वर्तमान समय में समूची दुनिया में लगभग 70 से अधिक कालगणनाएं प्रचलित हैं। बीती सदी में कई यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय कालगणना पर अविश्वास भी जताया था, मगर नासा ने अपनी शोध में साबित कर दिखाया कि भारतीय ज्योतिष की कालगणना ही पूर्णत: सटीक है।

नववर्ष के आयोजन को लेकर सर्वाधिक दिलचस्प तथ्य यह है कि जहां एक ओर दुनिया के अन्य देशों में नया साल मनाने का मूल आधार व्यक्ति विशेष, घटना विशेष, वर्ग विशेष, सम्प्रदाय विशेष अथवा देश विशेष है; वहीं समूचे विश्व में एकमात्र भारतीय नववर्ष ही ऐसा है जिसकी कालगणना विशुद्ध वैज्ञानिक है। भारत के महान खगोलशास्त्रियों ने तारों, ग्रहों, नक्षत्रों, चाँद, सूरज आदि की गति का गहन अध्ययन कर छह ऋतुओं और 12 महीनों पर आधारित जिस भारतीय पांचांग का निर्धारण किया था; वह वाकई अद्भुत है। भारतीय कालगणना का विश्व में कोई मुकाबला नहीं है क्योंकि यह सौरमंडल की गति पर आधारित है।
नक्षत्र के नाम पर माह का नाम
हमारे यहां प्रत्येक मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है, उसी नक्षत्र के नाम पर माह का नाम रखा गया है। चित्रा नक्षत्र के आधार पर चैत्र, विशाखा नक्षत्र के आधार पर बैसाख, ज्येष्ठा नक्षत्र के आधार पर ज्येष्ठ, उत्तराषाढा नक्षत्र के आधार पर आषाढ़, श्रवण नक्षत्र के आधार पर श्रावण, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के आधार पर भाद्रपद, अश्विनी नक्षत्र के आधार पर आश्विन, कृतिका नक्षत्र के आधार पर कार्तिक, मृगशिरा नक्षत्र के आधार पर मार्गशीर्ष, पुष्य नक्षत्र के आधार पर पौष, मघा नक्षत्र के आधार पर माघ एवं उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र के आधार पर फाल्गुन मास निर्धारित है। हमारे खगोलशास्त्रियों ने इस कालगणना के आधार पर दिन-रात, सप्ताह, पखवारा, महीने, साल और ऋतुओं का निर्धारण किया और 12 महीनों और छह ऋतुओं के पूरे एक चक्र यानी पूरे वर्ष की अवधि को “संवत्सर” का नाम दिया।
भारतीय विद्वानों ने वैदिक युग में ही तय कर दी थीं ग्रहण की तिथियाँ
भारतीय ज्योतिष के विद्वानों ने वैदिक युग में बता दिया था कि अमुक दिन, अमुक समय से सूर्यग्रहण होगा। यह कालगणना युगों बाद भी पूरी तरह सटीक साबित हो रही है। यह इतनी सामंजस्यपूर्ण है कि तिथि वृद्धि, तिथि क्षय, अधिक मास, क्षय मास आदि व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाते, तिथि घटे या बढ़े, लेकिन सूर्यग्रहण सदैव अमावस्या को होगा और चन्द्रग्रहण सदैव पूर्णिमा को ही होगा।
सर्वाधिक सटीक है भारतीय कालगणना
वर्तमान समय में समूची दुनिया में लगभग 70 से अधिक कालगणनाएं प्रचलित हैं। बीती सदी में कई यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय कालगणना पर अविश्वास भी जताया था, मगर नासा ने अपनी शोध में साबित कर दिखाया कि भारतीय ज्योतिष की कालगणना ही पूर्णत: सटीक है। बीते कुछ दशकों में इस दिशा में देश-दुनिया में हुई विभिन्न शोधों ने दुनिया भर में भारत के पुरातन ज्ञान को व्यापक मान्यता दिलायी है। भारतीय कालतत्व के विशेषज्ञ मनीषियों के अनुसार यह मानवीय सृष्टि लगभग दो अरब वर्ष पुरानी है। अब भूगर्भीय क्षेत्र में पाश्चात्य वैज्ञानिकों के अनुसंधानों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार भी मानवीय सृष्टि की प्राचीनता 20 हजार वर्ष के निकट जा पहुंची है। इससे पाश्चात्य विद्वानों की पूर्व अवधारणा कि यह विश्व छह-सात हजार वर्ष पूर्व बना था, धराशायी हो चुकी है।
