सुनील आंबेकर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सौ वर्ष पूरे हो गए हैं। संघ, जिसकी यात्रा नागपुर में मोहिते का बाड़ा से हुई थी, आज भारत तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे विश्व में अपने कार्य और आयामों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है।
संयोग से इस बार विजयादशमी 2 अक्तूबर, यानी गांधी जयंती के दिन पड़ी। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गांधीजी के विचारों का विरोध करने के आरोप लगते हैं और शरारत करते हुए उनकी हत्या से नाम जोड़ा जाता रहा, उसके स्थापना दिवस का गांधी जयंती से यह मेल चर्चा का विषय बना। इस संयोग के आलोक में आप इन आरोपों को कैसे देखते हैं? संघ और गांधीजी, दोनों को किस दृष्टि से देखते हैं?

अब ये आरोप अप्रासंगिक हो चुके हैं, क्योंकि समाज समझ चुका है कि संघ एक देशभक्त, सेवा-केंद्रित और लोकतांत्रिक संगठन है, जो राष्ट्र निर्माण में जुटा है। विभाजन के समय संघ को राजनीतिक दृष्टि से देखा गया, पर वास्तव में वह हिंदू समाज की सुरक्षा और पुनर्वास में लगा था। संघ को जनता का स्नेह मिल रहा था, जिससे कुछ राजनीतिक शक्तियों की असहमति स्वाभाविक थी। गांधीजी और संघ में विचारों का विरोध उतना नहीं था, जितना प्रचारित किया गया। स्वदेशी, अस्पृश्यता उन्मूलन और समाज सुधार पर दोनों के विचार समान थे।
गांधीजी स्वयं संघ शिविर में आए थे और हेडगेवार जी से मिले थे। विभाजन के बाद उन्होंने दिल्ली के वाल्मीकि बस्ती में संघ के स्वयंसेवकों से भी मुलाकात की थी। इसे व्यापक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। जहां तक बाकी चर्चाओं का प्रश्न है, संघ अब उनसे कहीं आगे बढ़ चुका है। आज देशवासी इस विषय पर सवाल नहीं उठा रहे, केवल कुछ लोग अपने स्वार्थ और हितों के कारण ऐसा करते हैं। बेहतर होगा कि वे अपनी ऊर्जा रचनात्मक कार्यों में लगाएं, बजाय ऐसे अनावश्यक सवाल उठाने के।
सरसंघचालक जी ने एक बार कहा था, ‘गांधी जी तो आए थे, पर हम लोग कागज नहीं रखते।’ स्वयं गांधी जी ने भी वाल्मीकि बस्ती में हुई उस मुलाकात और भाषण का उल्लेख अपने लेखन में किया है। संघ भले ही दस्तावेज़ सुरक्षित न रखता हो, लेकिन उस समय की घटनाएं और बातचीत के विवरण अखबारों और अभिलेखों में दर्ज हैं।
मेरा मानना है कि संघ पर लगे अधिकतर आरोप राजनीतिक कारणों से प्रेरित रहे। डॉ. हेडगेवार जी सभी का सम्मान करते थे। संघ के शुरुआती काल में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भी महाराष्ट्र के कराड और कपोली में आए थे। उन्होंने भी कभी संघ के बारे में नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में भी जब संविधान के लिए खतरे का उल्लेख किया, तो उन्होंने सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट का नाम लिया, संघ का नहीं। कई बार संघ को जान-बूझकर गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया, पर उसने हमेशा अपने कर्मों और निष्ठा से समाज का विश्वास जीता। आज महत्वपूर्ण यह देखना है कि संघ समाज और राष्ट्र की सेवा में कैसे सक्रिय है, यही उसके कार्य का केंद्र है।
संघ का मूल उद्देश्य समाज का संगठन है। इस संगठनात्मक कार्य की अंतिम परिणति क्या है? क्या इसका लक्ष्य राजनीतिक सत्ता है या सांस्कृतिक जागरण? भारत के संदर्भ में इस कार्य का व्यापक अर्थ क्या है?
