सिख इतिहास में बाबा बुड्ढा जी का एक खास स्थान है, जिनका जन्म 7 कतक संवत 1563 (21 अक्टूबर 1506) को हुआ था। उनका जन्म अमृतसर ज़िले के कथू नंगल गाँव में पिता सुघा (रंधावा) और माता गौरन के घर हुआ था। उनके माता-पिता अपने-अपने रंधावा-जाट और संधू-जाट समुदायों में बहुत सम्मानित थे और उस समय के सामाजिक रीति-रिवाजों का पालन करते थे। माता गौरन जी, संधुआं के बुंडाले गाँव के गाजी की बेटी थीं।
बाबा बुड्ढा जी का असली नाम ‘बूड़ा’ था। उनके जीवन में एक अहम मोड़ तब आया जब 1518 ईस्वी में साहिब श्री गुरु नानक देव जी अपनी ‘उदासी’ (धार्मिक यात्रा) के दौरान काठू नंगल गाँव पहुँचे। उस समय बाबा बुड्ढा जी 12 साल के थे और उन्होंने पूरी श्रद्धा के साथ गुरु नानक देव जी की सेवा में दूध पेश किया।
छोटी उमर में ही इनकी मुलाकात गुरु नानक देव जी से हुई, आपकी बातें सुनकर गुरु नानक देव जी ने कहा यह बालक अपनी उमर से जयादा बढ़ी उमर की बातें करता है जैसे कोई घर का बजुर्ग हो, बाद में गुरु जी ने बाबा जी को लंबी उमर का आशीर्वाद दिया, तब से आपका नाम बाबा बुढ़ा जी प्रसिद्ध हो गया। आप 125 साल की जीवन यात्रा के बाद अमृतसर जिले के रमदास कस्बे में ज्योति-ज्योत समाए।
आपने अपने जीवन काल में सात गुरुओं के दर्शन किए, पहले गुरु नानक देव जी, दूसरे गुरू अंगद देव जी के, तीसरे गुरु अमरदास जी, चौथे गुरु रामदास जी, पांचवें गुरु अर्जुन देव जी, छठें गुरु हरिगोबिन्द जी और नौवें गुरु तेग बहादुर जी के। आप सिख धर्म के उच्च कोटी के महान सेवक, भगत, गुरसिख और तपस्वी थे। बाबा बुढ़ा जी श्री दरबार साहिब अमृतसर के पहले हैड़ ग्रंथी थे, आपने ही हरिमंदिर साहिब में गुरु अर्जुन देव जी के समय में गुरु ग्रंथ साहिब का पहला प्रकाश किया था। आपने ही दूसरे गुरू अंगद देव जी से लेकर छठें गुरू हरिगोबिन्द जी तक गुरु साहिब को गुरुगद्दी का तिलक लगाया था।
बाबा बुड्ढा जी को पोथी साहिब अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी, वे पहले दिन से ही आदि ग्रंथ में संकलित गुरबाणी का वास्तविक मूल्य जानते थे। भाई संतोख सिंह जी बाबा बुड्ढा के अटूट समर्पण पर प्रकाश डालते हुए श्री गुर प्रताप सूरज में लिखते हैं
ਰਿਦੈ ਬਿਚਾਰਨਿ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰ ਕਰੈਂ । ਟਹਿਲ ਗ੍ਰਿੰਥ ਕੀ ਕੌਨ ਸੁਧਰੈ ।
ਇਹ ਸੇਵਕ ਕੀ ਵਸਤੁ ਸਦੀਵਾ । ਨਿਰਹੰਕਾਰ ਜਿਨਹੁ ਮਨ ਨੀਵਾ ॥
ਸੇਵਾ ਬਿਖੈ ਨਿਪੁੰਨ ਜੋ ਹੋਇ । ਕਰੀਅਹਿ ਇਹਾਂ ਸਥਾਪਨਿ ਸੋਇ ।
ਸ਼੍ਰੀ ਨਾਨਕ ਕੋ ਦਰਸ਼ਨ ਕੀਨ । ਅਸ ਬੁੱਢਾ ਬਿਚ ਸੇਵ ਪ੍ਰਬੀਨ ॥ 26॥
{ਰਾਸਿ 3, ਅੰਸੂ 50}
सिंह साहिब ज्ञानी कृपाल सिंह जी ने अपनी पुस्तक “श्री हरमंदिर साहिब दा सुनेहरी इतिहास” में बाबा बुड्ढा जी को “भाई साहिब बुड्ढा साहिब जी” कहा है। प्रारंभ में, बाबा बुड्ढा जी को भाई मरदाना और भाई गुरदास जी जैसी अन्य सम्मानित सिख हस्तियों के समान, भाई बुड्ढा साहिब के नाम से जाना जाता था। हालाँकि, सम्मान के प्रतीक के रूप में, जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, उन्हें बाबाजी कहा जाने लगा और यह नाम अंततः बाबा बुड्ढा जी के रूप में लोकप्रिय हो गया।
बीड़ बाबा बुढ़ा जी का ईतिहास