प्रतिपदा तिथि को हुआ था सृष्टि रचना का शुभारम्भ
भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सर्वाधिक महत्वपूर्ण तिथि है। “ब्रह्मपुराण” में उल्लेख मिलता है- चैत्रमासे जगद्ब्रह्मा ससर्ज पृथमेहनि, शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तदा सूर्योदये गति। यानी प्रतिपदा तिथि को ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचनाकर मानव की उत्पत्ति की थी। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी शुभ तिथि को प्रथम भारतीय पांचांग की रचना की थी। जानता दिलचस्प होगा कि उन्होंने इस भारतीय कलेंडर की गणना का आधार सूर्य के स्थान पर चंद्रमा की गति को बनाया। इसके पीछे उनकी विलक्षण दूरदृष्टि ही थी।
चैत्र-शुक्ल प्रतिपदा से ही आरंभ हुए हैं सभी प्रचलित संवत
भास्कराचार्य अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “सिद्धांत शिरोमणि” में लिखते हैं कि भारत में प्रचलित सभी संवत चैत्र-शुक्ल प्रतिपदा से ही आरंभ हुए। विक्रमी संवत कलि संवत के 3044 वर्ष बाद, शक शालिवाहन संवत के 135 वर्ष पूर्व और सन ईस्वी के 57 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ था। वर्तमान के प्रचलित संवतों में सबसे प्राचीन युगाब्द माना जाता है। युगाब्द कलियुग के आरंभ का सूचक है जिसे पांच हजार से अधिक वर्ष हो चुके हैं। मगर देश में सर्वाधिक लोकप्रिय विक्रमी संवत ही है।
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सम्राट विक्रमादित्य ने किया था विक्रमी सवंत का शुभारम्भ
शास्त्रीय उल्लेख बताते हैं कि प्राचीन भारत के सर्वाधिक यशस्वी सम्राट विक्रमादित्य ने जनता का सारा ऋण राजकोष से चुकाकर सारी प्रजा को ऋण मुक्त करने के साथ अनेक जनहितकारी कार्यकर धर्म संसद में अपने नाम का संवत चलाने का अधिकार हासिल किया था। उन्होंने आक्रमणकारी शकों को परास्त कर “शकारि” उपाधि धारण की थी। सम्राट विक्रमादित्य ने न सिर्फ द्वादश ज्योतिर्लिंगों का पुनरुद्धार कराया वरन अयोध्या में राम मन्दिर का पुनर्निर्माण भी कराया। भारत की पश्चिमी अन्तिम सीमा पर हिन्दूकुश के पास प्रथम शक्तिपीठ हिंगलाग माता का मन्दिर बनावाया और असम में कामाख्या देवी का मन्दिर भी बनवाया। यही नहीं, उन्होंने असम से हिन्दूकुश (पेशावर) तक विशाल सड़क मार्ग का निर्माण कर इन दोनों शक्तिपीठों को आपस में जोड़ दिया। अखंड भारत के इस महान राजा ने राष्ट्र की सीमाओं को सामरिक दृष्टि से भी सुरक्षित किया। इन महान राष्ट्रहितकारी कार्यों के बदले उपकृत राष्ट्र ने अपने प्रिय सम्राट के नाम पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन नयी विक्रमी संवत का शुभारंभ कर उन्हें “विक्रमादित्य” की पदवी से सुशोभित किया।
“विक्रमादित्य” यानी विक्रमी सवंत के तेजस्वी सूर्य। जानना दिलचस्प होगा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के जिस दिन (वार) से विक्रमी संवत शुरू होती है, वही इस संवत का राजा होता है तथा जिस वार को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, वह संवत का मंत्री होता है।
भारतीय पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ है विक्रम संवत
