ढाका में हजारों हिंदुओं ने भगवान राम की तस्वीर के अपमान और 81 फीट ऊंची राम मूर्ति के निर्माण रोकने के विरोध में प्रदर्शन किया। हिंदू महाजोत ने तारिक रहमान सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया।
23 जून, 2026 – बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शुक्रवार को हजारों हिंदू भगवान राम की तस्वीर के कथित अपमान और एक बड़ी मूर्ति के निर्माण को रोके जाने के विरोध में सड़कों पर उतरे। लोग मशाल जुलूस निकालकर चले और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। हिंदू महाजोत समेत कई संगठनों इस प्रदर्शन का आह्वान किया था।
ढाका की सड़कों पर हिंदू समुदाय
रंगपुर इलाके में कट्टरपंथी समूहों द्वारा भगवान राम की सबसे ऊंची मूर्ति के काम का विरोध करने और उनकी तस्वीर का अपमान करने की घटना के बाद यह प्रदर्शन हुआ। हिंदू संगठनों के लोग शाहबाग चौराहे पर इकट्ठा हुए। वहां से वे नेशनल प्रेस क्लब तक मार्च निकालकर गए। प्रेस क्लब के सामने मानव श्रृंखला बनाई गई। कुछ लोग ढाका रिपोर्टर्स यूनिटी के पास भी अपना विरोध दर्ज कराने पहुंचे। रंगपुर में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की तो हल्की झड़प भी हुई। लोगों की मुख्य मांग है कि दोषियों को जल्द गिरफ्तार किया जाए।
पूरा मामला क्या है?
इस महीने की शुरुआत में गाइबांधा में एक प्रदर्शन के दौरान कट्टरपंथी भीड़ ने भगवान राम की एक तस्वीर पर जूता रखकर अपमान किया था। इस घटना में केस दर्ज हो चुका है, लेकिन अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। इसी बात पर हिंदू समुदाय नाराज है।
राम मूर्ति का निर्माण क्यों रोका गया?
उत्तर बांग्लादेश के गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी में श्री श्री राधा गोविंद मंदिर परिसर में भगवान राम की 81 फीट ऊंची मूर्ति बनाई जा रही थी। काम का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा पूरा हो चुका था। इस प्रोजेक्ट में 50 फीट की कृष्ण मूर्ति और 30 फीट की शिव मूर्ति भी बननी थी। कुल लागत लगभग 22 करोड़ बांग्लादेशी टका (करीब 16 करोड़ रुपये) बताई जा रही है।
मंदिर समिति के अध्यक्ष हरिदास चंद्र दास ने बताया कि कट्टरपंथी समूहों की धमकियों के कारण काम रोकना पड़ा। एक मौलवी ने बुलडोजर से मूर्ति गिराने की धमकी भी दी थी। समिति के सलाहकार श्यामलाल कुमार महंत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए फिलहाल निर्माण रोक दिया गया है। आयोजकों ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान से हस्तक्षेप करने की अपील की है।
सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम
प्रदर्शनकारियों ने तारिक रहमान की बीएनपी सरकार पर निष्क्रिय रहने का आरोप लगाया। उन्होंने दोषियों की गिरफ्तारी के लिए 72 घंटे का समय दिया है। अगर मांगें नहीं मानी गईं तो आगे और रैलियां निकाली जाएंगी। शनिवार को धार्मिक मामलों के मंत्रालय को ज्ञापन सौंपा जाना है।
हिंदू महाजोत ने साफ कहा कि अगर राम मूर्ति का काम दोबारा शुरू नहीं होने दिया गया तो पूरे बांग्लादेश के 64 जिलों में एक-एक करके राम मंदिर बनाए जाएंगे। राष्ट्रीय पूजा उत्सव समिति ने शनिवार से देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की है।
अल्पसंख्यकों की स्थिति
बांग्लादेश में हिंदू आबादी कुल जनसंख्या का करीब 8 प्रतिशत है। वे सबसे बड़ा धार्मिक अल्पसंख्यक समूह हैं। पिछले कुछ समय में हिंदुओं के खिलाफ सांप्रदायिक घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच ही 133 ऐसी घटनाएं दर्ज की गईं। प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने देश को “सभी का” बताया था, लेकिन स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं।
पांचजन्य
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ढाका में जागा हिंदू समाज: श्रीराम के अपमान पर शाहबाग में अभूतपूर्व मशाल जुलूस, ‘हिन्दू महाजोत’ ने हिलाया बांग्लादेश
बांग्लादेश की राजधानी ढाका के शाहबाग में हिंदू महाजोत के बैनर तले हजारों हिंदू छात्रों ने मशाल जुलूस निकाला। गायबांधा में निर्माणाधीन 81 फीट की श्रीराम प्रतिमा के अपमान के विरोध में फूटा गुस्सा।
