75% हिंदू लड़कियां जबरन मतांतरण का शिकार, UN की रिपोर्ट ने खोली पाक की पोल
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियों के जबरन मतांतरण और निकाह पर यूएन (UN) ने गंभीर चिंता जताई है। मारिया शाहबाज और सिमरन कुमारी जैसे मामलों के जरिए जानिए कैसे वहां कानून और कट्टरपंथी मिलकर अल्पसंख्यकों का दमन कर रहे हैं।
पूरे विश्व में अपनी आजादी का शोर मचाने वाले पाकिस्तान को यूएन ने जबरदस्त आईना दिखाया है। यूएन विशेषज्ञों ने पाकिस्तान मे शादी के जरिए जबरन मतांतरण पर चिंता जताई है।
पाकिस्तान से लगातार ही यह रिपोर्ट्स आती रहती हैं कि वहाँ पर हिन्दू, सिख, ईसाई और शिया लड़कियों के साथ जबरन निकाह और मतांतरण हो रहे हैं। हाल ही में एक ईसाई लड़की के साथ जबरन निकाह के मामले के बाद यह चिंता और भी चर्चा में आई।
05 मई, 2026 – यूएन (UN) विशेषज्ञों की चेतावनी : पाकिस्तान में जबरन मतांतरण बना ‘अंतर्राष्ट्रीय चिंता’ यूएन के विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि पाकिस्तान में जिस तरह से अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों के साथ जबरन निकाह और मतांतरण हो रहे हैं, वह चिंताजनक है। यूएन विशेषज्ञों ने प्रेस रिलीज जारी करके कहा कि “धर्म या आस्था में कोई भी बदलाव पूरी तरह से ज़बरदस्ती से मुक्त होना चाहिए, और विवाह पूरी तरह से स्वतंत्र सहमति पर आधारित होना चाहिए—जो कि कानूनी तौर पर तब संभव नहीं है, जब पीड़ित कोई बच्चा हो।”
वैसे तो पाकिस्तान में हिन्दू और सिख लड़कियों का जबरन मतांतरण और निकाह होता ही रहता है। परंतु जब उसमें ईसाई समुदाय की लड़कियां भी जुड़ जाती हैं तो अल्पसंख्यकों की आवाज दूर तक जाती है। ऐसा कई लोगों का मानना है कि अभी भी यूएन विशेषज्ञ इसीलिए बोल रहे हैं क्योंकि हाल ही में 13 वर्षीय मारिया शाहबाज का मामला सामने आया है।
मारिया शाहबाज केस : 13 साल की बच्ची के अपहरण और निकाह को अदालत ने दी मंजूरी
दरअसल 29 जुलाई 20225 को मारिया शाहबाज का अपहरण कर लिया गया था और उसकी उम्र महज 13 साल की थी। उसके अपहरण के बाद उसका जबरन निकाह भी पढ़वा दिया गया था। जबकि उसकी उम्र को देखते हुए यह हो ही नहीं सकता था कि वह अपनी मर्जी से यह इजाजत दे सके। मगर जब यह मामला कोर्ट में गया, पाकिस्तान की एक फेडरल कॉन्स्टीट्यूशनल कोर्ट (FCC) ने 25 मार्च, 2026 को इस 13 वर्षीय बच्ची की शादी को जायज ठहराया और उसे उसके अपहरणकर्ता के पास वापस भेज दिया।
इस निर्णय के बाद एक बार फिर से बहस शुरू हुई कि आखिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की लड़कियों के साथ ऐसा क्यों हो रहा है और 13 वर्ष की लड़की क्या अपने आप कोई फैसला कर सकती है?