सूर्य की अन्य संक्रान्तियों द्वारा वर्ष की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों का निर्धारण होता है। इसी कारण विक्रम संवत भारतीय समाज व्यवस्था में समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ मानी जाती है। हम अपने घर परिवार के समस्त शुभकार्य इसी पंचांग की तिथि से ही आयोजित करते हैं। किसी शुभ कार्य को सम्पन्न करने के लिए जब हम देवशक्तियों का आवाहन करते हैं तो उसके पूर्व एक संकल्प मंत्र बोला जाता है। इस संकल्प मंत्र में हमारी कालगणना का वर्णन मिलता है – ॐ अस्य श्री विष्णु राज्ञया प्रवर्त्य मानस व्रहमणो द्वितीय परार्द्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत मनवन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे अमुक नाम, अमुक गोत्र आदि पूजनं/आवाहनम् करिष्यामहे। जरा विचार कीजिए कि कितना उत्कृष्ट चिंतन है हमारे कालतत्व के मर्मज्ञ मनीषियों का।
मानसिक गुलामी का पर्याय है ग्रिगेरियन नववर्ष
आज की युवा पीढ़ी के कम ही लोग भारतीय नववर्ष की इस वैज्ञानिकता व सांस्कृतिक महत्ता से अवगत हैं तभी तो वे जिस उत्साह से ग्रिगेरियन कैलेंडर के मुताबिक पहली जनवरी को भारतीय नववर्ष मनाते हैं, वह उत्साह व उमंग उनमें भारतीय नववर्ष यानी वर्ष प्रतिपदा को मनाने के प्रति नहीं दिखती। इस अज्ञानता का मूल है आजादी के बाद भी देशवासियों गुलामी की मानसिकता का बना रहना। अंग्रेजों ने देश में शासन के दौरान बड़ी चालाकी से शिक्षा नीति को बदल कर हमारे मनों में अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रति हीन भावना कूट कूट कर कर भर दी। नतीजतन भले ही अंग्रेज चले गये मगर हमारी मानसिकता अंग्रेजियत की पिट्ठू बनी रही। इस साजिश की तस्कीद करता है मैकाले का वह खत जो उसने 12 अक्तूबर 1836 को अपने पिता को लिखा था। उक्त पत्र में उल्लेख मिलता है कि आगामी 100 साल में भारत के लोग रूप और रंग में तो भारतीय दिखेंगे किन्तु वाणी, विचार और व्यवहार में अंग्रेज हो जाएंगे। सचमुच ही आज हमारे जीवन में अंग्रेजियत पूरी तरह हावी हो गयी है। हमारे वेशभूषा, भाषा ही नहीं जन्मदिन, पर्व-त्योहार, विवाह संस्कार आदि समारोहों को मनाने के तौर तरीकों में भी। हम अपने वित्तीय वर्ष के प्रथम दिन 1 अप्रैल को मूर्ख दिवस मानने लगे हैं। हमारे जन्म व विवाह के उत्सव बिना केक व ड्रिंक के पूरे नहीं होते। हम अंग्रेजी नववर्ष मनाने की तैयारियां तो काफी पहले से शुरू कर देते हैं पर अपना भारतीय नववर्ष हमें याद भी नहीं रहता।
राष्ट्र प्रेम व स्वाभिमान जागृत करता है भारतीय नवसंवत्सर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हमारा अस्तित्व, हमारी सांस्कृतिक पहचान व राष्ट्रीय अस्मिता बेहद गहराई से जुड़ी हुई है। यह शुभ दिन हमारे अंतस में राष्ट्र प्रेम व स्वाभिमान जागृत करता है। गौरतलब हो कि चैत्र नवरात्रों का शुभारम्भ, भगवान श्री रामचन्द्र का राज्यारोहण, धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, सन्त झूलेलाल जयंती, गुरु अंगददेव का जयंती, महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा आर्यसमाज की स्थापना तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. केशवराज बलिराम हेडगेवार की जयंती; ये सभी पावन दिवस/अवसर भारतीय नववर्ष का प्रथम दिन वर्ष प्रतिपदा को ही पड़ते हैं। इस वर्ष भारतीय नवसंवत्सर (विक्रमी संवत) 2083 का शुभारम्भ 19 मार्च गुरुवार से हो रहा है। तो आइए इस सुअवसर पर हम सब भारतवासी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा और भारतीय नवसंवत्सर की महत्ता और उपयोगिता को हृदयंगम कर पूरे भावश्रद्धा से इस राष्ट्रीय पर्व को मनाएं ताकि हमारी आगामी पीढ़ी भारत की अमूल्य परम्पराओं की वैज्ञानिकता से अवगत हो सके।
पांचजन्य