जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है
शिवकांत शर्मा

नेपाल में हिमालय का ग्लेशियर दरक कर गिरने की घटना को भूकंप विज्ञानी पिछले दो दशकों की सबसे भयावह घटना मानते हैं। लांगतांग लिरुंग पर्वत की उत्तरी ढलान पर जमा ग्लेशियर 26 अगस्त को अपनी 20 करोड़ घनमीटर बर्फ और मलबे के साथ दरक कर 1200 मीटर नीचे लेंडे खोला नदी की घाटी में जा गिरा।
उसने भोटेकोशी और त्रिशूली घाटियों में प्रलयंकारी बाढ़ के साथ-साथ 5.2 तीव्रता का भूकंप भी पैदा किया। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संस्था के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से ऐसी आपदाओं की आशंका, आवृत्ति और घातकता बढ़ रही है।
दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवों के बाद सबसे अधिक बर्फ हिमालय में पाई जाती है। इसलिए इसे पृथ्वी का तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। हिमालय के 60 हजार से अधिक ग्लेशियर एशिया की दस बड़ी नदियों और सैकड़ों सहायक नदियों के स्रोत हैं जिनसे भारत, चीन, हिंद चीन और मध्य एशिया के अरबों लोगों को भोजन, पानी और ऊर्जा मिलती है। ग्लेशियरों का तीन चौथाई भाग समुद्रतट से केवल 4500 से 6000 मीटर की ऊंचाई पर ही है। इसलिए बढ़ते तापमान का प्रभाव इन पर सबसे पहले पड़ता है।
तापमान बढ़ने के साथ-साथ एशियाई देशों से फैलते प्रदूषण के कण हिमालय के ग्लेशियरों पर काली परत के रूप में जम रहे हैं। इससे ग्लेशियरों की बर्फ सूर्य की गर्मी को परावर्तित करने की जगह उसे सोख कर पिघलने लगी है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब पहाड़ों पर बर्फबारी भी कम होने लगी है और पानी अधिक बरसने लगा है, जो सदियों से जमे ग्लेशियरों की बर्फ और पर्माफ्रोस्ट या सदाजमी मिट्टी को पिघला रहा है।
यह मिट्टी सीमेंट की तरह बर्फ को मलबे और चट्टानों से बांधे रखती है। उसके पिघलने से ग्लेशियर और उनकी झीलें टूटना, हिमस्खलन और भूस्खलन बढ़ रहे हैं। पिछले 30 वर्षों में नेपाल के ग्लेशियरों की एक तिहाई बर्फ पिघल चुकी है और बीते दशक में उसके पिघलने की रफ्तार उससे पिछले दशक से 65 प्रतिशत तेज हो गई है।
ग्लेशियरों और सदाजमी मिट्टी के पिघलने से हिमालय की नदियों का जल प्रवाह बढ़ रहा है, जो तात्कालिक रूप से लाभ दे सकता है, लेकिन यह दो विनाशकारी खतरों को जन्म दे रहा है। एक तो ग्लेशियर पिघलने से उनके भीतर जमे मलबे के बांधों से झीलें बन रही हैं, जिनके टूटने से बाढ़ आ सकती हैं। चोराबाड़ी ग्लेशियर की ऐसी ही झील जुलाई 2013 में उत्तराखंड में टूटी थी, जिससे अलकनंदा में प्रलयंकारी उफान आया था और केदारनाथ से लेकर सोनप्रयाग तक के तटवर्ती गांव बहा ले गया था। दूसरे, सदाजमी मिट्टी पिघलने से पहाड़ों की चोटियों पर जमे ग्लेशियर दरकने लगे हैं।
नेपाल में टूटा ग्लेशियर उसी की डरावनी मिसाल है। ऐसी ही घटना उत्तराखंड के चमोली जिले में फरवरी 2021 में हो चुकी है जब रोंटी चोटी पर जमा ग्लेशियर चट्टान के साथ टूटकर आ गिरा था। उससे ऋषिगंगा और धौलीगंगा में आई बाढ़ ने कई गांवों समेत दो पनबिजली परियोजनाओं और तपोवन बांध को ध्वस्त कर दिया था। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में सदाजमी मिट्टी पिघलने से हुआ भूस्खलन दक्षिण लोनाक ग्लेशियर की झील में जा गिरा था, जिससे उफनी तीस्ता नदी ने चुंगथांग बांध को मिनटों में तोड़ डाला था।
