बड़ा सवाल यह है कि भारत के तमाम सहयोग और राहत की नीतियों के बावजूद ये देश चीन और पाकिस्तान की तरफ क्यों झुके जाते हैं, जिनकी नीतियों की वजह से कर्ज और जिहादी आतंक के संकटों से घिर जाते हैं? चीन के अलावा अब ट्रंप और सऊदी का समर्थन मिलने से इतराए पाकिस्तान का उपाय करने के साथ-साथ इस सवाल का हल खोजना शायद भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
शिवकांत शर्मा

कहने को तो एक साल ही बदला है, पर डोनाल्ड ट्रंप ने जैसी उथल-पुथल मचाई है, उससे लगता है मानो एक युग बदल गया है। नए साल की शुरुआत में ही उन्होंने वेनेजुएला पर धावा बोल दिया। अमेरिका इस वर्ष अपनी स्थापना की 250वीं जयंती मनाएगा, लेकिन दुनिया के सबसे उदार, संतुलित और स्थिर लोकतंत्र के संस्थापकों ने क्या कभी सोचा होगा कि कोई राष्ट्रपति 250 वर्षों से स्थापित व्यवस्था को केवल एक साल के भीतर उलट-पलट देगा? अफ्रीकी मूल के फंक गायक जेम्स ब्राउन का मशहूर गीत है- इट्स मेंस वर्ल्ड (यह मर्दों की दुनिया है)। उसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि यह ट्रंप की दुनिया है-खासकर भूराजनीति और अर्थनीति के मामले में।
ट्रंप की दुनिया में किसी स्थापित कूटनीतिक परंपरा और अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून की कोई गारंटी नहीं है। यह द्वितीय महायुद्ध के बाद बनी नियमबद्ध व्यवस्था वाली दुनिया से नितांत भिन्न है, जिसके आधार पर भारत की विदेश और व्यापार नीति टिकी है। जिस गुटबाजी से भारत को परहेज था, वह सोवियत संघ के विघटन से टूटी और दुनिया एकध्रुवीय बन गई। भारत ने गुटनिरपेक्षता की जगह हितसापेक्ष स्वायत्तता की नीति अपनाई और खेमेबाजी से दूर रहते हुए अपनी सामरिक एवं आर्थिक शक्ति के विकास के लिए अमेरिका का रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार बन गया।
भारत से पहले चीन ने भी गुटबाजी छोड़कर अपने सामरिक हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका के साथ व्यापारिक साझेदारी की, जिसकी बदौलत आज वह अमेरिका को हर क्षेत्र में चुनौती देने की स्थिति में आ गया है। ट्रंप खुद चीन को जी-2 का दूसरा जी यानी दूसरी महाशक्ति मान चुके हैं। रूस को वे सामरिक महाशक्ति मानते हैं, लेकिन वह वैश्विक शक्ति संतुलन की तीसरी धुरी बनने की स्थिति में नहीं है। यूक्रेन युद्ध और आर्थिक प्रतिबंधों ने उसे चीन के खेमे में पहुंचा दिया है। यानी दुनिया एक बार फिर दो खेमों में बंटती दिख रही है, जबकि भारत बहुपक्षीय व्यवस्था चाहता है। ट्रंप के यूनेस्को, विश्व स्वास्थ्य संगठन और पेरिस जलवायु संधि जैसी वैश्विक संस्थाओं और संधियों से हाथ खींच लेने के कारण उभरती शक्तियों के लिए विश्व मंच पर कुछ जगह जरूर बनी है। हालांकि नियमबद्ध व्यवस्था का स्थान महाशक्तियों की मनमानी ने ले लिया है। अमेरिका का वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति मादुरो को बंधक बनाना, ईरान और नाइजीरिया पर हवाई हमले और ताइवान को डराने के लिए चीन के सैनिक अभ्यास इसके ताजा उदाहरण हैं।
