स्पष्ट है कि एक-दूसरे के प्रति विश्वास पैदा करने हेतु नए सिरे से प्रयास करने होंगे, लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि सभी मुद्दे रातोंरात सुलझ जाएंगे, क्योंकि मोहम्मद यूनुस ने जो नुकसान किया, उसकी भरपाई में समय लगेगा।
ऋषि गुप्ता
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विश्व राजनीति के भौगोलिक पक्ष को देखा जाए तो ज्ञात होता है कि पड़ोसी देशों से संबंधों में लगातार मधुरता और समन्वय बनाए रखना मुश्किल होता है, वह चाहे अमेरिकी महाद्वीप में अमेरिका और उसके पड़ोसी देशों के बीच हो या फिर दक्षिण एशिया में भारत और उसके पड़ोसियों के बीच। मुश्किल तब आती है, जब तनाव ऐसे पड़ोसियों के साथ हो, जिनकी साझा संस्कृति, इतिहास, बोली-बानी और अन्य समानताएं होती हैं।
पिछले दस वर्षों में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव या फिर बांग्लादेश के साथ संबंध लगातार भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति की परीक्षा लेते रहे हैं। कई अवसरों पर ऐसा लगा कि किसी तीसरे देश ने खटास-तनाव का फायदा उठा लिया। भारत की विदेश नीति पड़ोसियों के साथ व्यापार करने और आर्थिक संबंधों की तरह ही आत्मीय संबंधों को बराबर महत्व देने की रही है। इससे पड़ोसी देशों से तनाव कम करने में मदद मिली है। इन दिनों भारत-बांग्लादेश संबंधों में भी तनाव की कमी आती दिख रही है।
ज्ञात हो कि अगस्त 2024 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिरने और उनके भारत में शरण लेने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली वहां की अंतरिम सरकार ने भारत के साथ संबंध बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बांग्लादेश में भड़का छात्र आंदोलन अवामी लीग नेता और प्रधानमंत्री शेख हसीना के शासन के खिलाफ था। इस हिंसक आंदोलन के चलते उनका भारत आना एक संयोग मात्र था, लेकिन यूनुस सरकार ने भारत पर जिस तरह तंज कसे, उसे चिढ़ाने का काम किया और शेख हसीना के प्रत्यर्पण को अपनी भारत नीति का मुख्य केंद्र बना दिया, उससे संबंध बिगड़े।
अपने लगभग डेढ़ साल के कार्यकाल में यूनुस ने बांग्लादेश और भारत के संबंधों को न केवल द्वेष से भरा, बल्कि बांग्लादेश की आजादी और बांग्लादेशी जनता पर अत्याचार करने वाले पाकिस्तान को मित्र देशों में गिना, लेकिन चुनाव होते ही समय ने करवट ली और भारत-बांग्लादेश संबंधों में फिर एक नई ऊर्जा का प्रवाह देखा जा सकता है। इसमें बड़ा कारण है बांग्लादेश में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत प्रथम की नीति।
बांग्लादेश में फरवरी में हुए चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की भारी जीत ने भारत में मिश्रित भाव पैदा किए, क्योंकि बीएनपी ऐतिहासिक तौर पर भारत के खिलाफ मुखर रहने वाला दल रहा है। इसका कारण भारत का शेख हसीना के प्रति लगाव माना जाता था, पर अवामी लीग की अनुपस्थिति में यह पहली बार है कि बीएनपी का नया नेतृत्व भारत के साथ मधुर संबंधों की वकालत कर रहा है।
इसकी शुरुआत बीएनपी प्रमुख एवं प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपनी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी को ढाका आने का न्योता भेजकर की। हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री का ढाका दौरा नहीं हो पाया और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारत की अगुआई की। यह पहल महत्वपूर्ण रही। इसके साथ ही तारिक रहमान जिस आत्मीयता से विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ओम बिरला से मिले, उससे भी बिगड़े संबंध पटरी पर आते दिखे।
यह उल्लेखनीय है कि गत 25 मार्च को प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपने राष्ट्रीय संदेश में बांग्लादेश की आजादी के दौरान पाकिस्तान की ओर से किए गए अत्याचारों की कड़ी आलोचना की। भारत ने बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई उसकी मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर लड़ी थी और पाकिस्तान को बुरी तरह हराया था। बांग्लादेश की आजादी की कहानी इस देश के साथ भारत का एक मजबूत साझा इतिहास है।
बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर उसके दिल्ली स्थित उच्चायोग में भारतीय विदेश राज्य मंत्री, विदेश सचिव और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की मौजूदगी खास रही। इस दौरान बांग्लादेशी उच्चायुक्त रियाज हमीदुल्ला ने बांग्लादेश की आजादी में भारत का महत्व स्वीकारा। इसके बाद 2 अप्रैल को उन्होंने भारतीय सेना प्रमुख से भेंट की। संबंध सुधार की इसी कड़ी में अब बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान दिल्ली आ रहे हैं। यह दौरा निश्चित ही दोनों देशों के संबंधों में नई ऊर्जा भरने का काम करेगा।
उनके भारत दौरे पर गंगा जल संधि के नवीनीकरण, व्यापार, निवेश, सुरक्षा और सीमा से संबंधित विषयों पर बात होने की संभावना है। हालांकि बांग्लादेश का विपक्ष, खासकर जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगी दल शेख हसीना के प्रत्यर्पण को मुद्दा बनाते रहेंगे, लेकिन तारिक रहमान सरकार को इस पर ध्यान दिए बिना संबंधों को आगे बढ़ाने पर जोर देना होगा, क्योंकि शेख हसीना मामले को द्विपक्षीय संबंधों को मधुर बनाने में आड़े आने देना समझदारी नहीं हो सकती।
जहां बांग्लादेश की नई सरकार अंतरिम सरकार द्वारा खोदी गई खाई को पाटने के प्रयास कर रही है, वहीं यह उम्मीद भी कर रही है कि भारत बांग्लादेशी नागरिकों को वीजा देने में ढील दे। इस सबके बीच हम इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि यूनुस सरकार के कृत्यों का भारतीय जनमानस पर एक नकारात्मक प्रभाव हुआ है, जिसकी झलक भारतीय मीडिया में लगातार दिखती रही। स्पष्ट है कि एक-दूसरे के प्रति विश्वास पैदा करने हेतु नए सिरे से प्रयास करने होंगे, लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि सभी मुद्दे रातोंरात सुलझ जाएंगे, क्योंकि मोहम्मद यूनुस ने जो नुकसान किया, उसकी भरपाई में समय लगेगा।
(लेखक विदेश एवं सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
दैनिक जागरण