राजेश शांडिल्य
भारत का फार्मास्यूटिकल क्षेत्र अब सिर्फ एक उद्योग नहीं,बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाने वाला रणनीतिक स्तंभ बन चुका है। केंद्र सरकार का ताजा अपडेट स्पष्ट करता है कि भारत फार्मेसी के रूप में अपनी मजबूत पहचान दुनिया में गढ़ रहा है,क्योंकि वैश्विक आपूर्ति में लगातार पकड़ बढ़ रही है। उत्पादन के लिहाज से भारत दुनिया में तीसरे और मूल्य के आधार पर 11वें स्थान पर है, जो इसकी औद्योगिक क्षमता, तकनीक और लागत दक्षता को दर्शाता है। घरेलू दवा बाजार का 60 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 130 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान इस क्षेत्र को आर्थिक विकास के प्रमुख इंजन के रूप में स्थापित करता है, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में 4.72 लाख करोड़ रुपये का कारोबार इस विस्तार को और मजबूत करता है।

भारत की असली ताकत उसके निर्यात में दिखाई देती है। वर्ष 2024 25 में 191 देशों को 30.5 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात यह स्पष्ट करता है कि भारतीय दवाएं वैश्विक स्वास्थ्य आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। वर्ष 2000-01 के मुकाबले 16 गुना वृद्धि यह दर्शाती है कि निर्यात आधारित नीतियां जमीन पर असर दिखा रही हैं। वैश्विक जेनेरिक दवाओं में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी और यूनिसेफ के लिए 60 प्रतिशत टीकों की आपूर्ति भारत को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख प्रदाता बनाती है। इसके साथ ही अमेरिका के बाहर सबसे अधिक यूएसएफडीए अनुमोदित मैन्युफैक्चरिंग प्लांट भारत में होना इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल कम लागत का विकल्प नहीं बल्कि गुणवत्ता के मामले में भी विश्वसनीय साझेदार है।
फार्मा क्षेत्र में बढ़ता विदेशी निवेश और नीतिगत समर्थन इस पूरे तंत्र को और मजबूती दे रहे हैं। यह बड़ी सच्चाई है कि इसी वैश्विक भरोसे पर 13,193 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वित्त वर्ष 2025-26 में हुआ। सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने और रोजगार सृजन को गति देने के लिए लागू की गई हैं। इसी के साथ यूरोप, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ हुए व्यापार समझौते ने भारतीय दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के लिए वैश्विक बाजार स्वागत नहीं करोगे हमारा,जैसी स्थिति करते दिख रहा है।इससे निर्यात क्षमता को और विस्तार मिलने की संभावना है।
केंद्र सरकार अब अगले चरण के लिये तैयार है, ताकि बायोफार्मा शक्ति जैसी पहल के माध्यम से भारत उच्च मूल्य वाले बायोफार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग केंद्र के रूप में स्थापित करने की लक्ष्य को साध सके। इसके लिए 10,000 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना के जरिए सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ाकर आम नागरिकों के इलाज का खर्च कम करने पर जोर दिया जा रहा है।इससे यह क्षेत्र केवल निर्यात तक सीमित न रहकर सामाजिक प्रभाव भी पैदा कर रहा है।
स्पष्ट है कि यह पूरी कवायद केवल आंकड़े प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं,बल्कि इसके पीछे सरकार का उद्देश्य भारत को वैश्विक फार्मा केंद्र के रूप में स्थापित करना, निवेश आकर्षित करना, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और स्वास्थ्य सेवा को आर्थिक विकास से जोड़ना है। हालांकि सक्रिय औषधीय घटकों में विदेशी निर्भरता और उच्च स्तरीय अनुसंधान में कमी जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन भारत वैश्विक फार्मास्यूटिकल नेतृत्व की दौड़ में न केवल तेज गति से बढ़ रहा है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक मजबूत रणनीतिक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
पांचजन्य