विश्व हिंदी दिवस हिंदी के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर विचार का अवसर है। इस वर्ष प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जिसने वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार की नींव रखी। भारत की आर्थिक प्रगति, भूमंडलीकरण और मनोरंजन उद्योग ने हिंदी को विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर किया है। तकनीक के साथ मिलकर हिंदी अपनी अंतरराष्ट्रीय क्षमता बढ़ा रही है।
कुमुद शर्मा

दस जनवरी का दिन ‘विश्व हिंदी दिवस’ के रूप में हिंदी प्रेमियों को उत्साह से भर देता है। यह दिन हमें हिंदी भाषा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, उसकी वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर विचार-मंथन का अवसर भी प्रदान करता है। इस वर्ष ‘विश्व हिंदी दिवस’ हमारे लिए ऐतिहासिक है, क्योंकि नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन को पचास वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। 1975 में नागपुर में 10 जनवरी को आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार का महत्वपूर्ण प्रयास था, जिसका उद्घोष था-‘वसुधैव कुटुंबकम्’।
30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने उसमें सहभागिता की थी। उस सम्मेलन ने भारत और भारत के बाहर बसे भारतीयों में अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की उत्कंठा जगा दी। उनमें केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर भी हिंदी के प्रचार-प्रसार से जुड़ने का संकल्प जागृत हुआ। राष्ट्रीय और सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैश्विक आवश्यकता की दृष्टि से भी हिंदी का महत्व रहा है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी हिंदी की सेवा की है। इस दृष्टि से बेल्जियम के फादर कामिल बुल्के, मारीशस के अभिमन्यु अनंत, जापान के प्रो. क्यूया दोई, जर्मनी के लोथार लुत्से, मास्को के येवगेनी पेत्रोविच चेलिशेव, श्रीलंका की इंद्रा दसनायक, न्यूजीलैंड के रोनाल्ड स्टुअर्ट मैकग्रेगर तथा हंगरी के इमरै बंधा आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं।
भाषा किसी भी देश की संस्कृति की मूल्यवान उपलब्धि होती है। वह हमारे भावबोध और आत्मबोध का ऐसा हिस्सा होती है, जिसे यदि हमसे काटकर अलग कर दिया जाए तो हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। हर भाषा उसे बोलने वालों के इर्द-गिर्द एक जादुई घेरा खींच देती है। यह जादुई घेरा वस्तुतः भाषा की परिधि ही है, जिसके भीतर हमारी पहचान सुरक्षित रहती है, क्योंकि भाषा किसी समूह के सांस्कृतिक प्रतीक-रूपों में जीवित रहती है। आज हिंदी की वैश्विक उपस्थिति ने सिद्ध कर दिया है कि शब्द-सृष्टि का व्यापार अनंत संभावनाओं से परिपूर्ण है।
विश्व स्तर पर हिंदी की मांग के नए व्यावसायिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ उभर रहे हैं। विश्वभर में बसे भारतीय हिंदी के स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। वे यह भली-भांति जानते हैं कि हर भाषा की संरचना के सामाजिक-सांस्कृतिक स्रोत होते हैं। इसीलिए भाषा हमें अपने इतिहास, मिथक और परंपरा से जोड़ती है। यह जुड़ाव ही सामूहिक अस्मिता बनकर अत्यंत मूल्यवान हो जाता है। इस प्रकार हिंदी का विश्वबोध निर्मित हो रहा है। भारत की तेज आर्थिक प्रगति को देखकर भाषाशास्त्रियों का अनुमान है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपर्क की जो दस भाषाएं होंगी, उनमें हिंदी भी शामिल रहेगी। वह ज्ञान-विज्ञान, उच्च प्रौद्योगिकी तथा नवाचार के वैश्विक परिदृश्य में अपने सामर्थ्य को सिद्ध करेगी। भूमंडलीकरण से जन्मी परिस्थितियों ने भी विश्व भाषा के रूप में हिंदी की स्थिति को सुदृढ़ किया है।
उपभोक्तावादी संस्कृति में भाषा की शक्ति और सामर्थ्य का मानक बाजार बन गया है। आज भाषा समृद्धि के मानदंडों से नियंत्रण और निर्धारण के खेल को स्वीकार या अस्वीकार करती है। भारत के बदलते सांस्कृतिक और आर्थिक माहौल ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भारतीयता को अपनी मार्केटिंग का प्रभावी हथियार बनाकर अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। उन्होंने भारतीय आस्थाओं, परंपराओं और छवियों को विज्ञापनों में जागृत करना शुरू कर दिया है। इन दिनों विज्ञापनों में भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों का व्यापक उपयोग हो रहा है। विज्ञापन निर्माता हिंदी तथा भारतीय भाषाओं का प्रयोग कर भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान को जागृत कर रहे हैं। मनोरंजन उद्योग ने भी हिंदी के वैश्विक क्षितिज को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। हिंदी फिल्मों के माध्यम से हिंदी दुनिया भर के देशों में फैल रही है।
हर भाषा अपने युग की परिस्थितियों और प्रेरणाओं के अनुसार बदलती है। आज ‘तकनीकी वर्चस्व’ के युग में तकनीक हिंदी को नयापन दे रही है। क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों और बोलचाल के शब्दों से हिंदी का नया स्वरूप भी सामने आ रहा है। ऐसे ही विकास के कई मोड़ों से गुजरकर हिंदी अपनी अंतरराष्ट्रीय क्षमता की पहचान बना रही है। हिंदी की अंतरराष्ट्रीय क्षमता का विकास बाजार की जरूरतों से बने विश्वग्राम और विश्व-मानव की मांग भी है। राजभाषा, संपर्क भाषा और जनभाषा के सोपानों को पार कर हिंदी विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है।
उच्च प्रौद्योगिकी के युग में संचार क्रांति के रथ पर आरूढ़ होकर मीडिया के माध्यम से वह अपनी शक्ति से विश्व को परिचित करा रही है। आज आवश्यकता इसकी है कि हम उसकी ठोस सामाजिक और सांस्कृतिक मनोभूमि, उसकी उदारता तथा उसके संरचनात्मक वैशिष्ट्य की अर्थवत्ता को समझें और उसके विस्तार की अनंत संभावनाओं की तलाश करें। यह विश्वास लेकर हिंदी के विकास से जुड़ें कि हिंदी अपनी ऊर्जा से डिजिटल क्रांति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए विश्व मंच पर देश का गौरव बढ़ा सकती है।
(लेखिका महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति हैं)
दैनिक जागरण