जिला तरनतारन के इस ईलाके में झबाल नाम का कस्बा हैं, वहां का चौधरी था लंगाह, उसने यह जगह तीसरे गुरु अमरदास जी को भेंट की थी जो गुरु जी ने बाबा बुढ़ा जी को दे दी थी। बाबा बुढ़ा जी यहां पर ही निवास करते थे। पंजाबी में बीड़ का मतलब होता हैं – छोटा जंगल, जहां बहुत सारे वृक्ष और हरियाली होती हैं। यह बीड़ बाबा बुढ़ा जी की थी। जहां उनके पशु चरते थे।

पांचवें गुरू अर्जुन देव जी की पत्नी माता गंगा जी के घर कोई औलाद नहीं थी, उन्हें पता था बाबा बुढ़ा जी महात्मा हैं तो वह अपने घर से खुद आटा पीस कर गेहूँ और छोलों के आटे को मिक्स करके प्रशादे तैयार करके, ऊपर कच्चा प्याज रख कर साथ में दूध रिड़क कर लस्सी बना कर, पैदल चलकर बाबा बुढ़ा जी के पास पहुंचे। बाबा बुढ़ा जी प्रशादे छक कर प्रसंन हो गए और उन्होंने कच्चे प्याज को अपने हाथ से तोड़कर कहा ,,माता जी आपके घर एक ऐसा प्रतापी पुत्र पैदा होगा जो मुगलों को ऐसे ही तोड़ेगा जैसे मैंने प्याज को तोड़ा हैं। बाबा बुढ़ा जी के आशीर्वाद से माता गंगा जी और गुरु अर्जुन देव जी के घर छठें गुरु हरिगोबिन्द जी का जन्म 1595 ईसवीं में जिला अमृतसर के गांव गुरु की वडाली में हुआ।
उन्होंने श्री गुरु अर्जन साहिब के इकलौते बेटे, गुरु हरगोबिंद साहिब जी को गुरमुखी सिखाई। बाबा बुड्ढा जी शस्त्र विद्या में बहुत माहिर थे। गुरु अर्जन साहिब जी की शहादत के बाद, उन्होंने गुरु हरगोबिंद जी को गुरुगद्दी सौंपने में अहम भूमिका निभाई। उन्हें भाई गुरदास जी के साथ मिलकर अकाल बूंगा (जिसे अब अकाल तख्त साहिब के नाम से जाना जाता है) के निर्माण की देखरेख के लिए चुना गया था।
आज भी पंजाब में बहुत सारी संगत बच्चे की प्राप्ति के लिए घर से प्रशादे, कच्चे प्याज और लस्सी लेकर बाबा बुढ़ा जी के दर पर अरदास के लिए जाती हैं। मैं भी गया था, मुझे भी पुत्री की प्राप्ति हुई हैं, मैं दुबारा भी यहां बाबा बुढ़ा जी का शुकराना करने जायूगा। आपको यहां पर मिससे प्रशादे साथ में कच्चे प्याज का प्रशाद मिलेगा। गुरुद्वारे में छोटा सा सरोवर भी बना हुआ है, जहां बहुत सुंदर मछलियां भी तैरती हैं और लोग सनान भी करते हैं।
जब जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को ग्वालियर के किले में कैद किया, तो बाबा बुड्ढा जी ने गुरुओं के सम्मान में ‘शब्द चौकी’ की रस्म शुरू की। ये ‘शबदी जत्थे’ श्री दरबार साहिब की परिक्रमा करते थे और पोथी साहिब से गुरबानी शब्द गाते हुए श्री अमृतसर से ग्वालियर किले तक मार्च करते थे; इस तरह ये जुलूस शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन में बदल जाते थे। इसने कैद गुरु हरगोबिंद जी की रिहाई में अहम भूमिका निभाई और सिख समुदाय में निडरता की भावना पैदा की। बाबा बुड्ढा जी द्वारा शुरू की गई चौकी साहिब की यह परंपरा आज भी जारी है।
बाबा बुड्ढा जी ने लगभग 125 वर्षों की अपनी जीवन-यात्रा पूरी की और 16 नवंबर 1631 को रामदासपुर शहर में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की पवित्र उपस्थिति में अंतिम सांस ली। उनका जीवन सिख समुदाय के गुरसिखों को प्रेरित करता रहा है और हम सभी को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
कैसे पहुंचे- गुरुद्वारा बीड़ बाबा बुढ़ा जी अमृतसर- खेमकरण सड़क पर अमृतसर से 20 किमी, तरनतारन से 18 किमी और मेरे घर से 120 किमी दूर हैं। यहां पर लंगर और रहने के लिए उचित प्रबंध हैं। जब भी आप अमृतसर आए तो यहां भी जरूर दर्शन करने आईए।