भगवान धन्वन्तरि के हाथ में अमृत कलश होने की कथा ने कलश और धातु को शुभता का प्रतीक बनाया। परंपरा में नए बर्तन खरीदना, घर में उपयोगी वस्तुएँ लाना और दीपावली की तैयारी करना शुभ माना गया।

भारतीय जीवन-दर्शन की यह कहावत जीवन की प्राथमिकताओं का ऐसा सूत्र है, जिसमें मनुष्य के सुख, समृद्धि और अस्तित्व का पूरा दर्शन समाहित है। जिस शरीर में प्राण हैं, जिसमें स्वस्थ मन और विवेक है, वही धन अर्जित कर सकता है, परिवार का पालन कर सकता है और समाज के निर्माण में योगदान दे सकता है। शरीर ही नहीं रहेगा, तो सोने-चाँदी के भंडार, भव्य भवन, विशाल संपत्ति और सांसारिक वैभव का क्या अर्थ रह जाएगा?
विडंबना यह है कि भारतीय सनातन परंपरा में स्वास्थ्य को सर्वोच्च धन मानने वाला धनतेरस आज बहुत हद तक सोना-चाँदी, आभूषण, वाहन और महँगी वस्तुओं की खरीदारी के पर्व के रूप में स्थापित हो गया है। बाजार की चकाचौंध में भगवान धन्वन्तरि, आयुर्वेद, आरोग्य और दीर्घायु की मूल भावना कहीं पीछे छूटती दिखाई देती है। प्रश्न यह नहीं है कि धनतेरस पर खरीदारी करना गलत है। प्रश्न यह है कि जिस पर्व का मूल संदेश जीवन की रक्षा और स्वास्थ्य की प्राप्ति है, उसमें हमने धन की प्राप्ति को ही सबसे बड़ा उद्देश्य क्यों बना लिया? क्या हमारी परंपरा में धन का अर्थ केवल आर्थिक संपत्ति है, अथवा स्वस्थ शरीर, संतुलित मन और दीर्घायु भी उसी धन के रूप हैं, जिनके बिना भौतिक समृद्धि अधूरी है?
धनतेरस का मूल -धन्वन्तरि त्रयोदशी से आरोग्य का संदेश
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव का आरंभ करता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन से भगवान् धन्वन्तरि प्राकट्य की कथा भारतीय धार्मिक परंपरा में स्वास्थ्य, अमृत और जीवन की रक्षा के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है। भगवान धन्वन्तरि का अमृत कलश लेकर प्रकट होना इस बात का संकेत है कि मनुष्य की सबसे बड़ी आकांक्षा स्वस्थ और दीर्घ जीवन प्राप्त करना है। इसलिए धनतेरस का मूल भाव यह है कि जीवन में आरोग्य आए, रोगों से मुक्ति मिले और मनुष्य दीर्घायु हो।
धन्वन्तरि के अमृत कलश से सोने-चाँदी की खरीदारी तक
भगवान धन्वन्तरि के हाथ में अमृत कलश होने की कथा ने कलश और धातु को शुभता का प्रतीक बनाया। परंपरा में नए बर्तन खरीदना, घर में उपयोगी वस्तुएँ लाना और दीपावली की तैयारी करना शुभ माना गया। धनतेरस पर नई वस्तु खरीदने की परंपरा का एक व्यावहारिक पक्ष भी था। दीपावली के अवसर पर घर की सफाई, पूजा की तैयारी, नए बर्तनों और घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती थी। इस प्रकार शुभता और उपयोगिता का एक स्वाभाविक संबंध विकसित हुआ। लेकिन समय के साथ अमृत कलश का प्रतीक धीरे-धीरे आर्थिक संपन्नता के प्रतीक में बदलता गया। धनतेरस पर सोना खरीदना शुभ हो सकता है, लेकिन सोने की खरीदारी को स्वास्थ्य की पूजा से अधिक महत्त्वपूर्ण मान लेना उस पर्व की मूल भावना से दूर जाना है।
स्वास्थ्य से बाजार तक – धनतेरस का बदलता स्वरूप
बाजारवाद, विज्ञापन, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण, बदलती जीवनशैली और आर्थिक समृद्धि की नई आकांक्षाओं ने त्योहारों के स्वरूप को प्रभावित किया है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में त्योहार व्यापार, उत्पादन, रोजगार, उपभोग और बिक्री के बड़े अवसर भी बन गए हैं। दीपावली के आसपास बाजारों में होने वाली खरीदारी अर्थव्यवस्था को गति देती है। यह अपने आप में नकारात्मक नहीं है, समस्या तब शुरू होती है, जब त्योहार की धार्मिक भावना को खरीदारी की अनिवार्यता में बदल दिया जाता है।
