हाल के एआइ इंपैक्ट सम्मेलन में युवा कांग्रेस के अर्धनग्न प्रदर्शन से आइएनडीआइए के अन्य घटक दलों की मुखर असहमति भी कांग्रेस के लिए अपनी दशा और दिशा पर गंभीर पुनर्विचार का संदेश है, लेकिन शायद वह किसी संदेश को सुनने को तैयार नहीं।
राज कुमार सिंह

शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू और पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर की टिप्पणियों से विपक्षी दलों के मोर्चे आइएनडीआइए की दरारें उजागर हुई ही थीं कि एआइ सम्मेलन में युवा कांग्रेस के अर्धनग्न प्रदर्शन से कांग्रेस की दिशाहीनता भी बेनकाब हो गई। लगता नहीं कि कांग्रेस को देश या विपक्षी एकता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का कोई अहसास है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लगातार तीसरी निराशाजनक हार के बावजूद अन्य विपक्षी दलों ने राहुल को नेता प्रतिपक्ष के रूप में स्वीकार कर उदारता ही दिखाई, लेकिन कांग्रेस ने कभी अन्य दलों को संसद के अंदर या बाहर साथ लेकर चलने की परिपक्वता नहीं दिखाई। राहुल गांधी अपेक्षा करते हैं कि वे जो भी रणनीति तय कर लें, संसद के अंदर-बाहर अन्य दलों को उनका श्रद्धापूर्वक अनुसरण करना चाहिए।
भाजपा को हराने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले दो दर्जन विपक्षी दलों को जोड़कर आइएनडीआइए बनाया गया था। दो बार पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद भाजपा का 240 सीटों पर ठहरने को इस मोर्चे की एक सफलता के रूप में देखा गया, लेकिन लोकसभा चुनाव बाद गठबंधन के पक्ष में कुछ खास घटित होता नहीं दिख रहा। उनके बीच लगातार उजागर दरारें बताती हैं कि दलों में दोस्ती के बावजूद दिलों में दूरियां बरकरार हैं।
सफलताओं की बात करें तो झारखंड और जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में जीत तो हासिल हुई, लेकिन वहां कांग्रेस हाशिए पर ही है। महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार में उसके हिस्से हार ही आई। इसमें महाराष्ट्र और बिहार की हार को शर्मनाक कहना कहीं अधिक उचित होगा। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में तो गठबंधन की गांठें पूरी तरह बिखरती दिखीं।
इस साल चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, पर गठबंधन के तौर पर आइएनडीआइए में सक्रियता तो दूर, कहीं कोई सुगबुगाहट भी नहीं। एसआइआर पर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ही चुनाव आयोग से दो-दो हाथ करती नजर आती हैं। तमिलनाडु में भी चुनाव आयोग से लेकर भाजपा तक के विरुद्ध मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनकी पार्टी द्रमुक ही मोर्चा खोले है। बंगाल में ममता एकला चलो की राह पर हैं। पिछली बार वाम मोर्चा के साथ गठबंधन करने वाली कांग्रेस इस बार अकेले चुनावी जोर आजमाइश के मूड में है। केरल में तो मुख्य चुनावी मुकाबला सत्तारूढ़ वाम मोर्चा और कांग्रेसनीत यूडीएफ के बीच ही होता है।
इसलिए राज्य की राजनीति में तो परस्पर समन्वय की गुंजाइश नहीं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एक ही गठबंधन के सदस्य होने के नाते तमाम राजनीतिक मुद्दों पर तो आइएनडीआइए को एक सुर में बोलना चाहिए। तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस के बीच पुराना गठबंधन है, लेकिन वहां भी दरारें इस हद तक हैं कि मणिक्कम टैगोर और प्रवीण चक्रवर्ती सरीखे कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के नेता द्रमुक पर निशाना साध रहे। नतीजतन द्रमुक को उनके विरुद्ध कार्रवाई की मांग करनी पड़ी। तमाम अटकलों के बाद अब द्रमुक-कांग्रेस में सीट बंटवारे पर बातचीत जारी है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव तो 2027 में होने हैं, लेकिन वहां जारी एसआइआर को लेकर कांग्रेस की अनुपस्थिति उसके समाजवादी पार्टी से रिश्तों में खिंचाव का भी संकेत है।
‘सामना’ के संपादकीय ‘अंदर की आवाजों का कन्फ्यूजन’ में कांग्रेस से सवाल पूछा गया है-ममता, स्टालिन या कोई और? संपादकीय में गठबंधन को जागने और कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बातचीत करने की नसीहत देते हुए मणिशंकर अय्यर, संजय बारू और भूपेन बोरा आदि की टिप्पणियों को अंदर की आवाजों का कन्फ्यूजन करार दिया गया है। बारू ने आइएनडीआइए का नेतृत्व ममता बनर्जी को देने का सुझाव दिया है तो अरसे तक नेहरू-गांधी परिवार के करीबी समझे गए अय्यर की टिप्पणियां राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल के रूप में देखी जा रही हैं।
जिस एकमात्र राज्य केरल में कांग्रेस की जीत की संभावना है, वहां भी अय्यर ने लगातार तीसरी बार वाम मोर्चा की ही जीत की भविष्यवाणी करते हुए मुख्यमंत्री विजयन की प्रशंसा की है। आइएनडीआइए के नेतृत्व के लिए वे स्टालिन को बेहतर मानते हैं। पार्टी से कोई संबंध न होने के आधार पर उनकी टिप्पणी को निजी राय बताकर कांग्रेस ने अय्यर से पल्ला झाड़ना चाहा है, पर राजनीतिक गलियारों से लेकर केरल-तमिलनाडु तक चर्चा थमी नहीं है। राहुल गांधी से मुलाकात के बाद भले ही शशि थरूर के स्वर बदल गए हों, पर उससे पहले की तल्खियां सबने देखी हैं। असम के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन बोरा तो राहुल गांधी से बातचीत के बाद भी इस्तीफा वापस लेने के फैसले से पलट गए और हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा घोषित तारीख पर भाजपा में शामिल भी हो गए। लगभग एक दशक पहले हिमंत ने भी राहुल गांधी की कार्यशैली से खफा होकर कांग्रेस छोड़ी थी। पूर्वोत्तर में भाजपा के विस्तार में अहम भूमिका निभाने के बाद अब वे असम के मुख्यमंत्री और भाजपा आलाकमान के लाड़ले हैं।
दलबदल के बाद अक्सर अवसरवाद, दबाव और प्रलोभन की बातें सुनाई पड़ती हैं। इन्हें पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, पर दलबदल कहीं-न-कहीं नेतृत्व की क्षमता और दल की राजनीतिक संभावनाओं पर अविश्वास का परिणाम भी होते हैं। राहुल गांधी को कम-से-कम अपनी टीम का सदस्य बताए गए युवा नेताओं के कांग्रेस से पलायन पर तो आत्मविश्लेषण करना ही चाहिए और अगर वे पर्याप्त समय नहीं दे सकते तो फिर आइएनडीआइए का नेतृत्व ममता बनर्जी या स्टालिन जैसे किसी पूर्णकालिक क्षेत्रीय नेता को सौंपने की पहल करें। हाल के एआइ इंपैक्ट सम्मेलन में युवा कांग्रेस के अर्धनग्न प्रदर्शन से आइएनडीआइए के अन्य घटक दलों की मुखर असहमति भी कांग्रेस के लिए अपनी दशा और दिशा पर गंभीर पुनर्विचार का संदेश है, लेकिन शायद वह किसी संदेश को सुनने को तैयार नहीं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
दैनिक जागरण