न फंडिंग थी, न भरोसा, सिर्फ जुनून था!
Skyroot Aerospace Vikram 1: दो पूर्व ISRO वैज्ञानिकों ने की 8 साल की कड़ी मेहनत के बाद आज उनके ‘विक्रम-1’ ने भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट के रूप में इतिहास रच दिया। आइए जानते हैं पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका के उस कठिन संघर्ष की कहानी, जिसने एक छोटे से स्टार्टअप को भारत के अंतरिक्ष इतिहास का हिस्सा बना दिया।
20 जुलाई, 2026 – नई दिल्ली: दो लोग, एक सपना, न मजबूत फंडिंग, न कोई तय रास्ता। लेकिन हौसला ऐसा कि भारत के अंतरिक्ष इतिहास की दिशा बदल दी। कभी रिपोर्ट कार्ड में 51 नंबर देखकर शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही लड़का एक दिन भारत के अंतरिक्ष इतिहास का नया अध्याय लिखेगा। एक तरफ सरकारी नौकरी की सुरक्षा थी, दूसरी तरफ ऐसा सपना, जिसके लिए न कोई नीति थी, न मजबूत फंडिंग और न ही भरोसा। लेकिन दो पूर्व इसरो (ISRO) वैज्ञानिकों ने तय कर लिया था कि अगर दुनिया में निजी कंपनियां अंतरिक्ष तक पहुंच सकती हैं, तो भारत क्यों नहीं।
आज जब स्काईरूट एयरोस्पेस का ‘विक्रम-1’ श्रीहरिकोटा से अंतरिक्ष की ओर उड़ा, तो यह सिर्फ एक रॉकेट की उड़ान नहीं थी। यह उस जुनून, संघर्ष और जिद की जीत थी, जो 8 साल पहले सिर्फ दो लोगों और एक आइडिया से शुरू हुई थी। आज भारत निजी क्षेत्र से ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया और इसके पीछे सबसे बड़ा चेहरा हैं- पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका।
8 साल पहले सिर्फ दो लोग और एक सपना था
जून 2018, हैदराबाद का एक छोटा-सा ऑफिस। दो पूर्व इसरो वैज्ञानिक पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने स्काईरूट एयरोस्पेस की नींव रखी। उस समय भारत में निजी कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर लगभग बंद था। कोई पॉलिसी नहीं, कोई स्पष्ट नियम नहीं और निवेशकों के लिए यह ऐसा क्षेत्र था, जहां पैसा लगाना लगभग असंभव माना जाता था। खुद पवन चंदना ने लॉन्च से ठीक पहले लिखा कि उस समय उनके पास सिर्फ दो लोग और एक आइडिया था। सफलता की संभावना बेहद कम दिख रही थी, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय इतिहास लिखने का फैसला किया।
51 नंबर वाले छात्र ने IIT और ISRO तक का सफर तय किया
पवन कुमार चंदना की कहानी किसी मोटिवेशनल किताब जैसी लगती है। गणित में सिर्फ 51 अंक आए थे। लेकिन उन्होंने कभी अंकों को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। हैदराबाद के मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बढ़े पवन को बचपन से मशीनों और तकनीक में दिलचस्पी थी। पिता ने मुश्किल दौर में भी उनका हौसला नहीं टूटने दिया। धीरे-धीरे वही गणित और विज्ञान उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गए। पहली ही कोशिश में IIT खड़गपुर का एंट्रेंस निकाला और वहीं से सीधे इसरो में चयन हो गया। वहां उन्होंने भारत के सबसे भारी रॉकेट GSLV Mk-III पर काम किया और अपने इनोवेशन के लिए सम्मान भी पाया।
नागा भरत डाका… जिन्होंने दोस्त नहीं, मिशन चुना
IIT बॉम्बे से पढ़े नागा भरत डाका भी इसरो में रॉकेट तकनीक पर काम कर रहे थे। दोनों वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि अगर भारत को स्पेस सेक्टर में अगला कदम बढ़ाना है तो निजी कंपनियों को भी मौका मिलना चाहिए। दोनों ने सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़ दी। उस समय यह फैसला कई लोगों को जोखिम भरा लगा, लेकिन दोनों जानते थे कि बड़े बदलाव हमेशा जोखिम मांगते हैं। उनका लक्ष्य था कि सैटेलाइट लॉन्च करना उतना ही आसान और किफायती हो जाए, जितना किसी विमान की टिकट बुक करना।
पैसा नहीं था… फिर भी सपना नहीं टूटा
सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि फंडिंग थी। उस समय कोई भी स्पेस स्टार्टअप में करोड़ों रुपये लगाने को तैयार नहीं था। तभी फ्लिपकार्ट के सह-संस्थापक बिन्नी बंसल ने सबसे पहले उन पर भरोसा जताया और निवेश किया। इसके कुछ ही समय बाद कोरोना महामारी आ गई। फंडिंग लगभग रुक गई। कंपनी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। लेकिन इसी मुश्किल दौर में ग्रीनको ने साथ दिया और स्काईरूट का सपना जिंदा रहा। बाद में कंपनी ने 51 मिलियन डॉलर और फिर 60 मिलियन डॉलर की बड़ी फंडिंग जुटाई। आज GIC और टेमासेक जैसे वैश्विक निवेशक भी कंपनी पर भरोसा जता चुके हैं और इसकी वैल्यूएशन 1.1 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुकी है।
हर टेस्ट ने बढ़ाया भरोसा, हर लॉन्च ने बदली तस्वीर
2020 में स्काईरूट ने ‘रमन-1’ इंजन का सफल परीक्षण कर भारत की पहली निजी कंपनी होने का गौरव हासिल किया। फिर ‘धवन-1’ क्रायोजेनिक इंजन आया। 2021 में इसरो के साथ पहला निजी समझौता हुआ। 18 नवंबर 2022 को ‘विक्रम-S’ लॉन्च हुआ और भारत ने पहली बार निजी रॉकेट को आसमान में उड़ते देखा। इसके बाद ‘विक्रम-1’ के लिए लगातार परीक्षण पूरे किए गए। आखिरकार आज वह दिन आया, जब भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट श्रीहरिकोटा से उड़ान भर गया और देश ने अंतरिक्ष के नए युग में कदम रख दिया।
दो लोगों का स्टार्टअप, आज हजार विशेषज्ञों की ताकत
जिस कंपनी की शुरुआत सिर्फ दो लोगों ने की थी, आज वहां करीब एक हजार इंजीनियर और विशेषज्ञ काम कर रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट की भारत की सबसे बड़ी निजी रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी का उद्घाटन किया। कंपनी अब सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक कमर्शियल स्पेस मार्केट में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही है।
यह कहानी सिर्फ रॉकेट की नहीं, भरोसे की है
‘विक्रम-1’ की उड़ान ने सिर्फ एक मिशन को सफल नहीं बनाया, बल्कि करोड़ों युवाओं को यह भरोसा भी दिया है कि सपनों की कोई मार्कशीट नहीं होती। 51 नंबर पाने वाला छात्र, सरकारी नौकरी छोड़ने वाले दो वैज्ञानिक, फंडिंग के लिए दर-दर की कोशिशें और 8 साल की लगातार मेहनत, इन सबका नतीजा आज पूरी दुनिया ने देखा। स्काईरूट की सफलता यह साबित करती है कि जब जिद, विज्ञान और हिम्मत एक साथ उड़ान भरते हैं, तो आसमान भी छोटा पड़ जाता है।
नवभारत टाइम्स