महाशक्तियों की मनमानी भारत के लिए चिंताजनक है। भारत चाहता जरूर है कि वैश्विक संस्थाएं अमेरिका और यूरोप के नियंत्रण से मुक्त हों, पर नियमबद्धता की कीमत पर नहीं। वह चाहता है कि वैश्विक संस्थाओं में भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और जापान जैसी शक्तियों को भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व मिले। महाशक्तियों की मनमानी वाली अव्यवस्था में यदि भारत को सुरक्षा परिषद और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में उचित स्थान मिल भी जाए तो उसकी व्यावहारिक उपादेयता क्या रह जाएगी? हकीकत यह है कि भारत को इसी व्यवस्था के भीतर अपनी विदेश नीति के कौशल से अपनी जगह बनानी है। इस साल उसे ब्रिक्स देशों की अध्यक्षता करनी है, जहां उसे दक्षिणी देशों का नेतृत्व करने का अवसर तो मिलेगा, मगर उसके लिए उसे चीन का सामना भी करना पड़ेगा। ब्रिक्स का सदस्य ईरान भी है, जहां मुद्रा के अवमूल्यन और आर्थिक संकट को लेकर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। ट्रंप ने धमकी दी है कि यदि प्रदर्शनों पर सख्ती बरती गई तो अमेरिका हस्तक्षेप करेगा। अध्यक्ष होने के नाते ब्रिक्स देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप की यह धमकी भारत के लिए यूक्रेन जैसा धर्मसंकट खड़ा कर सकती है।
भारत को एक साल से टलती आ रही क्वाड शिखर बैठक का आयोजन भी करना है, जो ट्रंप की भारत यात्रा पर निर्भर करेगा। ट्रंप की भारत यात्रा व्यापार वार्ताओं की प्रगति पर निर्भर करेगी, जिनके सिरे न चढ़ने के कारण 25 साल पुराने संबंधों में खटास आई है। हालांकि अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रियर ने भारत के प्रस्तावों को अब तक मिले सर्वश्रेष्ठ व्यापार प्रस्ताव बताया है, पर ट्रंप के रवैये को देखते हुए भारत किसी बात पर भरोसा करने का जोखिम नहीं उठा सकता। उसे अमेरिकी बाजार के विकल्प खोजने ही होंगे। उसने यूएई, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ व्यापार समझौते किए हैं, लेकिन अमेरिकी बाजार के जाने से हुए नुकसान की भरपाई इनसे नहीं केवल यूरोप और खाड़ी परिषद के व्यापार समझौतों से ही हो सकती है और वह भी कुछ हद तक। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डे लायन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा की गणतंत्र दिवस पर भारत यात्रा से उम्मीद है कि व्यापार समझौते को अंतिम रूप मिल सकेगा।
भारत की विदेश और व्यापार नीति की असली परीक्षा दक्षिण एशिया में होगी। ‘पड़ोस पहले’ की नीति के तहत बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव के साथ संचार, यातायात, व्यापार और आर्थिक मदद पर अरबों डालर खर्च करने के बावजूद भारत इन देशों में वह विश्वास और प्रभाव नहीं जमा पाया, जिसकी उम्मीद थी। बांग्लादेश में भारत विरोधी लहर सोचने को बाध्य करती है कि क्या भारत के 3900 सैनिकों के बलिदान, करोड़ों लोगों को शरण और हाल की लगभग आठ अरब डालर के कर्ज की सुविधा का यही प्रतिफल है? फरवरी में होने जा रहे चुनाव में भारत विरोधी बीएनपी का सत्ता में आना लगभग तय है। नेपाल में तो कौन सत्ता में आएगा और वह आंदोलनकारी जेन-जी को स्वीकार होगा या नहीं, इसका अनुमान लगाना कठिन है। बड़ा सवाल यह है कि भारत के तमाम सहयोग और राहत की नीतियों के बावजूद ये देश चीन और पाकिस्तान की तरफ क्यों झुके जाते हैं, जिनकी नीतियों की वजह से कर्ज और जिहादी आतंक के संकटों से घिर जाते हैं? चीन के अलावा अब ट्रंप और सऊदी का समर्थन मिलने से इतराए पाकिस्तान का उपाय करने के साथ-साथ इस सवाल का हल खोजना शायद भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)
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