अटल इनोवेशन मिशन के तहत अटल टिंकरिंग लैब्स भारत में बच्चों में वैज्ञानिक चेतना जगा रही हैं। ये लैब छात्रों को रटने के बजाय प्रयोगों और हाथों से सीखने पर जोर देती हैं, जिससे वे विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के सिद्धांतों को समझते हैं।
मनीष त्रिपाठी

नई दिल्ली : भारत के किसी बड़े शहर की चकाचौंध से दूर, ओड़िशा या छत्तीसगढ़ के किसी ऐसे जिले में जहां मोबाइल के सिग्नल भी मुश्किल से पहुंचते हैं, वहां एक 14 साल का बच्चा एक पुराने कार्डबोर्ड, कुछ तारों और एक सस्ते सेंसर के साथ बैठा है। वह कोई खिलौना नहीं बना रहा। वह एक ऐसी मशीन तैयार कर रहा है जो मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी होने पर उसके पिता के मोबाइल पर मैसेज भेज सके। जेन जी के शोर और जेनरेटिव एआई की चकाचौंध के बीच यह आज के भारत की वह तस्वीर है जिसे मुख्यधारा का मीडिया अक्सर कुछ कम तवज्जो देता है।
यह तस्वीर है बच्चों में विज्ञान चेतना को समर्पित अटल इनोवेशन मिशन की, जो देश के कोने-कोने में स्थापित अटल टिंकरिंग लैब्स के जरिये एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहा है, जो विज्ञान को रटती नहीं, उसे जीती है। 10 सालों की यह कहानी केवल मशीनों की नहीं है; यह कहानी है उस आत्मविश्वास की, जिसने भारत को ‘जुगाड़’ के देश से ‘इनोवेशन’ के ग्लोबल हब की ओर मोड़ दिया है।
विज्ञान शिक्षण का नया व्याकरण
औसत विद्यार्थियों के लिए भारत में विज्ञान शिक्षण एक बोरियत भरा बोझ रहा है। कक्षाओं में ब्लैकबोर्ड पर ‘प्रकाश के परावर्तन’ या ‘ओम के नियम’ के चित्र तो बनते थे, लेकिन साधारण मेधा वाले छात्रों को यह समझ नहीं आता था कि ये उनकी निजी जिंदगी में क्या बदलाव लाएंगे। ‘विज्ञान आओ करके सीखें’ जैसी पाठ्यक्रम पुस्तकें और ‘आविष्कार’ जैसी पत्रिकाएं कुछ रुचि जगाती भी थीं, मगर प्रैक्टिकल के पीरियड्स को छोड़कर प्रयोगशाला में प्रवेश लगभग वर्जित था।
हाईस्कूल में पहली बार नसीब होने वाली प्रयोगशालाएं भी ऐसी, जहां उपकरणों की उपलब्धता पाठ्यक्रम से एक इंच टस से मस होने को तैयार नहीं; नतीजतन अरुचि से भरे कई विद्यार्थियों का जोर सीखने पर नहीं, किसी सह्रदय प्रयोगशाला सहायक की कृपा से प्रैक्टिकल में नंबर जुगाड़ने पर होता था। ऐसे में कक्षा 10 उत्तीर्ण करने के बाद कई विद्यार्थी वाणिज्य अथवा कला संकाय में प्रवेश ले लेते थे, इनमें भी लड़कियों की संख्या बहुत होती थी।
मगर अटल टिंकरिंग लैब ने इस पूरी व्यवस्था में दिलचस्प परिवर्तन किए है। अब कक्षा छह से ही यहां ‘खुद करके देखो’ की संस्कृति है। संप्रति भारत भर के स्कूलों में फैली इन 10 हजार से अधिक लैब्स में जब कोई बच्चा खुद थ्री-डी प्रिंटर को कमांड देता है या रोबोटिक्स किट को असेंबल करता है, तो उसके भीतर विज्ञान को लेकर झिझक दीवानगी भरी दिलचस्पी में बदलने लगती है। विज्ञान किताबों के पन्नों से निकलकर उसके हाथों की हथेलियों पर नाचने लगता है।
यहां बच्चे विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) के सिद्धांतों को किताबों से नहीं, बल्कि प्रयोग करके सीखते हैं। उपकरणों से काम करते हुए वे जिज्ञासा, समस्या-समाधान और रचनात्मकता को विकसित करते हैं। प्रोजेक्ट बनाते हुए टीमवर्क और उद्यमिता की भावना भी विकसित होती है। यही बदलाव छात्रों को रटने से खोज की ओर लेकर जाता है और यही विज्ञान की असली ताकत है!