संघ का मूल उद्देश्य सांस्कृतिक जागरण है। इसकी कल्पना यह है कि पूरा समाज राष्ट्र की जिम्मेदारी स्वयं उठाए-हर परिवार, हर व्यक्ति अपनी भूमिका निभाए। समाज शासन या किसी महान व्यक्ति पर निर्भर न रहे, बल्कि आत्मनिर्भर बने। प्राचीन भारत में ऐसी ही समाज-आधारित व्यवस्था थी, जो समय के साथ कमजोर हुई। आज संघ उसी परंपरा को पुनर्जीवित करना चाहता है, जहां राज्य सहायक हो, पर समाज ही उसका आधार बने।
भारत सदियों तक स्थिर इसलिए रहा, क्योंकि उसकी व्यवस्था समाज-आधारित थी, राज्य-आधारित नहीं। संघ का फोकस इसी व्यवस्था को फिर से मजबूत करने पर है-समाज में आत्मविश्वास जगाना, जागरूकता फैलाना और पुराने मूल्यों के आधार पर वर्तमान समय की जरूरत के अनुसार नई व्यवस्था विकसित करना। यह किताबों से नहीं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी और संवाद से ही संभव है।
संघ इसी प्रक्रिया में विश्वास करता है। इसलिए वह हर घर, मोहल्ले और गांव तक पहुंचता है, ताकि पूरे राष्ट्र में समान विचार और सहमति बने और हर नागरिक देश निर्माण में सहभागी बने।
आपने कहा कि संघ का कार्य राष्ट्र में सहमति बनाना है। लेकिन कई लोग राष्ट्र की परिकल्पना पर ही सवाल उठाते हैं। उनके लिए यह नेशन-स्टेट हो सकता है, जबकि संघ हिंदू राष्ट्र की बात करता है। हिंदू राष्ट्र से संघ का आशय क्या है?
पहले यह समझना होगा कि हिंदू कौन है। हिंदू वह है, जो इस अनुभूति में जीता है कि सबमें एक समान तत्व है जो हम सभी को जोड़ता है। यही एकत्व का तत्व हिंदुत्व का आधार है। जो इस अनुभूति के साथ जीवन जीता है, वही हिंदू है। इस भावना के कारण अलग भाषा, रूप या परंपराओं के लोग भी एकता के सूत्र में बंध जाते हैं।
जब समाज एकता और सद्भाव की भावना से जीता है, हिंदू संस्कृति का जयगान करता है, अनेक प्रतीकों और साधनों से। ऐसे सब एक ही संस्कृति को पूजने वाले, इसी धरती को मातृभूमि कहने वाले सब हिन्दू हैं और राष्ट्र हिंदू राष्ट्र है। यह कोई संकीर्ण विचार नहीं, बल्कि प्राचीन काल से विकसित एक व्यापक दृष्टि है-जब न कोई आक्रमण था, न किसी पंथ पर अस्तित्व का संकट। न मुस्लिम थे, न ईसाई, हिंदू शब्द भी नहीं था। उस समय मानवता और सृष्टि के कल्याण के लिए जो सात्विक भावना उभरी, वही हिंदू संस्कृति और धर्म है। ऐसा राष्ट्र केवल एक दार्शनिक कल्पना नहीं, बल्कि जीवन की एक कार्यप्रणाली है।
दुनिया में कई राष्ट्र भाषा, भविष्य या नस्ल के आधार पर बने हैं, इसलिए कई लोगों को लगता है कि भारत में भी अनेक राष्ट्र हैं। भारत को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक संदर्भ में, भारतीय तरीके से देखना होगा। जब कोई भारत को समझ लेता है, तो उसे हिंदू, हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र का अर्थ भी समझ आ जाता है और जिसे इनमें से कोई एक समझ में आ जाए, वह बाकी दो को भी समझ लेता है। ये तीनों परस्पर जुड़े हुए हैं और संघ का प्रयास है कि लोगों को जिस माध्यम से आसानी से समझ आए, उसी माध्यम से उन्हें समझाया जाए। जिन्हें संघ से समस्या होती है, उन्हें अक्सर भारत और हिंदुत्व से भी समस्या होती है। आज राजनीतिक, सामाजिक और अकादमिक जगत में जो सोच और व्याख्या की समस्याएं हैं, उनका कारण राष्ट्रवाद की अवधारणा को लेकर मूलभूत भेद है। इसी वजह से श्री गुरुजी ने अपने 33 वर्षों के जीवन में लगातार अपने उद्बोधनों में राष्ट्र को स्पष्ट रूप से समझाने और परिभाषित करने का प्रयास किया।
डॉक्टर हेडगेवार ने डॉक्टरी पढ़ने के बाद यह मार्ग क्यों चुना? जो नहीं जानते, वे कैसे समझें कि शाखा वास्तव में क्या है? उसका उद्देश्य और स्वरूप क्या है?
