कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुणे स्थित राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र का औचक निरीक्षण कर कृषि शोध संस्थानों की लापरवाही पर सख्त नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि किसानों के नाम पर चल रही संस्थाओं को जवाबदेह और प्रभावी होना होगा, अन्यथा कार्रवाई की जाएगी।
16 मई, 2026 – नई दिल्ली : किसानों के नाम पर चल रही संस्थाओं की लापरवाह कार्यशैली पर सरकार सख्त हो गई है। खेती से जुड़े अनुसंधान संस्थानों की जवाबदेही, कार्यक्षमता और जमीनी असर को लेकर अधिक गंभीरता दिख रही है।
यदि कोई संस्थान किसानों की समस्याओं का समाधान देने में नाकाम है। शोध का असर नहीं दिखा रहा या काम कागजों तक सीमित है तो उसकी जवाबदेही तय की जाएगी। यह सख्त संदेश पुणे स्थित आईसीएआर के राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को औचक निरीक्षण के दौरान दिए, जहां कई तरह की गंभीर कमियां मिलीं।
महाराष्ट्र में देश का 80 प्रतिशत अंगूर उत्पादन होता है। ऐसे में राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र की भूमिका अहम मानी जाती है। संस्थान को किसानों को नई किस्में विकसित करके देने, रोगमुक्त पौधे तैयार करने, जलवायु परिवर्तन से फसल बचाने और निर्यात गुणवत्ता सुधारने के लिए बनाया गया है।
निरीक्षण में सामने आई गड़बड़ी
लेकिन मंत्री के निरीक्षण में जो स्थिति सामने आई, उसने संस्थान की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए। सबसे बड़ी गड़बड़ी नर्सरी व्यवस्था में मिली। संस्थान द्वारा विकसित अंगूर की कई किस्में किसानों के बीच लोकप्रिय नहीं हो सकीं। सीधा अर्थ है कि शोध और किसानों की वास्तविक जरूरतों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
जिस संस्थान का उद्देश्य किसानों को बेहतर और टिकाऊ किस्में देना हो, वहां विकसित वैरायटी यदि खेतों तक असर नहीं दिखा रही हैं तो यह केवल वैज्ञानिक कमजोरी नहीं, बल्कि नीति और कार्यान्वयन दोनों की विफलता मानी जाएगी।कृषि मंत्री ने क्लीन प्लांट सेंटर के कामकाज पर भी गंभीर नाराजगी जताई।
यह केंद्र किसानों को रोगमुक्त और प्रमाणित पौधे उपलब्ध कराने के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन इसकी प्रगति बेहद धीमी है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती बारिश और वायरस हमलों के दौर में यह केंद्र किसानों के लिए सुरक्षा कवच बन सकता था, लेकिन सुस्ती और ढीले कामकाज ने इसकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
निरीक्षण में क्या मिला?
निरीक्षण के क्रम में साफ दिखा कि परियोजनाओं की गति और किसानों की अपेक्षाओं में बड़ा अंतर है। किसानों ने भी मंत्री से खुलकर शिकायतें कीं। उनका कहना था कि संस्थान से समय पर तकनीकी मार्गदर्शन नहीं मिलता और विकसित किस्में व्यावहारिक लाभ नहीं देतीं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान निजी नर्सरियों और निजी स्त्रोतों की ओर रुख कर रहे हैं।
दैनिक जागरण