ढाका (बांग्लादेश)। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शुक्रवार, 19 जून को एक ऐसा अभूतपूर्व और ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला जिसने समूचे देश की राजनीतिक और सामाजिक हलचल को स्तब्ध कर दिया। कल तक बहुसंख्यक कट्टरपंथियों के अत्याचारों को मूकदर्शक बनकर सहने वाला अल्पसंख्यक हिंदू समाज इस बार पूरी ताकत, एकजुटता और प्रखर आत्मविश्वास के साथ सड़कों पर उतर आया।
ढाका के नेशनल प्रेस क्लब के सामने एक विशाल मानव श्रृंखला बनाने के बाद दोपहर तक विभिन्न विश्वविद्यालयों के हजारों हिंदू छात्र शाहबाग क्षेत्र में एकत्र हो गए।
गायबांधा में निर्माणाधीन 81 फीट की श्रीराम प्रतिमा पर भड़के कट्टरपंथी
इस अभूतपूर्व जनाक्रोश का मुख्य केंद्र बांग्लादेश का ‘गायबांधा’ (Gaibandha) जिला बना हुआ है। यदि भौगोलिक दृष्टि से देखें तो गायबांधा जिला बांग्लादेश के मानचित्र के शीर्ष (गले के स्थान) पर स्थित है। इस जिले के पलाशबाड़ी गांव में हिंदू समुदाय द्वारा भगवान श्रीराम की एक भव्य 81 फीट ऊँची प्रतिमा का निर्माण किया जा रहा है।
प्रतिमा निर्माण की वर्तमान स्थिति और विवाद की कड़ियां:
- 80% कार्य पूरा: स्थानीय श्री श्री राधा गोविंद और काली मंदिर परिसर में निर्माणाधीन इस भव्य मूर्ति का लगभग 80 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। यह पूरा प्रोजेक्ट राधा गोविंद मंदिर समिति के अध्यक्ष हरिदास चंद्रदास के कुशल नेतृत्व में चल रहा है।
- कट्टरपंथियों की धमकी: विगत कुछ दिनों से स्थानीय इमाम-उलेमा परिषद तथा अन्य कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के भारी विरोध और फतवों के कारण निर्माण कार्य को पूरी तरह रोक दिया गया है। कट्टरपंथियों ने सरेआम मूर्ति को ध्वस्त करने की धमकी दी है।
- धार्मिक अवमानना की पराकाष्ठा: इस सप्ताह कुछ उपद्रवी असामाजिक तत्वों ने मंदिर परिसर में घुसकर निर्माणाधीन श्रीराम प्रतिमा पर जूते-चप्पलों का ढेर लगा दिया। इस घृणित कृत्य ने बांग्लादेश के शांत हिंदुओं के सब्र का बांध तोड़ दिया।
जगन्नाथ विश्वविद्यालय के छात्रों ने सुलगाई आंदोलन की चिंगारी
श्रीराम प्रतिमा के अपमान की खबर फैलते ही ढाका के दक्षिणी हिस्से में स्थित प्रतिष्ठित ‘जगन्नाथ विश्वविद्यालय’ के हिंदू छात्र सबसे पहले अपनी धार्मिक अस्मिता की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे। छात्रों के इस प्रारंभिक प्रतिरोध ने समूचे बांग्लादेश के सुप्त हिंदू समाज में एक राष्ट्रव्यापी चिंगारी का काम किया।
इसी जागृति के परिणामस्वरूप, शुक्रवार को ‘बांग्लादेश राष्ट्रीय हिंदू महाजोत’ (Bangladesh National Hindu Grand Alliance) के संयुक्त बैनर तले ढाका में यह ऐतिहासिक और विशाल प्रदर्शन संपन्न हुआ, जिसमें हिंदुओं ने अंतरिम सरकार को सख्त अल्टीमेटम भी दिया है।
बांग्लादेश में हिंदुओं की घटती आबादी और राजनीतिक शून्यता
विभाजन के समय से लेकर आज तक पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हिंदुओं की जनसांख्यिकी (Demography) और उनकी राजनीतिक शक्ति के ह्रास का विश्लेषण नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:
सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आयाम वर्तमान स्थिति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हिंदू जनसंख्या (बांग्लादेश) लगातार दमन के कारण अब केवल 9% से 10% बची है।
ऐतिहासिक नरसंहार (Genocide) वर्ष 1947 से 1975 (पूर्वी पाकिस्तान काल) और फिर
स्वतंत्र बांग्लादेश में लगातार मंदिरों को तोड़ा गया। 1971
के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी सेना ने हिंदुओं का क्रूर
नरसंहार किया।
वर्ष 2024 का तख्तापलट अवामी लीग सरकार के पतन के बाद मचे अराजक
माहौल में सैकड़ों हिंदू घरों को जलाया गया और कई
निर्दोष हिंदुओं की ‘मॉब लिंचिंग’ (भीड़ द्वारा पीट-पीटकर
हत्या) की गई।
वैश्विक मानवाधिकारों का पाखंड इन सभी क्रूरताओं पर वैश्विक मीडिया, सेक्युलर
विमर्शकार और ह्यूमन राइट्स संगठन हमेशा पूरी तरह
खामोश रहे।
समझिए कहाँ से आया हिंदुओं में यह अभूतपूर्व साहस?