शाखा एक संकल्प और आत्म-उन्नयन का स्थल है, जहां सहज वातावरण में लोग मिलते, खेलते, अनुशासन का अभ्यास करते, गीत गाते और महापुरुषों की कहानियां सुनते हैं। यह सात्विक प्रेम पर आधारित संबंधों का केंद्र है, जो एक बार जुड़ने पर जीवनभर बने रहते हैं।
एक गीत है- ‘शुद्ध प्रेम कार्य का आधार है।’ यही कारण है कि जो संघ से जुड़ता है, वह जीवनभर जुड़ा रहता है। जैसे परिवार और मां से प्रेम स्वाभाविक होता है, वैसे ही शाखा में जाना मातृभूमि और समाज के प्रति आत्मीय प्रेम सिखाता है। यह जुड़ाव सहज रूप से होता है, बिना जाने ही व्यक्ति इसका हिस्सा बन जाता है। लाखों लोगों ने इस अनुभव को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महसूस किया है। यह अनुभव-सिद्ध साधना है, जो सौ वर्ष पहले जितनी प्रासंगिक थी, आज भी उतनी ही है।
इसे दूसरे तरीके से समझाता हूं। उदाहरण के लिए, जिसे हम नहीं जानते, उससे हमारा जुड़ाव भी सीमित रहता है। जैसे गणेश पूजा में भाग लेते हुए अगर हमें गणेश जी की कथा न पता हो, तो जुड़ाव अधूरा रहता है। लेकिन कहानी जानने पर संबंध गहरा होता है। संघ में भी यही होता है-हम एक-दूसरे से नाम, पृष्ठभूमि और अनुभव जानकर संबंध को विस्तार देते हैं। यह मनुष्य का स्वभाव है और शाखा में जुड़ाव की यही प्रक्रिया सहज रूप से चलती रहती है। शाखा में हम भारत की भाषाओं, महापुरुषों, नदियों, प्रदेशों और इतिहास का परिचय कराते हैं, जिससे व्यक्ति भारत को अपना महसूस करता है। शाखा से जुड़ने पर दो बदलाव निश्चित होते हैं-पहला, उसकी दृष्टि अखिल भारतीय और व्यापक हो जाती है, दूसरा, वह समाज और राष्ट्र को अपना मानकर विध्वंसक नहीं, बल्कि रचनात्मक कार्य करता है। चाहे औपचारिक प्रशिक्षण हुआ हो या नहीं, शाखा से जुड़ने वाला इन दोनों गुणों को अपने व्यवहार, विचार और कृति में अपनाता है।
अक्सर लोग पूछते हैं-संघ महिलाओं की सहभागिता को कैसे देखता है और उसमें उनकी क्या भूमिका मानता है?
हमारे धर्म और संस्कृति में पुरुष और महिला, दोनों की समाज व राष्ट्र के जीवन में समान और महत्वपूर्ण सहभागिता है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। संघ का कार्य शाखा से शुरू हुआ, जो मैदानी खेल और कार्यक्रमों पर आधारित था, इसलिए प्रारंभ में इसमें पुरुष शामिल हुए। महिलाओं को ध्यान में रखते हुए 1936 में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की स्थापना हुई, जो आज 90 वर्ष से सक्रिय है। इसलिए महिलाओं की भूमिका पर सवाल अज्ञानता से उत्पन्न होते हैं, जैसे खेल की किसी पुरुष टीम में महिला खिलाड़ियों की अनुपस्थिति पर प्रश्न उठाना। समिति और संघ, दोनों में कार्य समानांतर रूप से चलता है।
संघ ने शुरुआत से ही सार्वजनिक कार्यों में युवकों और युवतियों को साथ जोड़ा, जैसे-अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में पहले दिन से ही दोनों की सहभागिता रही। बाद में बने सभी संगठनों में भी यही स्वरूप दिखता है। जहां तक निर्णयों की बात है, तो संघ की शाखा में जो निर्णय होते हैं, वही समिति की शाखा में भी होते हैं। लेकिन समाज और राष्ट्र से जुड़े बड़े मुद्दों पर सभी संगठन, पुरुष और महिला, एक साथ चर्चाएं करते हैं और दिशा तय करते हैं। संघ की सर्वोच्च बैठक ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ में भी महिलाओं और सभी संगठनों की सहभागिता रहती है।
आज नए विभागों, जैसे प्रचार विभाग में भी सभी स्तरों पर महिलाओं का सहभाग रहता है। शाखा-आधारित विभागों से लेकर समाज में काम करने वाले सेवा, संपर्क और प्रचार विभागों तक, महिलाओं की सक्रिय सहभागिता है। कई संगठनों का नेतृत्व में महिलाएं कर रही हैं, जैसे-सेवा भारती और विद्यार्थी परिषद, जहां निधि कई वर्षों तक महामंत्री रहीं। जैसे-जैसे सामाजिक परिवर्तन हुए, महिलाओं की भागीदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ी और संघ व उसके सभी संगठन, समिति और यहां तक कि राजनीति में भी यह सहभागिता दिखाई देती है।
संघ स्वयं को सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन उसके कई कार्यकर्ता राजनीति में भी सक्रिय हैं। संघ के लिए राजनीति का अर्थ क्या है और वह राजनीतिक भूमिका को कैसे देखता है?