विज्ञापनों में यह संदेश बार-बार दिखाई देता है कि धनतेरस पर सोना खरीदना चाहिए, नई गाड़ी खरीदनी चाहिए या कोई महँगी वस्तु घर लानी चाहिए। खरीदारी को शुभता, प्रतिष्ठा और भविष्य की समृद्धि से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। धीरे-धीरे सामाजिक मानसिकता में यह धारणा बन सकती है कि जितनी बड़ी खरीदारी होगी, उतना ही बड़ा शुभ फल प्राप्त होगा। यहीं से उपभोक्तावाद का प्रवेश होता है। उपभोक्तावाद केवल वस्तुओं की खरीदारी नहीं है। यह वह मानसिकता है, जिसमें व्यक्ति अपनी सफलता, प्रतिष्ठा और प्रसन्नता को अधिकाधिक वस्तुओं के स्वामित्व से मापने लगता है। धनतेरस पर खरीदारी करना एक परंपरा हो सकती है, लेकिन खरीदारी न कर पाने वाले व्यक्ति को यह महसूस होना कि उसने पर्व अधूरा मना लिया, बाजारवादी मानसिकता का परिणाम है।
धनतेरस की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस दिन हमें अपने स्वास्थ्य, जीवन और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, उसी दिन हम कभी-कभी अपने आर्थिक सामर्थ्य का प्रदर्शन करने में अधिक व्यस्त हो जाते हैं। बाजारवाद, विज्ञापन, बदलती जीवनशैली, सामाजिक प्रतिष्ठा की आकांक्षा और आर्थिक समृद्धि की नई परिभाषाओं ने मिलकर त्योहारों के स्वरूप को प्रभावित किया है।
दीपावली का पाँच दिवसीय पर्व -जीवन की प्राथमिकताओं का दर्शन
दीपावली के पाँच दिनों को यदि उनके धार्मिक, सांस्कृतिक और जीवनोपयोगी संदेशों के आधार पर देखें, तो एक व्यापक जीवन-दर्शन सामने आता है।
धनतेरस- आरोग्य और जीवन की रक्षा। भगवान धन्वन्तरि की पूजा हमें यह स्मरण कराती है कि स्वस्थ शरीर ही जीवन की पहली आवश्यकता है। स्वास्थ्य के बिना धन और समृद्धि का आनंद संभव नहीं।
नरक चतुर्दशी या रूप चौदस- स्वच्छता और आत्मशुद्धि। इस दिन से जुड़ी स्नान, उबटन और स्वच्छता की परंपराएँ शरीर तथा परिवेश की शुद्धि का संदेश देती हैं। नरकासुर पर विजय का आख्यान भी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
दीपावली- समृद्धि और विवेक। लक्ष्मी-गणेश पूजन में समृद्धि के साथ बुद्धि और विवेक की कामना की जाती है। धन का अर्जन तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग विवेकपूर्ण हो।
गोवर्धन पूजा- प्रकृति, अन्न और पशुधन का सम्मान। गोवर्धन पूजा प्रकृति, कृषि, पशुधन और अन्न के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है। यह स्मरण कराती है कि जीवन और समृद्धि का आधार केवल मुद्रा नहीं, बल्कि प्रकृति भी है।
भाई दूज- संबंधों और सामाजिक स्नेह की प्रतिष्ठा। भाई दूज पारिवारिक संबंधों, स्नेह और पारस्परिक संरक्षण का पर्व है। इस क्रम को एक व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि से देखें, तो शरीर, स्वच्छता, समृद्धि, प्रकृति और संबंधों की महत्ता सामने आती है।
आयुर्वेद का मूल संदेश – रोग होने से पहले स्वास्थ्य की रक्षा
धनतेरस का वास्तविक महत्त्व तब और अधिक स्पष्ट होता है, जब हम इसे आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों से जोड़कर देखते हैं। आयुर्वेद का प्रसिद्ध सूत्र है- स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्। अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोग का शमन करना। आज की जीवनशैली में अनियमित भोजन, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव, अपर्याप्त नींद और असंतुलित दिनचर्या अनेक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती हैं। धनतेरस पर भगवान धन्वन्तरि की पूजा करते हुए यदि हम अपने जीवन में स्वास्थ्य के प्रति कुछ ठोस संकल्प जोड़ें, तो पर्व का मूल उद्देश्य अधिक सार्थक हो सकता है।
