‘हिंदू महिला को बना दिया ‘फातिमा बीबी’, अब्बा मुसलमान’
साहिबगंज के बरहेट में मिता देवी को फातिमा बीबी बनाने का पूरा रैकेट उजागर। एक ही आधार, फर्जी वंशावली और सरकारी अधिकारियों की मोहर। SIR अभियान ने क्या-क्या खोला?
03 नवंबर, 2026 – नई दिल्ली : एक तरफ पूरे देश में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। दिल्ली के रामलीला मैदान से भी देशभर में यह संदेश दिया गया कि भारत की जनता के वोट चोरी हो रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ झारखंड में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में ऐसे-ऐसे खुलासे हो रहे हैं, जिन्हें जानने के बाद आपके होश उड़ जाएंगे और आपको भी पता चलेगा कि कुछ कट्टरपंथी मानसिकता के लोग किस तरह से कागजातों की हेराफेरी के जरिए न सिर्फ हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कलंकित कर रहे हैं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अपने निर्वाचन क्षेत्र बरहेट (साहिबगंज) से सामने आए इस मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कैसे प्रशासनिक तंत्र की आँखों में धूल झोंककर भारत की जनसांख्यिकी को बदलने का खेल चल रहा है।
जानिए, क्या है मामला?
मूल रूप से गोड्डा की रहने वाली हिंदू महिला मिता देवी (पिता- जालश रंजन दत्ता) की शादी वर्ष 2012 में बरहेट प्रखंड के बरमसिया गाँव निवासी प्रीतम कुमार चंद्र के साथ हुई थी। प्रीतम बाहर रहकर मेहनत-मजदूरी करता है और मिता देवी के पहले पति से तीन बच्चे हैं, जो फिलहाल उनके पास ही सुरक्षित हैं।
प्रीतम के बाहर रहने की वजह से नजरुल अंसारी ने मिता देवी को अपने प्रेमजाल में फँसा लिया और उनके संपर्क में आ गया। करीब आठ वर्ष पूर्व दोनों ने कथित तौर पर न सिर्फ रिश्ता बना लिया, बल्कि लोगों का कहना है कि मिता देवी ने अपने तीन बच्चों को छोड़कर उससे निकाह भी कर लिया। इसके बाद मिता देवी की पहचान भी मिटाने की कोशिश हुई और मिता का नाम बदलकर फातिमा बीबी रख दिया गया। इसके बाद मिता उर्फ फातिमा को नजरुल से भी दो बच्चे हुए। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ, जब इस कथित अवैध रिश्ते और मतांतरण को कागजों में वैध बनाने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक जाल बुना गया।
मिता देवी को फातिमा बीबी के रूप में स्थापित करने के लिए नियमों और कानूनों को ताक पर रख दिया गया। सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सुराग तब हाथ लगा, जब यह पता चला कि मिता देवी और फातिमा बीबी, दोनों के अलग-अलग पहचान पत्रों पर आधार नंबर बिल्कुल एक ही दर्ज है। इसके अलावा, महिला का पुराना पैन कार्ड इस बात की गवाही दे रहा था कि उनकी मूल पहचान हिंदू ही थी।
इस खेल को कानूनी जामा पहनाने के लिए नेजामुद्दीन मोमिन नाम के व्यक्ति को फातिमा (मिता) का ‘पिता’ बना दिया गया। जब नेजामुद्दीन की छह संतानों का मामला सामने आया, तो बरहेट के निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी बिजय कुमार ने 26 सितंबर को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण माँगा। इसके जवाब में नेजामुद्दीन ने कथित तौर पर एक फर्जी वंशावली तैयार करवाई, जिसमें फातिमा बीबी को अपनी छह संतानों में दूसरे नंबर पर दिखा दिया गया। हैरानी की बात तो यह है कि इस कथित फर्जीवाड़े के खेल में ग्राम प्रधान सुशील टुडू, राजस्व उपनिरीक्षक, सीआई और अंचलाधिकारी जैसे सरकारी अधिकारियों ने बिना किसी भौतिक सत्यापन के इस वंशावली पर अपनी मुहर लगाकर इसे सत्यापित कर दिया। नतीजतन, महिला का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो गया।
एक अज्ञात नागरिक ने किया पर्दाफाश?
