विकसित राष्ट्र बनने के लिए भारत की कार्यान्वयन क्षमता उसकी आकांक्षाओं जितनी ही तीव्र एवं प्रभावी होनी चाहिए। सतही या क्रमिक सुधारों का समय बीत चुका है। अब निर्णायक और मूलभूत परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।
तरुण गुप्त
हर साल फरवरी में आने वाले बजट को एक ऐसे राष्ट्रीय पथप्रदर्शक के रूप में देखा जाता है, जिसके माध्यम से देश की ढांचागत समस्याओं के समाधान की आस जुड़ी होती है। हालांकि वास्तविकता यह है कि संसाधन सीमित हैं, लेकिन चुनौतियां विकराल। केंद्रीय वित्त मंत्री के हाथों में जहां करीब 50 लाख करोड़ रुपये के खर्च का बहीखाता होता है, वहीं केंद्र और राज्यों का सम्मिलित सालाना व्यय करीब 100 लाख करोड़ रुपये पहुंच जाता है।
यह भारी-भरकम राशि भी हमारी जीडीपी के 30 प्रतिशत से भी कम है। जबकि विकसित देशों में यह सालाना खर्च उनकी जीडीपी का 40 से 50 प्रतिशत तक होता है। हमारी विशालकाय जनसंख्या को देखते हुए प्रति व्यक्ति पैमाने के संदर्भ में विकसित देशों और हमारे बीच अंतर की यह खाई और चौड़ी हो जाती है।
खर्च की राशि और मात्रा से इतर उसकी गुणवत्ता को समझना भी महत्वपूर्ण है। हमारे कुल व्यय का करीब 25 प्रतिशत ब्याज भुगतान में खर्च हो जाता है, जबकि अधिकांश विकसित देशों में यह स्तर 10 प्रतिशत से कम है। हमारे संदर्भ में ब्याज पर भारी भुगतान का कारण जीडीपी अनुपात में कर्ज के ऊंचे स्तर से अधिक अपेक्षाकृत कमजोर क्रेडिट रेटिंग के चलते मिलने वाला महंगा कर्ज अधिक जिम्मेदार है। ब्याज भुगतान, वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसे खर्च की प्रतिबद्ध मद ही हमारे 60 प्रतिशत संसाधनों को सोख लेती हैं और ऐसी स्थिति में बुनियादी ढांचे से जुड़े परिसंपत्ति निर्माण, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे सामाजिक संकेतकों और रक्षा पर खर्च करने के लिए मात्र 40 प्रतिशत संसाधन शेष रह जाते हैं।
बजट की प्रक्रिया में अपर्याप्त व्यय आवंटन के जरिये एक खराब शुरुआत होती है। कम प्रति व्यक्ति खर्च स्थिति को और बिगाड़ देता है। तिस पर कमजोर क्रियान्वयन हमारी परेशानियां और कई गुना बढ़ा देता है। परिणामस्वरूप विकास के मोर्चे पर कई विसंगतियां सामने आती हैं, जिसे केंद्र और राज्य सरकारों के बजट दूर करने में असमर्थ रहे हैं। चूंकि केंद्र सरकार ही सर्वाधिक राजस्व जुटाती और खर्च करती है तो स्वाभाविक रूप से अपेक्षाओं का बोझ भी उसे ही उठाना पड़ता है। अधिक खर्च करने के लिए वित्त मंत्री को ज्यादा आय की व्यवस्था करनी होगी। पिछले वर्ष प्रत्यक्ष करों के स्तर पर रियायत, वित्तीय वर्ष के मध्य में ही जीएसटी दरों में कटौती और विभिन्न व्यापार समझौतों के अस्तित्व में आने से सीमा शुल्क में संकुचन के बाद अब राजस्व बढ़ाने के लिए नई राह की ओर देखना होगा।
हमारा टैक्स-जीडीपी अनुपात लगभग 12 प्रतिशत है, जबकि अधिकांश विकसित देशों में यह 35 से 45 प्रतिशत के दायरे में होता है। भारत में आयकर चुकाने वाली आबादी दो से तीन प्रतिशत के बीच है, जो विकसित देशों में 45 से 55 प्रतिशत तक होती है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण कृषि आय को कर से छूट दिया जाना है। कृषि से जुड़े हमारे लगभग 40 प्रतिशत अंशभागी कर देनदारी के दायरे से बाहर हैं। इसलिए समृद्ध कृषकों को आयकर के दायरे में लाना होगा। इसके लिए या तो एक निश्चित स्तर से ऊपर की आय अथवा कृषि भूमि आकार को आधार बना सकते हैं। यह राजनीतिक रूप से आज भले ही आत्मघाती प्रतीत हो, परंतु यह वह विचार है, जिसे आकार देने का समय अब आ चुका है।