संघ समाज में जीवन के हर क्षेत्र में अच्छी व्यवस्था और सकारात्मक परिवर्तन के लिए स्वयंसेवकों को सक्रिय करता है। विविध क्षेत्रों में संगठनों का कार्य है-दिव्यांगों के लिए ‘सक्षम’, मजदूरों के लिए ‘भारतीय मजदूर संघ’ और राजनीति में ‘भारतीय जनता पार्टी’, जहां अनेक स्वयंसेवक सक्रिय हैं। 1940 में डॉक्टर जी ने भी कहा था कि शाखा के बाहर का पूरा हिंदू समाज हमारा कार्यक्षेत्र है। इसलिए स्वयंसेवक राजनीति सहित हर क्षेत्र में संगठन बनाकर अंतिम व्यक्ति की चिंता, राष्ट्र सर्वप्रथम का भाव और सामूहिक कार्यपद्धति को अपनाते हैं।
संघ की दृष्टि से राजनीतिक क्षेत्र भी महत्वपूर्ण है और उसमें सकारात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं। शासन में परिवर्तन तो जरूरी है, लेकिन संघ का मुख्य कार्य व्यक्ति और मनुष्य निर्माण है। समाज में अभी कई कार्य शेष हैं, जिनके लिए अच्छे, निष्ठावान लोगों की जरूरत है। इसलिए संघ अपनी अधिकतर शक्ति ऐसे शुद्ध भाव से कार्य करने वाले व्यक्तित्वों के निर्माण में लगाता है और यही उसका मूल उद्देश्य बना हुआ है।
संघ की यात्रा शाखा से शुरू होकर आज कई धाराओं में विकसित हो चुकी है। आज संघ सेवा क्षेत्र में भी व्यापक रूप से दिखाई देता है। क्या यह सिर्फ विस्तार है या फोकस भी बदल गया है? शाखा और सेवा क्षेत्र में क्या संबंध है? क्यों सेवा कार्यों को अधिक कवरेज मिलता है, जबकि शाखाओं पर कम ध्यान दिया जाता है?
स्वाभाविक है कि जो कार्य दिखाई देता है, वही लोगों को अधिक समझ में आता है। किंतु शाखा में कोई व्यक्ति एक दिन में तैयार नहीं होता, न ही यह कार्य एक दिन में पूरा हो सकता है। यह सतत् और शांत मन से किया जाने वाला साधनापूर्ण प्रयास है। संघ का आज भी मुख्य फोकस वही है-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में व्यक्ति निर्माण का कार्य। स्वाभाविक रूप से शाखाओं की संख्या बढ़ी है, सहभागिता बढ़ी है और समाज में संघ के प्रति सकारात्मक भावना भी पहले से कहीं अधिक विस्तारित हुई है। साथ ही, समाज में नई आवश्यकताओं और क्षेत्रों की पहचान भी हुई है। उन सभी कामों में स्वयंसेवकों की शक्ति लगाना आवश्यक है। इसलिए स्वयंसेवक जहां कमी या आवश्यकता होती है, वहां स्वाभाविक रूप से काम करते हैं। इसी कारण सेवा कार्यों का विस्तार स्वाभाविक रूप से बढ़ा है और कई स्वयंसेवक उसमें सक्रिय हैं।
कुछ लोग संघ को अतीतजीवी संगठन मानते हैं, जिसकी रुचि दर्शन, इतिहास, सिद्धांतों और परिकल्पनाओं में है। विज्ञान, तकनीक, बदलती दुनिया, भू-राजनीतिक मुद्दे और वैश्विकता पर संघ का क्या दृष्टिकोण है? साथ ही, आपने विदेश में संवाद किया है और फिर जाने वाले हैं, उस अनुभव के आधार पर नए विषयों को संघ कैसे देखता है?