इस बड़े आंदोलन के बाद राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं कि आखिर जो हिंदू समाज हमेशा डरा-सहमा रहता था, उसमें इतना बड़ा सांगठनिक साहस और प्रतिकार की भावना अचानक कहाँ से आई? इसका सीधा और तार्किक उत्तर है— पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव परिणाम!
पश्चिम बंगाल के चुनावी मंथन से जो प्रखर हिंदुत्व और वैचारिक सांस्कृतिक चेतना की लहर निकली, उसने सीमा पार बांग्लादेश के हिंदुओं में संजीवनी का कार्य किया है। इस वैचारिक उभार ने वहां के अल्पसंख्यक समाज को यह भरोसा दिलाया कि वे लावारिस नहीं हैं। इसी हौसले ने उनके खोए हुए आत्मविश्वास को पुनर्जीवित किया, जिसके बल पर आज वे कट्टरपंथियों को सीधी चुनौती दे रहे हैं।
‘संगठन ही शक्ति है’
यदि हम इतिहास की तुलना करें, तो भारत का मुस्लिम समुदाय विभिन्न धड़ों में बंटा होने के बावजूद रणनीतिक और राजनीतिक मोर्चों पर पूरी तरह संगठित है। भारत में विभाजन के बाद भी ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ जैसी पार्टियां जिंदा रहीं, जो केरल जैसे राज्यों में किंगमेकर की भूमिका निभाती रहीं। इसके विपरीत, विभाजन के पूर्व हिंदुओं की एकमात्र राजनीतिक आवाज ‘हिंदू महासभा’ (जिसके पास डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और निर्मल चंद्र चटर्जी जैसे दिग्गज नेता थे, जिनकी वजह से आज पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा है) पूर्वी पाकिस्तान के बनते ही बिखर गई। 1950 में ढाका, बारिसाल और खुलना में हुए भयानक हिंदू विरोधी दंगों ने बचे-खुचे हिंदू नेतृत्व की रीढ़ तोड़ दी, जिसके कारण हिंदू समाज कभी राजनीतिक ताकत के रूप में नहीं उभर सका।
“दुनिया हमेशा केवल संगठित शक्ति को ही नमन करती है। वर्ष 2006 में बांग्लादेश में कुछ हिंदू संगठनों ने मिलकर ‘हिंदू महाजोत’ का गठन अवश्य किया था, परंतु उनकी गतिविधियां सामाजिक स्तर तक सीमित थीं। वे हमेशा शेख हसीना की अवामी लीग के भरोसे बैठे रहे। लेकिन 2024 के तख्तापलट के बाद जब उन पर एकतरफा अत्याचार हुए, तब उन्हें समझ आया कि आत्मरक्षा के लिए स्वयं संगठित होना होगा।”
19 जून का यह ऐतिहासिक आंदोलन इस बात का प्रत्यक्ष और सबसे बड़ा प्रमाण है कि बांग्लादेश का हिंदू अब पूरी तरह से जाग चुका है। वे अब किसी राजनीतिक दल की बैसाखी के भरोसे रहने के बजाय अपनी सामूहिक और सांगठनिक शक्ति का हुंकार भर रहे हैं, जो वैश्विक स्तर पर हिंदू समाज के लिए एक अत्यंत सकारात्मक और निर्णायक दृश्य है।
पांचजन्य
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