ग्रीनलैंड के हर एक नागरिक को 10,000 से 100,000 डालर तक देने का प्रस्ताव दिया कि वे डेनमार्क से अलग होकर अमेरिका के साथ जुड़ जाएं। हालांकि उनके इस प्रस्ताव को नागरिक मंचों से लेकर नीति-नियंताओं ने भी खारिज कर दिया है।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के स्तर पर एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि 2025 में वे उसे यूरोपीय कमांड (ईयूकोम) की जगह उत्तरी कमांड (नार्थकोम) के अंतर्गत ले आए। इसके पीछे मुख्य विचार ग्रीनलैंड को यूरोप का एक हिस्सा मानने के बजाय उसे उत्तरी अमेरिका के रक्षा कवच के रूप में देखना था। देखा जाए तो ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है, लेकिन एक यूरोपीय देश से जुड़ा होने के कारण उसे अलग दृष्टि से देखा जाता था। जहां तक नार्थकोम की बात है तो इसका प्रमुख उद्देश्य अमेरिका और कनाडा की रक्षा सुनिश्चित करना है। ऐसे में ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की इस नीति परिवर्तन ने यही संकेत दिया कि ग्रीनलैंड अब महज एक विदेशी सैन्य अड्डे से कहीं बढ़कर है और अमेरिकी सीमाओं की सुरक्षा में उसकी अपनी एक विशेष महत्ता है।
तमाम प्रयासों के बाद भी ट्रंप को ग्रीनलैंड से जुड़ी अपनी मंशा को पूरा करने के प्रयासों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। यही कारण है कि वह अब सैन्य विकल्प आजमाने की धमकी भी दे रहे हैं। यूरोपीय और नाटो सहयोगियों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया भी दिखी है। हालांकि इसे ट्रंप की सुविधाजनक हस्तक्षेपकारी नीति कहना अधिक उपयुक्त होगा, जिसमें अमेरिकी व्यापारिक एवं सामरिक हितों को साधने के लिए बल प्रयोग से संकोच नहीं।
ऐसे में सहयोगी देशों से उनकी यही अपेक्षा है कि या तो अमेरिकी आकांक्षाओं के अनुरूप काम करें या फिर अमेरिका के सुरक्षा आवरण को गंवाने का जोखिम उठाने के लिए तैयार रहें। ट्रंप की यह विदेश नीति न केवल दुनिया के प्रति अमेरिका की पारंपरिक भूमिका के मूल सिद्धांतों को चुनौती दे रही है, बल्कि आधुनिक विश्व व्यवस्था से जुड़ी व्यापक मान्यताओं को भी झकझोर रही है। दूसरों को नसीहत देने वाला अमेरिका अब खुद ही उन स्थापित परंपराओं को दरकिनार कर रहा है, जिनकी पैरवी वह खुद करता रहा है। इस परिवर्तन के प्रभाव बहुत दूरगामी होंगे।
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)
दैनिक जागरण