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बच्चों पर मंडराता साइबर खतरा

July 4, 2026 By Guest Author

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सरकार, तकनीकी कंपनियां, विद्यालय, अभिभावक और समाज के सभी कल-पुर्जे आपस में तालमेल बैठाते हुए एक ऐसी डिजिटल अर्थव्यवस्था का निर्माण करें, जहां बच्चों को केवल डिजिटल उपभोक्ता या श्रमिक न बनाकर, सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त डिजिटल नागरिक बनाया जा सके।

डॉ. विशेष गुप्ता

तेजी से बढ़ रहा साइबर क्राइम, इन बातों का रखेंगे ख्‍याल तो बचे रहेंगे -  Cyber crime is increasing rapidly if you take care of these things you will  be saved

इंटरनेट मीडिया की दुनिया में आज बच्चों का बचपन लाइक्स और व्यूज के बीच पलने को मजबूर है। बच्चे के मोबाइल स्क्रालिंग, चैटिंग, रील्स देखने के साथ-साथ रील्स बनाने में मां-बाप की सक्रिय सहभागिता चिंता का विषय बन रही है। इसके कारण 80 प्रतिशत से भी अधिक बच्चों के चित्र अथवा उनके वीडियो इंटरनेट पर विद्यमान हैं। इसका अर्थ है कि खेलने, खाने, पढ़ने और कुछ रचनात्मक कार्य करने की उम्र में हम स्वयं ही उन्हें साइबर बुलिंग, आनलाइन शोषण, डिजिटल लत के साथ-साथ निजता के हनन और अनचाहे मानसिक दबाव की ओर घकेल रहे हैं।

विश्व में आज करीब 40 करोड़ बच्चे इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। भारत में नौ से तेरह साल के लगभग 76 प्रतिशत बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम एवं यू-ट्यूब जैसे इंटरनेट मीडिया का प्रयोग केवल समय बिताने के लिए ही नहीं कर रहे, बल्कि वे किड्स इन्फ्लुएंसर बनने की ओर भी अग्रसर हैं। आज अकेले इंस्टाग्राम पर 83 हजार से भी अधिक किड्स इन्फ्लुएंसर सक्रिय हैं। हाल के वर्षों में इनकी संख्या में 41 प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि हुई है।

इंटरनेट मीडिया से संलग्न बच्चे अब केवल रील्स अथवा वीडियो देखने वाले ही नहीं रह गए हैं, बल्कि कंटेंट क्रिएटर और प्रमोशन के लिए ब्रांड भी बन रहे हैं। कंटेंट क्रिएशन से ये लाखों रुपये भी अर्जित कर रहे हैं। सर्वेक्षण बताते हैं कि 2010 के बाद पैदा हुए 37 प्रतिशत बच्चे इंटरनेट मीडिया के क्षेत्र में इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं। इन बच्चों के एकाउंट, उनकी वीडियो शूटिंग, उसका संपादन तथा इंटरनेट मीडिया पर अपलोड करने के कार्य इन बच्चों के मां-बाप संभालते हैं। यह किड्स डिजिटल इकोनमी केवल एक आर्थिक अवधारणा ही नहीं है, यह बाल अधिकारों, सुरक्षा, गोपनीयता और नैतिकता से जुड़ा मुद्दा भी है।

ऑनलाइन गेम्स का खतरनाक जाल! बच्चों को शिकार बना रहा साइबर क्राइम का नया  हथकंडा - tips to protect kids from cyber crime akshay kumar nitara parental  tips tvisp - AajTak

