बीजेपी की हर बड़ी जीत में RSS कैसे बन जाता है बड़ा मददगार
असम से लेकर बंगाल तक बीजेपी की बड़ी जीत में एक बार फिर RSS का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। तमिलनाडु में जिस तरह से हार के बाद भी डीएमके ने सनातन मिटाने की बात की है, उनके लिए बंगाल और असम बड़ी चेतावनी है।
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पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को दो राज्यों में बहुत ही बड़ी जीत मिली है। पश्चिम बंगाल में वह पहली बार सत्ता में आई है, वह भी दो-तिहाई से भी बड़ी बहुमत से। असम में भी उसे तीसरी बार में अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिला है और वो भी दो-तिहाई बहुमत के करीब। इसके पीछे मूल रूप से दो बड़े संगठनों का योगदान है, जो अनेकों छोट-छोटे संगठनों की जुगलबंदी से इस तरह की जीत का स्क्रिप्ट लिखते हैं- खुद बीजेपी और इसके वैचारिक अगुवा संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS)
पश्चिम बंगाल को बीजेपी के लिए केरल और तमिलनाडु के बाद सबसे मुश्किल राज्य माना जाता था। लेकिन, सिर्फ तीसरे गंभीर प्रयास में ही पार्टी ने वहां ममता बनर्जी की टीएमसी की मजबूत जड़ को भी अपनी जीत की आंधी में बुरी तरह से उखाड़ फेंका। असम में भी कांग्रेस की तमाम कोशिशें बीजेपी के सामने हवा हो गईं।
‘बंगाल में हर हिंदू बन गया हिंदू कार्यकर्ता’
बंगाल में बीजेपी की इतनी बड़ी जीत पर RSS में नंबर टू दत्तात्रेय होसबाले का कहना है कि वहां हिंदुवादी संगठनों के सामने ‘सभ्यता का सवाल’ का खड़ा हो चुका था। न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार उन्होंने कहा है कि बंगाल में ‘हर हिंदू वोटर इस बार हिंदू कार्यकर्ता’ बन गया।
यह सिर्फ RSS के स्वयंसेवकों का संघर्ष नहीं था, बल्कि संपूर्ण हिंदू समाज का संघर्ष था।
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बंगाल में RSS ने कैसे किया काम
- उनका कहना है कि बंगाल में RSS और अन्य हिंदू संगठनों को पहले वामपंथी शासन में निशाना बनाया गया और फिर टीएमसी के कार्यकाल में, क्योंकि उन्होंने हिंदुओं के लिए काम किया।
- उन्होंने कहा कि RSS के स्वयंसेवकों ने बंगाल में जो कुछ किया, वह एक नागरिक होने के नाते किया।
- ‘समाज के प्रति अपने प्रेम और समुदाय के लिए अपनी भावना’ से प्रभावित होकर स्वयंसेवकों ने समान विचारधारा वाले लोगों को साथ लिया, उन्हें सुरक्षा देने की कोशिश की और इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जो हिंदू नहीं थे।
बंगाल में बीजेपी का 12 वर्षों का प्रयास
- बीजेपी की मौजूदा बंगाल यात्रा 2014 में शुरू हुई, जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सक्रियता से पार्टी ने वहां पर संगठन में जमीनी स्तर पर गंभीरता से काम शुरू किया।
- इन 12 वर्षों में जिन लोगों ने बंगाल में बीजेपी की सक्रियता देखी है, उनके लिए 294 में से 207 सीट पर जीत आश्चर्यजनक नहीं है।
- यह उन्हें हैरान कर सकता है, जिन्होंने टीवी चैनलों पर अचानक से नतीजे देखें हैं।
जीत में अमित शाह का अमिट योगदान
- अमित शाह ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की तरह 2026 के विधानसभा चुनाव में एक तरह से पश्चिम बंगाल में कैंप कर रखा था।
- उन्हें जो लोग करीब से जानते हैं, वे बतातें है कि वह कई स्तरों पर सोचते हैं, लेकिन लक्ष्य से कभी भी इधर-उधर नहीं होते।
- अमित शाह की सोच के स्तर में सबसे पहले विचारधारा है, जो RSS की जुगलबंदी से मुश्किल से मुश्किल मिशन को भी सफलता की गारंटी बना देता है।
- विचारधारा के नीचे संगठन की बात आती है और इसका अंजाम 2019 में बीजेपी की 303 लोकसभा सीटों के रूप में देखा जा सकता है।
- वे संगठन के नीचे एक सामाजिक गठबंधन पर भी काम करते हैं, जिन्हें राजनीतिक विज्ञान की भाषा में पॉलिटिकल इंजीनियरिंग कहते हैं।
- सामाजिक गठबंधन के नीचे बूथ-स्तरीय संगठन है और सबसे नीचे, पार्टी का हर प्रभावशाली कार्यकर्ता।
बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ताओं का असली संघर्ष
- बीजेपी के ऐसे कार्यकर्ताओं को उसके इलाके के बाहर शायद ही कोई जानता है, लेकिन बीजेपी के लिए वोट गोलबंद करने में इन्हीं की असल भूमिका होती है।
- पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने हिंदुत्व की विचारधारा पर न सिर्फ इन कार्यकर्ताओं ने जमीन काम किया, बल्कि उसके इन बूथ कार्यकर्ताओं ने मतदान के दिन 93% वोटिंग सुनिश्चित करवाने में भी बहुत बड़ा योगदान दिया।
- उन्होंने ही सुनिश्चित किया कि बीजेपी के समर्थक सिर्फ बातें ही न करते रह जाएं, बल्कि मतदान केंद्र पर जाकर वोट डालकर भी आएं।
- बीजेपी की इस रणनीति को RSS की सहायता के बिना अमलीजामा पहनाना लगभग नामुमकिन है।
- जब दोनों ही संगठनों में यह पूर्ण तालमेल होता है, तो नतीजे वही आते हैं, जो बंगाल और असम से लेकर बिहार, हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र तक दे जा चुके हैं।
- 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश वह उदाहरण हैं, जब बीजेपी और RSS पूरी तरह से कदमताल नहीं कर पाते।
तमिलनाडु और केरल बीजेपी-RSS का अगला बड़ा लक्ष्य
- बीजेपी और RSS के लिए अब सबसे बड़ा लक्ष्य तमिलनाडु और केरल का रह गया है।
- यह दोनों ही राज्य इन दोनों संगठनों के प्राथमिकता वाले एजेंडे में हैं।
- पश्चिम बंगाल में पहले लेफ्ट फ्रंट और फिर टीएमसी ने बीजेपी-RSS विचारधारा के खिलाफ जो रणनीति अपनाई, बीजेपी की बड़ी जीत में आज वह सबसे बड़े कारण बन गए।
- तमिलनाडु और केरल की राजनीति में भी अभी जो चल रहा है, वह बीजेपी के भविष्य के लिए उम्मीद की किरण बन रहे हैं।
- RSS ने शायद यही चेतावनी डीएमके नेता और तमिलनाडु विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उदयनिधि स्टालिन को ‘सनातन का समूल नाश’ वाले उनके आपत्तिजनक मंसूबे पर दी है-
यह उनकी (उदयनिधि स्टालिन) राय है और चुनावों में जनता ने इसका जवाब दे दिया है। क्योंकि कोई कहता है, इसलिए सनातन धर्म समाप्त नहीं हो जाएगा।
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नवभारत टाइम्स