एक सिनेकार निर्देशक कम मार्गदर्शक ज्यादा है। वह स्थितप्रज्ञ है। रचना को साकार होते हुए देखता है। एक अच्छी फिल्म नियंत्रण के बजाय विश्वास से बनती है और धुरंधर उसकी सबसे बड़ी बानगी है।
ललित मोहन जोशी

धुरंधर का दूसरा भाग रिलीज होने के साथ ही यह फिल्म फिर से चर्चा में आ गई है। यह फिल्म भारतीय सिनेमा का एक नया अध्याय है। हाल के वर्षों में यह पहली ऐसी भारतीय फिल्म है, जो लगातार चर्चा में बनी हुई है। इस फिल्म की मूल कथा भारत के विरुद्ध पाकिस्तानी षड्यंत्रों के इर्दगिर्द बुनी गई है। पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जिया उल हक ने पारंपरिक युद्ध के बजाय भारत को हजारों छोटे-छोटे घाव देने की जो रणनीति अपनाई थी, उसे पाकिस्तान ने कालांतर में भी कायम ही रखा।
धुरंधर पाकिस्तान के ऐसे ही दुस्साहस की काट में लगे भारतीय जासूस की कहानी है। कथानक, संवाद और घटनाओं की राजनीतिक प्रामाणिकता, अंतर्निहित हिंसा और पार्श्व संगीत की संपूर्ण सिनेमाई संरचना में धुरंधर एक अति-यथार्थवादी उत्कृष्ट प्रस्तुति है। हमजा अली मजारी के रूप में मुख्य पात्र महाभारत के अभिमन्यु की तरह है, जिसे उसके राष्ट्र ने प्रतिशोध के लिए वहां भेजा है। अपराध के लिए कुख्यात दक्षिण कराची का ल्यारी क्षेत्र हमजा के लिए एक चक्रव्यूह है, जिसे तोड़कर उसे भारत लौटना है। क्या वह इस ‘कुत्सित चक्रव्यूह’ को भेदकर लौट पाएगा?
धुरंधर भारत का पहला ऐसा फिल्मी कथानक है, जो भारत-पाकिस्तान के मौजूदा द्वंद्व को उसकी व्यापक भयावहता में उकेरता है। भारत के प्रति पाकिस्तान की कुंठा और उसके छद्म आतंकवाद को दर्शाने के लिए आदित्य धर ने जिस बारीकी और गहराई से शोध किया है, वह सत्यजित रे अथवा श्याम बेनेगल के सिनेमा के अपवाद को छोड़कर मुंबई के व्यावसायिक सिनेमा में पहले कभी नहीं दिखा। फिल्म में मेजर इकबाल, बाबू डकैत, रहमान डकैत, उजैर बलोच, एसपी असलम और जावेद खनानी जैसे प्रमुख पात्र, उनकी सूरतें और भाव भंगिमाएं इन कुख्यात अपराधियों और आतंकियों से हूबहू मिलती-जुलती हैं, जिन्होंने कंधार विमान अपहरण, संसद हमला और 26/11 जैसे हमलों को अंजाम दिया।
पिछले वर्ष के अंत में बिना किसी नियोजित प्रचार के रिलीज हुई धुरंधर की असाधारण सफलता ने बालीवुड के स्टार सिस्टम और प्रोडक्शन घरानों को स्तब्ध कर दिया। व्यावसायिक ईर्ष्या ने उनके मुंह पर ताले जड़ दिए थे, पर दर्शकों द्वारा फिल्म पर उमड़ रहे दुलार से उनके सुर बदल गए। धुरंधर ने यह भी दर्शाया कि नकारात्मक समीक्षाएं किसी भी रचना की उत्कृष्टता को सुर्खियों में आने से रोक नहीं सकतीं। भारतीय सिनेमा को कई यादगार फिल्में देने वाले रामगोपाल वर्मा तो इससे इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने कहा, ‘मुझे यह अतिशयोक्ति नहीं लगती कि अब भारतीय सिनेमा को ‘धुरंधर के पहले’ और ‘धुरंधर के बाद’ के रूप में देखा जाएगा।’ धुरंधर में आखिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से लोगों ने इसे पसंद किया? दरअसल धुरंधर का घटनाचक्र इतनी तेजी से आगे बढ़ता है और उसका उप-कथ्य उसे इतना प्रभावित करता है कि दर्शक कहानी के विकास के तारतम्य को पूरी तरह जोड़ नहीं पाते। इसलिए फिल्म के कथ्य और उप कथ्य को आत्मसात करने के लिए भी फिल्म को कई बार देखा गया।

सिनेमा बचपन से ही आदित्य धर का जुनून रहा है। उनके इस जुनून में डिस्लेक्सिया जैसी बीमारी भी आड़े नहीं आ पाई, जिससे पढ़ने-लिखने और शब्द-विन्यास में कठिनाई आती है। मुंबई शहर का एक कड़वा सच यह भी है कि काम मिलने के बाद भी कई बार उसके सही दाम नहीं मिलते। फिर भी लोग जुटे रहते हैं कि अनुभव तो मिलेगा। 2006 में मुंबई आए आदित्य ने कबीर खान की काबुल एक्सप्रेस के लिए गीत लिखे और सहायक निर्देशक के रूप में भी कार्य किया। हाल-ए-दिल और डैडी कूल, प्रियदर्शन की आक्रोश और तेज में काम के दौरान आदित्य अपनी फिल्म बनाने के ख्वाब भी देखते रहे। कई बार उनकी कहानियां चोरी हुईं और बात बनते-बनते बिगड़ गई। 2016 में आदित्य की किस्मत ने पलटी खाई, जब करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शंस के लिए वे फवाद खान के साथ अपनी पहली फिल्म ‘रात बाकी’ बनाने वाले थे। उसी दौर में उड़ी में आतंकी हमला हो गया। भारत में पाकिस्तानी कलाकारों पर पाबंदी लगा दी गई और आदित्य वह फिल्म बनाने से वंचित रह गए।
उड़ी हमले के कुछ ही दिन बाद भारतीय सेना ने सीमा पार करके सर्जिकल स्ट्राइक कर भारी संख्या में पाकिस्तानी आतंकवादियों का सफाया कर दिया। इस सर्जिकल स्ट्राइक ने सहसा आदित्य धर को अपने अवसाद से निकलकर अपनी पहली फिल्म बनाने की प्रेरणा दी। अपने निजी खर्च से छह महीनों के शोध के बाद उन्होंने 12 दिन में उड़ी की पटकथा लिख डाली और बाकी जो हुआ, वह इतिहास का हिस्सा है। उनकी फिल्म की एक पंक्ति ‘हाउ इज द जोश’ उस समय एक तरह से राष्ट्रीय-संवाद बन गया था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आदित्य अपने सिनेमा से मुख्यधारा वाले सिनेमा से जुड़े यथास्थितिवाद को तोड़ते हैं। उड़ी और धुरंधर मात्र दो फिल्मों से आदित्य धर ने फिल्मकार होने के मायने बदल दिए हैं। फिल्मकार अब नियंता न होकर एक संश्लेषक (सिंथेसाइजर) है जो फिल्म के हर कलाकार को सामर्थ्यवान बनाता है। उसकी उपस्थिति में रचना होती है। एक सिनेकार निर्देशक कम मार्गदर्शक ज्यादा है। वह स्थितप्रज्ञ है। रचना को साकार होते हुए देखता है। एक अच्छी फिल्म नियंत्रण के बजाय विश्वास से बनती है और धुरंधर उसकी सबसे बड़ी बानगी है।
दैनिक जागरण