असीम मुनीर-शहबाज ने क्यों साधी चुप्पी? समझें बड़ा खेल
बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। इस सूबे में कई दशक से बलूच समूह सक्रिय हैं, जो पाकिस्तान से या तो ज्यादा स्वायत्तता या फिर अलग देश बनाने की मांग कर रहे हैं।
07 अगस्त, 2026 – इस्लामाबाद: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में आर्मी और सरकार के खिलाफ गुस्सा कोई नई बात नहीं है। बूलच दशकों से पाक आर्मी और सरकार से अपने अधिकारों की मांग करते रहे हैं लेकिन प्रांत में हालिया दिनों में नई बात देखी जा रही है कि बूलच गुट खुलकर आजादी की घोषणा कर रहे हैं। बलूचों ने 11 अगस्त को ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ का स्वतंत्रता दिवस घोषित कर दिया है। दिलचस्प बात ये है कि इस बड़े ऐलान पर पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर और पीएम शहबाज शरीफ पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं।
रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान कहने वाले संगठन ने 11 अगस्त को बलूचिस्तान का स्वतंत्रता दिवस घोषित करते हुए दुनियाभर के बलूच लोगों से इसे मनाने की अपील की है। सोमवार को जारी बयान में रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने बलूच समुदायों से राष्ट्रीय एकता के साथ यह दिन मनाने का आग्रह किया। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एक स्वतंत्र और संप्रभु बलूचिस्तान को मान्यता देने की अपील की है।
बलूचिस्तान में उठापटक
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब सोशल मीडिया पर स्वतंत्र रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान के दावे बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। इस घोषणा पर बढ़ती चर्चा के बावजूद पाकिस्तानी सरकार ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। पाकिस्तान लगातार अपने पुराने रुख पर कायम है कि बलूचिस्तान देश का एक अभिन्न अंग है।
इस्लामाबाद ने बार-बार बलूचिस्तान की आजादी की घोषणाओं को खारिज किया है और कहा है कि प्रांत के अलग होने का कोई सवाल ही नहीं है। हालांकि नई घोषणा पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया ना आने से यह सवाल उठ रहे हैं कि पाकिस्तान क्यों चुप है, जबकि बलूच आंदोलन अपने अभियान से दुनिया का ध्यान खींच रहा है।
पाकिस्तान क्यों चुप हो
सवाल लगातार उठा है कि पाकिस्तान ने चुप रहने की रणनीति क्यों अपनाई है। इसका एक संभावित कारण यह हो सकता है कि इस्लामाबाद इस घोषणा को ज्यादा प्रचार देने से बचना चाहता हो। पाकिस्तान का कड़ा जवाब अभियान को बढ़ा सकता है और ज्यादा अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित कर सकता है। चुप रहकर पाकिस्तान शायद इस मुद्दे को दुनिया की नजर में लाने ले बचने की कोशिश कर रहा है।
एक और संभावना यह है कि पाकिस्तान इस घोषणा के पीछे के समूह को बलूचिस्तान का वैध प्रतिनिधि नहीं मानता। इसलिए आधिकारिक प्रतिक्रिया के जरिए उनके दावों को महत्व देने का कारण नहीं देखता है। यह भी संभव है कि राजनेताओं के बजाय सुरक्षा एजेंसियां खुफिया जानकारी और कानून प्रवर्तन उपायों के जरिए इस मामले को संभाल रही हों और सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहने से बच रही हों।
राजनयिक और राजनीतिक गणना
बलूचों की घोषणा में अंतरराष्ट्रीय मान्यता की अपील शामिल है। पाकिस्तान शायद यह देख रहा हो कि कोई विदेशी सरकार, अंतरराष्ट्रीय संगठन या प्रभावशाली राजनीतिक हस्ती इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है। उसके बाद ही इस्लामाबाद अपना सार्वजनिक रुख तय करेगा। इसके अलावा तुरंत प्रतिक्रिया ना देने का फैसला एक व्यापक संचार रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की चुप्पी का मतलब यह नहीं है कि उसने इस बयान को स्वीकार कर लिया है। इसका यह भी मतलब नहीं है कि इस्लामाबाद ने बलूचिस्तान के पाकिस्तान का हिस्सा होने के अपने पुराने रुख को बदल दिया है या भविष्य में नीतिगत बदलाव की ओर जाएगा। पाकिस्तान की चुप्पी देखो और इंतजार करो की रणनीति ज्यादा है।
नवभारत टाइम्स