इस पूरे खेल का पर्दाफाश तब हुआ, जब किसी अज्ञात नागरिक ने जिले के उपायुक्त दीपक कुमार दुबे और मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार को एक गुमनाम पत्र भेजा। इस पत्र के साथ सात ऐसे पुख्ता दस्तावेज संलग्न थे, जिन्होंने इस पूरे सिंडिकेट के होश उड़ा दिए। इनमें एसआईआर का भरा हुआ फॉर्म, समान आधार नंबर वाले दोनों आधार कार्ड, पैन कार्ड और अधिकारियों के हस्ताक्षर वाली कथित फर्जी वंशावली शामिल थी।
इस शिकायत में मुख्य आरोपी सलामत अंसारी (नेजामुद्दीन का पुत्र), ग्राम प्रधान सुशील टुडू और संलिप्त सरकारी अधिकारियों पर देश की आंतरिक सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता से खिलवाड़ करने का गंभीर आरोप लगाया गया। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी तत्काल गहन जाँच के आदेश दिए हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब निर्वाचन आयोग और जिला प्रशासन ने ताबड़तोड़ कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार ने इस पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए उपायुक्त से ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ तलब की है।
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के सख्त निर्देशों के बाद हरकत में आए साहिबगंज के उपायुक्त ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संबंधित सभी अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की। डीसी ने इस पूरे प्रकरण में संलिप्त अधिकारियों की भूमिका और दस्तावेजों की दोबारा गहन जाँच करने के कड़े निर्देश दिए हैं, ताकि इस फर्जीवाड़े में शामिल हर एक चेहरे को बेनकाब किया जा सके। मामले के तूल पकड़ने के बाद गोड्डा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने भी अपने एक्स हैंडल पर टिप्पणी करते हुए लिखा, “झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठ और बदलती जनसांख्यिकी का मामला लगातार गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आखिर मतदाता सूची में ऐसी विसंगतियाँ कैसे हुईं? इसके पीछे किसकी लापरवाही है और कौन जिम्मेदार है? उन्होंने आगे कहा कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष एवं गहन जाँच होनी चाहिए। यदि फर्जी दस्तावेजों या गलत तरीके से नाम दर्ज कराने की पुष्टि होती है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।”
संथाल परगना (साहिबगंज, पाकुड़ आदि जिले) में जनसांख्यिकीय बदलाव का मुद्दा लंबे समय से विवादित रहा है। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है, क्योंकि जनगणना के आँकड़ों के अनुसार, 1951 में जनजातीय समाज की हिस्सेदारी लगभग 44.67% थी, जो 2011 में घटकर लगभग 28.11% रह गई। इसके साथ ही मुस्लिम आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, जो क्षेत्रीय स्तर पर 1951 के करीब 9-10% से बढ़कर 2011 में 22% के आसपास पहुँच गई। साहिबगंज-पाकुड़ में तो यह वृद्धि और अधिक देखने को मिली है।
इसी के साथ केंद्र सरकार के द्वारा झारखंड हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में घुसपैठ (विशेषकर साहिबगंज-पाकुड़) को स्वीकार किया था और जनजातीय समाज की हिस्सेदारी घटने के मुख्य कारणों में प्रवासन तथा कन्वर्जन का जिक्र किया था। दूसरी तरफ, कुछ अध्ययन और रिपोर्टें इसे उच्च प्रजनन दर, आंतरिक प्रवास और अन्य कारकों से जोड़ती हैं। पुलिस रिकॉर्ड में फॉरेनर्स एक्ट के तहत दर्ज मामले अपेक्षाकृत कम रहे हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग जैसी संस्थाओं ने भी क्षेत्रीय दौरे और शिकायतों के आधार पर चिंता जताई है।
साहिबगंज से जमशेदपुर तक फैला है जाल
यह कोई इकलौती घटना नहीं है। चुनाव आयोग के एसआईआर अभियान के दौरान झारखंड के अन्य हिस्सों से भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जो किसी सोची-समझी साजिश की आशंका को बल देते हैं। उदाहरण के तौर पर, जमशेदपुर में एसआईआर के सत्यापन के दौरान यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि मतदाता सूची में तीन विदेशी (अफगानी) नागरिकों के नाम अवैध रूप से दर्ज थे। मामला खुलते ही निर्वाचन अधिकारियों ने उनके नाम सूची से हटा दिए और उच्चस्तरीय जाँच बैठाई। इसी तरह साहिबगंज के ही बरहड़वा में भी अगस्त महीने में एसआईआर की सुनवाई के दौरान सात लोगों के प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी पाए गए। इस मामले में भी मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के कड़े निर्देशों पर इस मामले में आठ लोगों के खिलाफ तुरंत प्राथमिकी दर्ज करते हुए आगे की कार्रवाई की जा रही है।
पांचजन्य