हालांकि सरकार कभी कभी ऐसा प्रयास करती हुई दिखाई देती है, मगर वहाँ पर कट्टरपंथी इस सीमा तक हवी है कि वे सरकार के किसी भी सही कदम के साथ नहीं चल सकते हैं। इस्लामाबाद कैपिटल टेरिटरी बाल विवाह निषेध विधेयक 2025 और पंजाब बाल विवाह निषेध विधेयक 2026 दो ऐसे कानून हैं, जिनके माध्यम से छोटी लड़कियों का निकाह रोकने का प्रयास किया जा रहा है और इसमें जबरन धर्मपरिवर्तन पर भी रोक का प्रावधान है।
मगर कट्टरपंथी राजनीतिक समूह इन दोनों का ही विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि अगर 18 वर्ष से कम उम्र में धर्म परिवर्तन पर रोक लग गई तो हिन्दू, ईसाई और सिख लड़कियों को मुसलमान बनने से रोका जा सकता है।
जहां एक तरफ ऐसे कानून बनाकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में अपना चेहरा चमकाने का प्रयास है पाकिस्तान का तो वहीं 13 वर्षीय मारिया शाहबाज की कहानी भी ऐसे कानून की पुरजोर वकालत करती है। मगर क्या ऐसे कानून पारित भी हो पाएंगे, क्योंकि अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख और ईसाई लड़कियों को न ही अदालत से कोई राहत मिलती है और न ही शासन से!
USCIRF की रिपोर्ट : बेअदबी कानून के नाम पर ईसाई और अहमदिया समुदाय का दमन
केवल यूएन ने ही नहीं पाकिस्तान को लताड़ा है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में इसे विस्तार से लिखा है कि कैसे पाकिस्तान में लगातार ही धार्मिक पहचान के चलते हिन्दू, सिखों और ईसाई और यहाँ तक कि शिया एवं अहमदिया समुदाय के लोगों के साथ लगातार शोषण और उत्पीड़न हो रहा है।
इसमे बताया कि कैसे बेअदबी के कानून का इस्तेमाल करके लोगों का मुंह बंद कराने का प्रयास किया जाता है। बेअदबी के कानूनों का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसमें लिखा है कि पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के अनुसार पूरे देश में कुल 700 लोग पिछले वर्ष रहे, जिनपर बेअदबी का आरोप लगा है और वे अभी जेल में है। जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 213 थी।
इस रिपोर्ट में एक ईसाई महिला शगुफ्ता किरन का भी नाम है, जिसे पिछले वर्ष सितंबर में ‘इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम अधिनियम’ (PECA) के तहत मौत की सज़ा सुनाई गई थी। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक किरन अपनी अपील पर सुनवाई का इंतजार कर रही हैं।
फिर इस रिपोर्ट में साफ लिखा है कि पूरे 2024 में धार्मिक अल्पसंख्यक—जिनमें पाकिस्तान के शिया और अहमदी मुस्लिम समुदाय शामिल हैं—अक्सर नफ़रत भरे भाषणों, भेदभावपूर्ण कानूनों और मनमानी गिरफ्तारियों का निशाना बनते रहे और इन सब घटनाओं ने मिलकर डर और हिंसा के माहौल को और भी बदतर बना दिया।
इस रिपोर्ट में उन पीड़ितों की सूची भी है, जो लगातार ही बेअदबी के कानून का शिकार हुए हैं, और जो अभी जेल में है। जैसे कि ईसाई अनवर मसीह, जो 2020 से जेल में है। बेअदबी के कानून का शिकार ईसाई से लेकर अहमददिया समुदाय के कई लोग हैं। फँसान शाहिद नामक ईसाई समुदाय का व्यक्ति वर्ष 2022 से बेअदबी के आरोप में बंद है। ऐसे ही आदिल बाबर (ईसाई), अब्दुल मजीद (अहमदिया) जैसे अनेक नाम हैं, जो या तो अपनी सजा का इंतजार कर रहे हैं या फिर सुनवाई चल रही है।