डीप टेक का बढ़ता दायरा
जिन पाठकों ने इस सप्ताह नई दिल्ली में आयोजित एआई इंपैक्ट समिट पर नजर रखी होगी, वे समझ रहे होंगे कि भारत की स्थिति आज डीप टेक में वैसी ही है जैसी बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में साफ्टवेयर के क्षेत्र में थी—हम एक बड़े धमाके के मुहाने पर खड़े हैं। आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और ब्लॉकचेन की बात करते हैं। आम आदमी के लिए ये शब्द अजनबी हो सकते हैं, लेकिन भारत की नवांकुर विज्ञानी मेधा के लिए ये रोजमर्रा के औजार हैं। डीप टेक का सरल अर्थ है ऐसी तकनीक जो गहन वैज्ञानिक शोध पर आधारित हो।
भारत आज अंतरिक्ष से लेकर रक्षा तक में डीप टेक का लोहा मनवा रहा है। जबकि पृष्ठभूमि में एटीएल जैसी इनोवेटिव प्रयोगशालाओं, इसरो के प्रोजेक्ट युविका और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग संचालित इंस्पायर-मानक जैसे कार्यक्रमों से इसकी नींव रखी जा रही है। वास्तव में जब एक छठी कक्षा का बच्चा यह समझता है कि सेंसर कैसे काम करता है और नवीं कक्षा के बच्चे वर्किंग सैटेलाइट माडल बनाते हैं, तो भविष्य के लिए ऐसे डाटा साइंटिस्ट, एआई या स्पेस इंजीनियर तैयार हो रहे होते हैं जो विदेशी ज्ञान पर नहीं, विज्ञान के सहजबोध पर निर्भर होते हैं।
विज्ञान उद्यमिता की चमक
नई पीढ़ी की विज्ञान में बढ़ती रुचि और परिणामस्वरूप इसकी तरफ बढ़ते रुझान का सबसे क्रांतिकारी पहलू है—विज्ञान उद्यमिता। इसी मंगलवार को मुंबई में भारत-फ्रांस इनोवेशन फोरम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि अटल इनोवेशन मिशन 100 से अधिक इन्क्यूबेटर और डीप-टेक स्टार्टअप्स की बढ़ती हुई पाइपलाइन को जोड़ता है। उन्होंने अटल टिंकरिंग लैब्स को स्कूली स्तर पर उस प्रारंभिक बिंदु के रूप में बताया, जिसे मार्गदर्शन, छात्रवृत्ति और स्टार्टअप पूंजी तक पहुंच का समर्थन प्राप्त है। विभिन्न हैकाथान से तराशे हुए विज्ञानी मेधा के यह हीरे केवल प्रोजेक्ट नहीं बना रहे, ये भविष्य की यूनिकॉर्न कंपनियों की रूपरेखा लिख रहे हैं। आइडिया से पेटेंट तक का सफर अब आसान हो गया है। नीति आयोग ने ऐसी व्यवस्था की है कि अगर किसी छात्र का आइडिया वाकई दमदार है, तो उसे इनक्यूबेशन सेंटर्स और निवेशकों से जोड़ा जाता है।
वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग में जो सुधार हुआ है, उसके पीछे इन 10 हजार से अधिक लैब्स का बड़ा हाथ है। दुनिया देख रही है कि भारत के किशोर और युवा अब केवल कोड नहीं लिख रहे, बल्कि हार्डवेयर और डीप टेक में भी हाथ आजमा रहे हैं। इसरो के छोटे उपग्रहों के निर्माण में स्कूली छात्रों की भागीदारी इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। तो अगली बार जब आप अपने बच्चे के हाथ में कोई उपकरण देखें, तो उसे प्रेरित करें कि वह यह सोचे कि यह काम कैसे करता है। आखिरकार 2047 में जब हम स्वाधीनता का शताब्दी समारोह मनाएंगे, तब यह पीढ़ी ही अपनी विज्ञानी मेधा से धरती से लेकर अंतरिक्ष तक भारत का भाग्य लिख रही होगी!
जहां समस्या ही प्रयोगशाला है
अक्सर बड़े नवाचार एसी कमरों में नहीं, बल्कि तपती धूप और धूल भरे रास्तों पर पैदा होते हैं। ग्रामीण भारत की अपनी विशिष्ट चुनौतियां हैं—खेती, सिंचाई, बिजली और स्वास्थ्य। यूट्यूब पर उदाहरण भरे पड़े हैं कि किस तरह भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे भी बड़ों की दुनिया को संवारने के लिए अपनी विज्ञानी मेधा का प्रयोग कर रहे हैं। उदाहरणस्वरूप शिवपुरी, मध्यप्रदेश के विकास, शिवम और दिनेश ने सेंसर, लाइट और वाइब्रेटर का इस्तेमाल करके सांप को दूर रखने की स्मार्ट छड़ी बनाई है तो वहीं विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश की रेवल्ला अर्चना ट्रेन दुर्घटना रोकने की प्रणाली सीख रही हैं।
प्रयास सामान्य लग सकते हैं, मगर इनके पीछे की भावना असाधारण है। शिवपुरी में दसवीं कक्षा के इन बच्चों ने अपने गांव के किसानों को सांप के काटने से मरते देखा था, तो वहीं एक ट्रेन दुर्घटना ने कक्षा नौ की रेवल्ला के सिर से मां का साया छीन लिया था। आज यह नवाचार छोटे लग सकते हैं, लेकिन यह उस ‘डीप टेक’ का बुनियादी हिस्सा हैं जो आने वाले समय में लाखों जानें बचाएगा। दरअसल, जिज्ञासु बच्चों के बीच इंटरनेट मीडिया पर तैरते हुए यह नवाचार ओपेन सोर्स प्रोजेक्ट्स की तरह काम करते हैं, जिन्हें वे देखते-समझते और सुधारते हैं।
नवाचार की राह पर
यदि आप एक उत्सुक छात्र हैं तो विज्ञान को इस तरह अपना दोस्त बनाएं। वक्त के साथ दिलचस्पी भी जरूर बढ़ेगी:
समस्या को समझें: अपने आसपास देखें कि क्या परेशान करता है। क्या पानी की बर्बादी रोकनी है? या बुजुर्गों की मदद करनी है?
प्रयोग शुरू करें: स्कूल की साइंस लैब में जाकर उन उपकरणों को हाथ लगाएं जिनसे आप डरते हैं। असफल होने से न डरें।
पेटेंट की ताकत: यदि आपका समाधान नया है, तो उसे तुरंत रजिस्टर करवाएं। भारत में स्टार्टअप बौद्धिक संपदा संरक्षण योजना (SIPP) के तहत छात्रों को पेटेंट फाइलिंग में विशेष छूट और कानूनी मदद मिलती है। याद रखिए, आपका एक विचार आपकी और देश की तकदीर बदल सकता है।
दैनिक जागरण