श्राद्ध की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे क्या मान्यता?
पितृ पूजन की सनातन हिन्दू परम्परा के पीछे भी यही सिद्धांत निहित है। सनातन धर्म में पितृपक्ष को दिवंगत पितरों के प्रति श्रद्धा व कृतज्ञता ज्ञापित करने का विशिष्ट अवसर माना गया है।

इस विश्व-ब्रह्माण्ड में कई तत्व ऐसे हैं जो हमें अपनी स्थूल आंखों से दिखायी नहीं देते फिर भी उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। इस बात को अब विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है। पितृ पूजन की सनातन हिन्दू परम्परा के पीछे भी यही सिद्धांत निहित है। “श्रीमद्भगवत गीता” में जगद्गरु श्रीकृष्ण युद्ध विमुख विषादग्रस्त अर्जुन को आत्मा की अनश्वरता का बोध कराते हुए स्पष्ट कहते हैं कि जिस प्रकार मैले, पुराने या जर्जर हो जाने पर मनुष्य नये वस्त्र धारण कर लेता है, उसी तरह देह के जीर्ण-जर्जर हो जाने पर जीवात्मा उसे त्याग कर नया शरीर धारण कर लेती है। इस प्रबोधन के पीछे उनका लक्ष्य भारतीय संस्कृति की उस चिरन्तन जीवन दृष्टि को पुष्ट करना है जो शरीर के अंत को जीवन का अंत नहीं मानती। इसी मान्यता के आधार पर वैदिक काल में हमारे महान ऋषियों ने पितृ पूजन की परम्परा का बीजारोपण कर इसके लिए महज एक-दो दिन नहीं, वरन पूरे एक पखवारे की अवधि निर्धारित की थी। सनातन धर्म में पितृपक्ष को दिवंगत पितरों के प्रति श्रद्धा व कृतज्ञता ज्ञापित करने का विशिष्ट अवसर माना गया है।
महर्षि निमि ने किया था श्राद्ध परम्परा के शुभारम्भ
महाभारत के अनुशासन पर्व की कथा के अनुसार श्राद्ध का सबसे पहला उपदेश महातपस्वी अत्रि मुनि ने पुत्र के आकस्मिक निधन से दुखी महर्षि निमि को दिया था। इस प्रकार श्राद्ध परम्परा के शुभारम्भ का श्रेय महर्षि निमि को जाता है। इसमें यह भाव-प्रेरणा निहित है कि हम भी पितरों एवं महान पूर्वजों के आदर्शों एवं श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण कर उत्कृष्ट आचरण करने वाले बनने का प्रयास करें। इसके लिए भादों की पूर्णिमा से लेकर अश्विन माह का कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक एक पखवारे की विशिष्ट अवधि को पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए निर्धारित की। ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि मृत्यु के उपरान्त पितृपक्ष के दौरान हमारे पूर्वजों की जीवात्माएं मृत्यु लोक में आती हैं व अपने पुत्र-पौत्र व अन्य परिवारी जनों द्वारा किये गये पिण्ड-तर्पण से तृप्त होकर उन्हें आशीर्वाद देकर अपने लोक को वापस लौट जाती हैं। इस प्रकार श्राद्ध-तर्पण का अभिप्राय है दिवंगत पितरों को तृप्त करने की श्रद्धापूर्ण प्रक्रिया।
मरणेत्तर श्राद्ध-तर्पण का दिव्य उद्देश्य
मानवीय चेतना को उसके पूर्ण विकास तक ले जाना ही हमारी ऋषि संस्कृति का एकमात्र उद्देश्य रहा है। रणेत्तर श्राद्ध-तर्पण की क्रियाएं इसी का एक प्रखर प्रमाण हैं। इस परम्परा की मिसाल अन्य किसी देश-संस्कृति में नहीं मिलती। तमाम तथाकथित अत्याधुनिक लोग तर्क देते हैं कि जो मर गया उनके लिए यह कर्मकांड कोरा अंधविश्वास है; पर यह उनकी संकीर्ण सोच है। आत्मा के अनश्वर एवं शाश्वत अस्तित्व की सुस्पष्ट धारण के अनुरूप भारतीय दर्शन में जीवन की परिभाषा अति व्यापक है। देह-त्याग के बाद भी जीवात्मा के विकास एवं परस्पर भावपूर्ण आदान-प्रदान की व्यवस्था इसमें निहित है। भारतीय श्राद्ध परम्परा में जीवन के प्रति एक समग्र दृष्टि एवं पद्धति के दिग्दर्शन होते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस तरह सीधे खड़े होने के लिए हमारी रीढ़ की हड्डी का मजूबत होना जरूरी होता है; ठीक उसी तरह हम सभी लोग अपने पूर्वजों के अंश हैं, उन्हीं से हमारी पहचान बनी हुई है। इसलिए हमें इस विशेष अवधि में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करना चाहिए।
पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है श्राद्ध तर्पण