वहीं हिन्दू सिमरन कुमारी अपहरण और मतांतरण का शिकार हुई थी। अगस्त 2020 में 17 वर्षीय सिमरन कुमारी अपने घर से गायब हो गई थी और बाद में पता चला था कि उसका मतांतरण करा दिया गया है। हालांकि यही कहा गया था कि उसने अपने मन से इस्लाम कुबूला है और अदालत में भी लड़की के परिवार के लोगों को मिलने नहीं दिया गया था और अदालत ने भी इस मतांतरण पर मोहर लगा दी थी।
हालांकि ये सब पुराने मामले हैं, नए मामले इस रिपोर्ट में शामिल नहीं किये गए हैं, जो रोज ही हो रहे हैं। पाकिस्तान का अल्पसंख्यक समुदाय लगातार ही हिंसा का शिकार हो रहा है। उनकी लड़कियों का अपहरण और जबरन मतांतरण हो रहा है। इंटरनेट पर तमाम मामले मौजूद हैं।
यूएन विशेषज्ञों की चिंता : सिंध प्रांत बना ‘जबरन कन्वर्जन’ का गढ़, 75% शिकार हिंदू लड़कियां
और हाल ही में यूएन विशेषज्ञों ने भी चिंता जताते हुए कहा भी है कि 2025 में जबरन निकाह के मामलों में 75% शिकार हिन्दू लड़कियां हैं। “2025 में, शादी के ज़रिए ज़बरन धर्म-परिवर्तन से प्रभावित लगभग 75 प्रतिशत महिलाएँ और लड़कियाँ हिंदू थीं, और 25 प्रतिशत ईसाई। इनमें से लगभग 80 प्रतिशत घटनाएँ सिंध प्रांत में हुईं। 14 से 18 साल की किशोरियों को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है, और कुछ लड़कियाँ तो इससे भी कम उम्र की होती हैं।“
मगर इन कम उम्र की लड़कियों की सुरक्षा के लिए कोई भी कानून नहीं है। और कानून बनाने की जरूरत को यूएन के विशेषज्ञों ने जताया है। इनके अनुसार यह जरूरी है कि पाकिस्तान जबरन मतांतरण रोके जाने के लिए, शादी की उम्र हर प्रांत में 18 वर्ष करने के लिए कानून बनाए जिससे कि जबरन मतांतरण को रोका जा सके, और जबरन मतांतरण को भी कानूनन अपराध बनाए।
अधिकारी जांच करने में विफल रहते हैं
विशेषज्ञों ने कहा, “हमें इस बात की गहरी चिंता है कि कानून प्रवर्तन अधिकारी अक्सर पीड़ितों के परिवारों द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों को खारिज कर देते हैं, जबरन धर्मांतरण के मामलों की समय पर जांच करने या मुकदमा चलाने में विफल रहते हैं, अथवा पीड़ितों की उम्र का ठीक से आकलन करने की अपेक्षा करते हैं।“
सोशल मीडिया पर भी बढ़ रहा आक्रोश
इन दोनों रिपोर्ट्स को लेकर सोशल मीडिया पर भी शोर जारी है। जहां भारत में तो लोग बात कर ही रहे हैं, वहीं रॉबर्ट स्पेन्सर जैसे लोग भी इस बात को प्रमुखता से उठा रहे हैं कि कैसे USCIRF और यूनिसेफ मिलकर यह चेताया रहे हैं कि हर साल हजारों कम उम्र की लड़कियों का अपहरण होता है और उनका इस्लाम में जबरन मतांतरण किया जाता है। विदेशी मीडिया भी इन तमाम घटनाओं को कवर कर रहा है और USCIRF ने अमेरिका की सरकार से अनुरोध किया है कि पाकिस्तान के प्रति कठोर कदम भी उठाए जाएं।
देखना होगा कि पाकिस्तान पर क्या कदम उठाए जाते हैं और वह भी तब जब रोज ही ऐसे अनेक मामले सामने आ रहे हैं, जो इंसानियत को शर्मसार करने के लिए पर्याप्त हैं और वह भी केवल और केवल धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ना और अत्याचार के!
पांचजन्य