विनिवेश को लेकर भी हम क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। दिग्गज सार्वजनिक उपक्रमों का समग्र बाजार पूंजीकरण लगभग 40 लाख करोड़ रुपये है। निजीकरण की बात न भी करें तो सरकार बहुलांश हिस्सेदारी अपने पास रखते हुए भी कुछ इक्विटी बेचकर काफी राजस्व जुटाने में सक्षम हो सकती है। भूमि का मुद्रीकरण भी अपार संभावनाओं से भरा अवसर है। चूंकि सरकार के हिस्से में ही सबसे अधिक जमीन है, जिसका एक बड़ा हिस्सा अनुपयोगी पड़ा है, तो उसका प्रभावी उपयोग भी व्यापक राजस्व की राह खोल सकता है।
प्रत्यक्ष करों को तर्कसंगत बनाना सदैव प्राथमिकता में होना चाहिए। लाभांश पर प्राप्तकर्ता के हाथों सीमांत दरों पर कर लगाना दोहरे कराधान का एक स्पष्ट उदाहरण है, जिसे सुधार की सख्त आवश्यकता है। वेतनभोगियों के लिए मानक कटौती बढ़ाना और आवासीय ऋण के ब्याज पर कटौती की सीमा में वृद्धि करना उपयुक्त होगा। ईमानदार करदाताओं को प्रोत्साहन हमारी नीतियों के केंद्र में होना चाहिए।
कतिपय दबावों में अधिकारियों द्वारा सर्वेक्षण एवं छापेमारी के माध्यम से उत्पीड़न समाजवादी दौर की एक अवशेष प्रवृत्ति ही है। इसे समाप्त किया जाए। विवादों, मुकदमों और रिफंड के त्वरित निपटान की एक प्रभावी प्रणाली आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो चली है। हमारी मंशा एक सीमित वर्ग से कर वसूली के बजाय करों के दायरे का विस्तार करने की होनी चाहिए।
यह स्वाभाविक है कि कोई समाज तभी कर अनुपालन के प्रति अधिक उन्मुख होता है, जब उसे यह विश्वास हो कि राज्य के संसाधनों का उपयोग जनसेवा में हो रहा है, न कि राजनीतिक-प्रशासनिक अभिजात वर्ग की विलासिता पर। हमें यह भी समझना होगा कि केंद्रीय बजट एक उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है और केंद्र सरकार केवल राह दिखा सकती है, लेकिन राज्य सरकारों की सक्रिय सहभागिता के बिना कोई आमूलचूल परिवर्तन संभव नहीं है।
जीवन की सुगमता और मानव विकास सूचकांक, कारोबारी सुगमता के लिए अनिवार्य शर्तें होती हैं। वैसे भी केंद्रीय बजट की अपनी सीमा है और वह अकेले ही लक्ष्य तक नहीं पहुंचा सकता। एक ऐसे दौर में जब सत्तारूढ़ व्यवस्था देश के लगभग दो-तिहाई हिस्से में प्रभावी है, तब ‘डबल-इंजन’ को चुनावी नारे से आगे बढ़कर शासन की वास्तविकता में बदलना होगा। मानव विकास सूचकांकों और जीवन की सुगमता से मापे जाने वाले अपेक्षित आमूलचूल परिवर्तन के लिए राज्यों को केंद्र की राजकोषीय मंशा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।
हमें अनुपयोगी भूमि के सार्थक उपयोग, समृद्ध कृषकों को आयकर के दायरे में लाने, सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़ी संभावनाओं को भुनाने, पारस्परिक लाभकारी व्यापार समझौतों को मूर्त रूप देने और एक सुविचारित एवं संतुलित व्यापार नीति लागू करने के बीच संतुलन साधना होगा। तभी हम अपने विकास-घाटे को पाटने की आशा कर सकते हैं। विकसित राष्ट्र बनने के लिए भारत की कार्यान्वयन क्षमता उसकी आकांक्षाओं जितनी ही तीव्र एवं प्रभावी होनी चाहिए। सतही या क्रमिक सुधारों का समय बीत चुका है। अब निर्णायक और मूलभूत परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक हैं)
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