वैदिक वांगमय में अनुसार प्रत्येक सनातनधर्मी हिन्दू धर्मावलंबी पर इस धरती पर जीवन लेने के पश्चात तीन ऋण उतारने होते हैं- देव, ऋषि व पितृ ऋण। इन ऋणों की महत्ता को प्रमाणित करने वाला एक रोचक प्रसंग महाभारत में मिलता है। कथानक है कि मृत्यु के उपरांत यमराज ने ऋण बाकी रहने की बात कहकर कर्ण को मोक्ष देने से इनकार कर दिया। इस पर कर्ण ने कहा- देव! मैंने तो अपनी सारी सम्पदा सदैव दान-पुण्य में ही अर्पित की फिर मेरे ऊपर कौन सा ऋण बचा है? इस पर यमराज बोले- राजन, आपने देव व ऋषि ऋण तो चुका दिया लेकिन आप पर पितृ ऋण अभी बाकी है। धर्मराज ने कर्ण से कहा कि आप 16 दिन के लिए पुनः पृथ्वी पर जाइए और अपने ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध-तर्पण तथा पिंडदान विधिवत करके पितृ ऋण से मुक्त होइए तभी आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी। गरुण पुराण में कहा गया है कि इस अवधि में जिनके पुत्र-पौत्र व प्रपौत्र अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धाभाव से पिंड-तर्पण व दान-पुण्य करते हैं; उनके पितर प्रसन्न होकर उसे सूक्ष्म रूप से ग्रहण कर उनको अपना आर्शीवाद देते हैं।
संतुष्ट होकर अनुदान बरसाते हैं पितर
सनातन धर्म में पितृपक्ष को दिवंगत पितरों के प्रति श्रद्धा व कृतज्ञता ज्ञापित करने का विशिष्ट अवसर माना गया है। इसमें यह भाव-प्रेरणा भी निहित रहती है कि हम भी पितरों, महापुरुषों एवं महान पूर्वजों के आदर्शों, निर्देशों एवं श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण कर वैसे ही उत्कृष्ट आचरण करने वाले बनने का प्रयास करें। इन दिनों पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रीमदभगवद्गीता या भागवत पुराण का पाठ उत्तम फलदायी माना गया है। धर्मशास्त्र यह भी कहते हैं कि यदि इस अवसर पर पूर्वजों के सम्मान में उनके नाम से प्याऊ, स्कूल, धर्मशाला आदि के निर्माण में सहयोग करें तो पूर्वज प्रसन्न होकर कृपा बनाये रखते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न करना चाहिए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति अपने पितरों को तिल मिश्रित जल से तर्पण कर और गाय को हरा चारा खिलाकर अपने पितरों को श्रद्धा अर्पित कर सकता है।
मार्कडेय, विष्णु व गरुण पुराण में विस्तार से श्राद्ध कर्म की महिमा का बखान किया गया है। इन पुराण ग्रन्थों के ऋषियों के अनुसार पितृ पूजन से संतुष्ट होकर पितर अपने धरतीवासी परिजनों को आयु, सुसंतति, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, सुख व धन-धान्य का वरदान देते हैं और तृप्त होकर श्राद्धकर्ता को भौतिक सम्पदा के साथ दीर्घायु और मोक्ष प्रदान करते हैं। महाभारत में ऋषि जाबाल ने कहा है कि जो लोग आश्विन मास के पितृपक्ष में अपने मृत पितरों का श्राद्ध नहीं करते, वे अभागे होते हैं, यानी उन्हें उनके कर्मों का उचित फल नहीं मिलता। इसी तरह महाभारत में विदुर जी धृतराष्ट से कहते हैं कि पितरों के निमित्त श्राद्ध न करने वाले को विद्वतजनों ने मूर्ख की संज्ञा दी है। अत: प्रत्येक भावनाशील मनुष्य को अपने पितरों की संतुष्टि एवं स्वयं के कल्याण के लिए श्राद्ध तर्पण जरूर करना चाहिए।
अन्य धर्मों ने भी गायी है श्राद्धकर्म की महिमा
कहा जाता है कि जेल में बंद मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने अंतिम घोर यातना भरे दिनों में अपने पुत्र बादशाह औरंगजेब के नाम पत्र में अपने अंतस की पीड़ा व्यक्त करते हुए यह मर्मभेदी वाक्य लिखे थे- ” तू भी विचित्र मुसलमान है, जो अपने जीवित पिता को जल के लिए भी तरसा रहा है। तुझसे तो लाख लाख बार प्रशंसनीय हैं वे हिन्दू; जो अपने मरे पिता को भी जल देते हैं।” इसी तरह श्राद्ध-तर्पण के विषय में एक अंग्रेज विद्वान द्वारा लिखित पुस्तक “आर्यों की महानता” में उल्लेख मिलता है,” अपने मृत पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा अर्पित करने वाली हिन्दुओं श्राद्ध परम्परा प्रशंसनीय और अनुकरणीय है। यह परम्परा प्रत्येक धर्मानुयायियों को अपनानी चाहिए।”
पांचजन्य