संघ मानता है कि इतिहास से प्रेरणा लेकर आत्मविश्वास बढ़ता है, जिससे भविष्य की योजना सशक्त बनती है। उसकी सोच भूतकाल के गौरव, वर्तमान के आत्मविश्वास और भविष्य की योजना को जोड़ती है। मानव सभ्यता सतत विकसित होती रही है, इसलिए नवाचारों का देशहित में उपयोग कर राष्ट्र को मजबूत बनाना आवश्यक है, पर साथ ही यह देखना होगा कि वे मानव और पर्यावरण के अनुकूल रहें।
पश्चिम में वोकिज्म और पर्यावरण संकट से स्पष्ट है कि केवल भौतिक विकास स्थायी समाधान नहीं है। हमारी संस्कृति कहती है कि सुख और मूल्य वही तय करें जो मनुष्य व समाज के हित में हों। इसलिए हमें अपनी जरूरतों और प्रतिभा के अनुसार तकनीक व अर्थव्यवस्था विकसित करनी चाहिए। एआई या रोबोट नहीं, बल्कि मनुष्य ही भविष्य का निर्धारण करेगा।
भारतीय संस्कृति की भूमिका आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। योग जैसे भारतीय मूल्यों को विश्व ने अपनाया है। संघ का विचार है कि तकनीक आधुनिक हो, पर संस्कार, नैतिकता और भाषा भारतीय हों। हर तकनीक का स्वागत है, लेकिन जैसा दीनदयाल जी कहते थे-पुराने को युगानुकूल बनाना चाहिए। हमें अतीत से सीखकर उसे समय के अनुरूप ढालना और वैश्विक परिवर्तनों को देशानुकूल बनाना चाहिए। जैसे आज हर चीज ड्रेस, यूट्यूब टेलर या सेवाएं-कस्टमाइज होती हैं, वैसे ही हमारी अर्थव्यवस्था और तकनीक भी हमारे संस्कारों व संस्कृति के अनुरूप होनी चाहिए। वैज्ञानिक इसी दिशा में एआई को भारतीय ज्ञान और भाषाओं से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं, यही भविष्य की दिशा है।
संघ जाति भेद मिटाने के लिए क्या कदम उठा रहा है और इस दिशा में उसका काम कैसा चल रहा है?
संघ ने प्रारंभ से ही स्पष्ट किया कि पूरा हिंदू समाज एक है और इसी आधार पर कार्य शुरू किया। संघ कार्य में कभी भेदभाव नहीं रहा। इतिहास में आई गलत प्रथाओं से समाज को मुक्त करना आवश्यक है। श्री गुरुजी ने जातिभेद को शास्त्रसम्मत मानने की धारणा को चुनौती दी और संतों व विद्वानों के माध्यम से संवाद कर स्पष्ट किया कि शास्त्रों में भेदभाव या अस्पृश्यता का स्थान नहीं है। उनका संदेश था, ‘न हिंदू पतितो भवेत्’ और ‘हिंदव: सोदरा: सर्वे’, यानी न कोई हिंदू पतित है और सभी हिंदू परस्पर भाई हैं।
संघ निरंतर भेदभाव मिटाने के प्रयास करता रहा है। बाबासाहेब आंबेडकर के सम्मान में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नामकरण इसका उदाहरण है। संघ का मानना है कि पानी, मंदिर और श्मशान सभी के लिए खुले हों। स्वयंसेवक संवाद और सेवा कार्यों के माध्यम से इन कुरीतियों को दूर करने में जुटे हैं। संघ ने संत रविदास, कबीर, नारायण गुरु, ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, गाडगे महाराज आदि संतों के समरसता के संदेश को समाज तक पहुंचाने का कार्य किया है। शताब्दी वर्ष के ‘पंच परिवर्तन’ में भी समरसता को प्रमुख स्थान दिया गया है, जिसका उद्देश्य है कि परिवार, मित्रता और उत्सवों में सभी वर्गों की समान भागीदारी हो।