जब बच्चे इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय होते हैं, वीडियो देखते या गेम खेलते हैं, तो वे केवल मनोरंजन ही नहीं, डाटा भी उत्पन्न कर रहे होते हैं। उनके व्यवहार, आदतें, पसंद-नापसंद, रुचियां इन डिजिटल कंपनियों के लिए एक आर्थिक वैल्यू लिए होती हैं। यानी जब कोई बच्चा विडियो देखता है, कोई एप डाउनलोड करता है, गेम खेलता है अथवा आनलाइन कक्षा में भाग लेता है, तो ऐसे समय में उसकी लोकेशन, व्यवहार और उसकी रुचियों से जुड़े डाटा एकत्र किए जाते हैं। डिजिटल कंपनियां इस डाटा का उपयोग मार्केट रिसर्च, विज्ञापनों, व्यावसायिक रणनीतियों के निर्माण तथा एल्गोरिदमिक सिफारिशों के लिए करती हैं। यही वजह है कि बच्चों से जुड़े डाटा की सुरक्षा आज गंभीर चिंता का विषय बन रही है।

यह डिजिटल अर्थव्यवस्था बच्चों को शिक्षा, नवाचार, उद्यमिता और नए वैश्विक अवसरों से जोड़ सकती है, परंतु इस लालच में यदि हमने उनकी डिजिटल सुरक्षा, गोपनीयता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा की तो यह गंभीर चुनौती भी बन सकती है। वर्तमान में इसके संकेत सामने आने भी लगे हैं। आज जब डिजिटल क्रांति की रफ्तार तेज है, ऐसे में संपूर्ण विश्व में यह बहस तेज हो रही है कि हम कहीं बच्चों को डिजिटल बाल श्रमिक तो नहीं बना रहे हैं। इस डिजिटल युग में कारखानों की जगह स्मार्ट फोन और मशीनों की जगह एल्गोरिदम ने ले ली है।

भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में बच्चों पर इंटरनेट मीडिया के बढ़ते दुष्प्रभाव को देखते हुए पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने बच्चों की आनलाइन प्लेटफार्म पर सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए। आस्ट्रेलिया ने अपने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया प्रतिबंधित कर दिया है। फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, इंडोनेशिया एवं मलेशिया ने भी किशोरों की आनलाइन सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाए हैं। ब्रिटेन भी इसी तरह की योजना बना रहा है। इसे देखते हुए भारत में भी 16 साल से कम उम्र के किशोरों के लिए इंटरनेट मीडिया के प्रयोग पर पाबंदी को लेकर बहस तेज हो रही है। बच्चों के 5-6 घंटे इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर रहने से उनमें भावनात्मक कमजोरी के साथ-साथ उनकी सोचने और समझने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी लगातार घट रही है।

आनलाइन सुरक्षा से जुड़े कानून बच्चों पर मंडरा रहे साइबर खतरे को नियंत्रित तो कर सकते हैं, परंतु वे समाज को सजग करने का काम नहीं कर सकते। इसके लिए समाज में व्यापक विमर्श की आवश्यकता है। माता-पिता एवं अभिभावकों को समझना पड़ेगा कि बच्चों की वास्तविक सफलता डिजिटल दुनिया में लाइक्स, व्यूज और कंटेंट निर्माण से नहीं आंकी जा सकती। वास्तविक सफलता तो शिक्षा और समाज के जरिये उनके संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास है।

इसलिए विद्यालयों को छात्रों एवं अभिभावकों को डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम का हिस्सा बनाना पड़ेगा। बाल अधिकारों को डिजिटल अधिकारों के साथ जोड़ते हुए डिजिटल कंपनियों की भी जवाबदेही तय करनी पड़ेगी। सरकार, तकनीकी कंपनियां, विद्यालय, अभिभावक और समाज के सभी कल-पुर्जे आपस में तालमेल बैठाते हुए एक ऐसी डिजिटल अर्थव्यवस्था का निर्माण करें, जहां बच्चों को केवल डिजिटल उपभोक्ता या श्रमिक न बनाकर, सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त डिजिटल नागरिक बनाया जा सके।

(लेखक समाजशास्त्री हैं)

दैनिक जागरण


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Filed Under: National Perspectives, Stories & Articles, Technology

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