परिवार के प्रत्येक सदस्य के स्वास्थ्य की नियमित जाँच कराना।
संतुलित और पौष्टिक भोजन को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना।
नियमित व्यायाम, योग और पर्याप्त नींद को प्राथमिकता देना।
मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन पर ध्यान देना।
रोग होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना और आवश्यक उपचार कराना।
स्वास्थ्य संबंधी गलत धारणाओं तथा अप्रमाणित उपचारों से बचना।
भगवान धन्वन्तरि की पूजा तभी सार्थक होगी, जब उनके आरोग्य-संदेश को हम अपने व्यवहार में उतारें।
धनतेरस पर खरीदारी हो, लेकिन स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं
धनतेरस पर सोना, चाँदी, बर्तन या अन्य वस्तुएँ खरीदना किसी भी परिवार की आस्था और आर्थिक क्षमता से जुड़ा व्यक्तिगत निर्णय है। इसे गलत ठहराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या हम खरीदारी के लिए उतने ही उत्साहित हैं, जितने अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए? क्या हम अपने परिवार के स्वास्थ्य पर खर्च करने से पहले उतना ही विचार करते हैं, जितना आभूषण खरीदने से पहले? क्या हम अपने बच्चों को यह सिखाते हैं कि धनतेरस पर खरीदी जाने वाली वस्तु से अधिक मूल्यवान उनका स्वस्थ शरीर है?
धनतेरस पर यदि कोई परिवार अपनी क्षमता के अनुसार एक छोटा-सा दीपक जलाता है, भगवान धन्वन्तरि की पूजा करता है और अपने स्वास्थ्य की रक्षा का संकल्प लेता है, तो उसका पर्व किसी महँगी खरीदारी करने वाले परिवार से कम सार्थक नहीं है। एक गरीब व्यक्ति के लिए भी धनतेरस उतना ही पवित्र है, जितना किसी संपन्न व्यक्ति के लिए।
धन का मूल्य तभी, जब जीवन स्वस्थ हो
भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। वह कलश जीवन की रक्षा का प्रतीक था। यमदीप दान की कथा भी मृत्यु के भय से मुक्ति और दीर्घायु की कामना से जुड़ी है। आयुर्वेद का दर्शन स्वस्थ शरीर और संतुलित जीवन की रक्षा पर आधारित है। इन सभी परंपराओं का केंद्रीय भाव एक ही है – जीवन की रक्षा। धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, परिवार को सुरक्षा देता है और समाज के विकास में योगदान करता है। लेकिन धन जीवन का साधन है, जीवन स्वयं नहीं। धनतेरस का वास्तविक संदेश यही है कि धन कमाइए, समृद्ध बनिए, सोना-चाँदी भी खरीदिए, लेकिन उस शरीर और जीवन को मत भूलिए जिसके लिए यह सब अर्जित किया जा रहा है, क्योंकि अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास कितना धन है, यह है कि उस धन का आनंद लेने के लिए हमारे पास कितना स्वस्थ जीवन है।
धनतेरस पर यदि हम भगवान धन्वन्तरि के सामने खड़े होकर अपने परिवार के आरोग्य की प्रार्थना करें, अपने स्वास्थ्य की रक्षा का संकल्प लें और दूसरों के स्वास्थ्य के प्रति भी संवेदनशील बनें, तो यही इस पर्व की सबसे बड़ी पूजा होगी। इसीलिए धनतेरस पर सबसे बड़ा प्रश्न यही होना चाहिए कि क्या इस वर्ष हमने केवल धन खरीदा है, या अपने जीवन के सबसे बड़े धन, स्वास्थ्य की रक्षा का संकल्प भी लिया है?
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये।
अमृतकलश हस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय।
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्रीमहाविष्णुस्वरूप श्रीधन्वंतरिस्वरूप।
श्रीश्रीश्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥
पांचजन्य