संघ के स्वयंसेवक हर स्तर पर समरसता के लिए कार्यरत हैं, पर यह बदलाव केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, समाज के स्तर पर संभव है। इसके लिए सभी जाति-समुदाय के प्रमुखों और कार्यकर्ताओं से संवाद आवश्यक है, जिसमें स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक और वरिष्ठ कार्यकर्ता तक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संत-महंतों से भी आग्रह है कि वे पिछड़ी बस्तियों में जाकर आशीर्वाद दें। जैसे हैदराबाद (भाग्यनगर) में ‘मुनिवाहन सेवा’ के माध्यम से अनुसूचित जाति के व्यक्ति को पहली पूजा का अवसर दिया जा रहा है। यह पुरानी परंपरा है, जिसमें पुजारी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को कंधे पर बैठाकर पहली पूजा करवाते हैं। ऐसे कार्य हिंदू समाज के विराट रूप को दिखाते हैं, जो संकीर्णताओं से परे है।
विदेशों के मंदिरों में भी समावेशी परंपराएं विकसित हो रही हैं। हाल ही में अमेरिका से आए कुछ मित्र विदेशों के प्रमुख मंदिरों में गए और पाया कि वे खुले और समावेशी हैं-कहीं पुजारी अनुसूचित जाति से हैं, कहीं ओबीसी से, यानी हर वर्ग के लोग पूजा में समान रूप से जुड़े हैं। हालांकि कुछ स्थानों पर अब भी भेदभाव है, जिन्हें दूर करने के प्रयास जारी हैं। विश्व हिंदू परिषद, विद्यार्थी परिषद और भारतीय मजदूर संघ जैसे संगठन वंचित वर्गों के सशक्तिकरण में सक्रिय हैं। अब आवश्यकता है कि हर हिंदू परिवार इस समरस समाज निर्माण में सहभागी बने।
इस शताब्दी वर्ष से आगे संघ की भविष्य दृष्टि क्या है? आने वाले समय में संघ क्या-क्या करने वाला है?
सौ वर्ष की यात्रा में संघ की शाखाएं और समाज का समर्थन बढ़ा, जीवन के हर क्षेत्र से लोग जुड़े। अब अनेक व्यक्ति और संस्थाएं अच्छे कार्यों के लिए तत्पर हैं। आगे का महत्वपूर्ण कार्य है कि स्वयंसेवक उनसे जुड़कर अपने अनुभव बांटें और समाज निर्माण के नए आवश्यक कार्यों में सहभागी बनें।
इससे एक समृद्ध, समरस और सशक्त राष्ट्र बनेगा, जहां हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर मिले, कोई आक्रमण न कर सके और जो इतना समृद्ध हो कि विश्व के दुःख व अन्याय को दूर करने में समर्थ हो। यही संघ की आरंभिक प्रतिज्ञा और प्रार्थना की भावना है-राष्ट्र वैभव और करुणा, दोनों में अग्रणी बने।
इस प्रयास का परिणाम यह है कि समाज में विषयबोध जाग्रत हुआ है और अब पूरा देश उस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। यह अवसर और चुनौती है कि समाज, संस्थाओं और सरकार के स्तर पर व्यापक कार्यों को गति दें, लोगों को जोड़ें, नई प्रतिभाओं को शामिल करें और एकता की कमी व गांव-शहर असमानता जैसी कमजोरियों को दूर करें। हमारा लक्ष्य ऐसी आधुनिकता है जो 200-300 वर्षों की सीमाओं से मुक्त होकर प्राचीन मूल्यों, पारिवारिक सुख और पर्यावरण संग सामंजस्य को अपनाए। विश्व के आधुनिक अनुभवों और हमारे परंपरागत ज्ञान को मिलाकर संघ शाखाओं में तैयारियां कर रहा है, खासकर युवाओं की नई प्रतिभा और कल्पनाओं को दिशा व प्रेरणा देकर राष्ट्र का भविष्य संवारने के लिए।
पांचजन्य