अंतरराष्ट्रीय पर्वत विकास केंद्र के अनुसार पूरे हिमालय में 8000 से अधिक ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 200 से अधिक टूटने के कगार पर हैं। नेपाली अध्ययन के अनुसार कोशी, गंडकी और करनाली नदियों को जल देने वाले ग्लेशियरों में 47 ऐसी झीलें हैं, जिनके टूटने का खतरा है। जलवायु विज्ञानियों का कहना है कि यदि बढ़ते तापमान की रोकथाम के तुरंत कारगर उपाय नहीं किए गए तो सारे ग्लेशियर पिघल कर सूख जाने तक ऐसी आपदाएं आती रहेंगी और ग्लेशियर सूखने के बाद नदियां बरसाती बन जाएंगी और रेगिस्तान जैसे हालात हो जाएंगे।
यह भयानक परिवर्तन इस सदी के अंत तक भी हो सकता है। इसकी रोकथाम के लिए चीन और भारत समेत हिमालय की नदियों पर आश्रित सभी देशों को एकजुट होकर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रोकने के ठोस उपाय पहले तो स्वयं करने होंगे और फिर उनके लिए पूरी दुनिया को तैयार करना होगा, लेकिन ट्रंप जैसे नेताओं के कारण यह दुष्कर काम और भी दुष्कर हो गया है। ऊपर से जलवायु परिवर्तन इतनी गति पकड़ चुका है कि अब सारा उत्सर्जन रोकने पर भी उसका असर कई दशकों बाद ही हो पाएगा। इसलिए तात्कालिक जरूरत दरकने के कगार पर पहुंचे ग्लेशियरों और टूटने के कगार पर पहुंची ग्लेशियर झीलों की पहचान, निगरानी और पूर्वसूचना की एक सुनियोजित व्यवस्था बनाने की है।
भारत ने एक निगरानी और निवारण व्यवस्था बनाई है, लेकिन उसके काम को उत्तराखंड, सिक्किम, हिमाचल, अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ नेपाल, भूटान और चीन के साथ जोड़कर और व्यापक बनाने की जरूरत है। खासकर चीन के साथ, क्योंकि नेपाल और भारत आने वाली अधिकतर बड़ी हिमालयीय नदियों के ग्लेशियर तिब्बत में हैं, जिसे एशिया की पानी की टंकी कहा जाता है। चीन तिब्बत की नदियों पर कई बांध बना रहा है, जिनमें ब्रह्मपुत्र के मोड़ पर बन रहा विश्व का सबसे बड़ा महाबांध मैडोग प्रमुख है, जिसे लेकर स्वयं चीन के भूगर्भ विज्ञानी भी चिंतित हैं, क्योंकि इसके जलाशय का दबाव इस अस्थिर क्षेत्र में बड़े भूकंप की आशंका बढ़ा सकता है।
बढ़ते तापमान से पिघलते और दरकते ग्लेशियरों और उनकी झीलों के टूटने के खतरों को देखते हुए भारत और नेपाल को भी अपनी पनबिजली परियोजनाओं और बांधों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। सबसे बड़ी जरूरत तो हिमालय की नदियों के दियारा क्षेत्रों में बढ़ रही बसावट को रोकने की है। नेपाल और भारत के हिमालयीय राज्यों में लोग पहले ऊंची ढलानों पर बसते थे और दियारों में खेती और वनीकरण किया करते थे, पर अब पर्यटन और विकास के कारण दियारा क्षेत्रों में बहुमंजिला इमारतों और घरों के जंगल खड़े हो गए हैं, जहां ग्लेशियर और झीलें टूटने से आई बाढ़ से भारी विनाश का खतरा बना रहता है।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)