विडंबना यह है कि जब भी हिन्दुओं के पर्व और त्योहार आते हैं तो विश्व के कथित पर्यावरणविदों, तथाकथित बुद्धिजीवियों, कल्चरल मार्क्सिज्म से ग्रस्त विभिन्न प्रकार के लोग, मोमबत्ती गैंग और बालीवुड के तथाकथित कुछ अभिनेताओं और अभिनेत्रियों में खलबली मच जाती है। पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर गहरी चिंता जताई जाती है, परन्तु मुख्य निशाने पर होता है दीपावली पर्व।
धनतेरस से देवउठनी एकादशी तक 15 दिन में सम्पूर्ण विश्व के पर्यावरण का अस्तित्व खतरे में आ जाता है, लेकिन अंग्रेजी नव वर्ष की भयंकर आतिशबाजी, क्रिसमस के दिन लगभग 3 अरब मोमबत्तियों को जलाने और कहीं -कहीं आतिशबाजी तथा रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व में हो रहे युद्धों से पर्यावरण को कोई खतरा नहीं होता है ?
उन्हें दीपावली में दियों और पटाखों को लेकर भारी तनाव हो जाता है। ध्वनि प्रदूषण से कान के परदे फट जाने का भय पैदा हो जाता है। ये भी सुना जाता है कि तथाकथित सेक्युलरों द्वारा यह आशंका व्यक्त की जाती है कि भविष्य में वैश्विक उष्मा इतनी बढ़ सकती है कि तथाकथितों को अन्य ग्रहों में रहने के लिए जाना पड़ सकता है।
उनका यह भी मानना है कि अंग्रेज़ी नव वर्ष, क्रिसमस सहित अन्य अवसरों पर होने वाले आतिशबाजी और मोमबत्तियों का जलना शुभ होता है और उससे पर्यावरण संरक्षण भी होता है परन्तु केवल दीपावली पर्व में दीपकों के जलाने और आतिशबाजी से ही पर्यावरण प्रदूषण होता है। सच क्या है इसकी पड़ताल तो होनी चाहिए? केवल हिंदुओं पर पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर प्रश्न उठाना और आरोप लगाना न्यायोचित नहीं है।
दीपावली पर्व में दीपकों को प्रज्जवलित करने पर अनेक लोग इस बात पर सवाल उठाते हैं कि इतने दीये जला कर क्यों पैसा खर्च करना? दरअसल, इन जलते दियों के पीछे सिर्फ धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक कारण भी होता है। मान्यता के अनुसार, दिवाली के दिन वायुमंडल में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव ज्यादा होता है। आइए दीपक जलाने के विषय में वैज्ञानिक महत्व के बारे में भी जान लेते हैं।
दीपावली, वर्षा ऋतु के बाद आती है। यह कीटों व फफूंद आदि के पोषण का समय होता है। इस दौरान कीड़े-मकौड़े अधिक हो जाते क्योंकि इनको अनुकूल वातावरण मिलता है। दिवाली पर घरों की सफाई की जाती है, जिससे कीटों का खतरा कम हो जाता है।

घी के दीपक का महत्व
घी के दीपक का अलग ही महत्व है। देशी घी के दीपक वातावरण के लिए लाभदायक होते हैं। खासकर गाय के घी से दीये जलाना वातावरण को रोगाणुमुक्त रखता है। गाय के देसी घी से दीपक जलाने पर वातावरण शुद्ध रहता है। इसी के साथ दीपावली पर दिए जलाने का एक महत्व यह भी है कि इसकी वजह से अनेक लोगों को रोजगार भी मिल जाता है। दीपावली पर दीये जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से दीपक का अपना महत्व है। दीपक की लौ से वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और शुद्धता आती है। प्रकाश और उजाले से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि एवं धन-वैभव आता है। भगवान श्रीराम के 14 वर्ष बाद अयोध्या आगमन पर दीपकों के प्रज्जवलित करने की यह परंपरा बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। दीपक की धीमी और स्थिर लौ मन को शांत करती है, तनाव कम करती है और एकाग्रता बढ़ाती है।
मोमबत्ती बनाम दीपक
अब प्रदूषण और पर्यावरण पर प्रभाव की कसौटी पर मोमबत्ती बनाम दीपक लें तो अधिकांश मोमबत्तियां पैराफिन वैक्स से बनती हैं, जो पेट्रोलियम (कच्चे तेल) का बाय-प्रॉडक्ट है। दिए में गाय का घी, तिल का तेल या सरसों का तेल इस्तेमाल होता है, जो पूरी तरह प्राकृतिक है। मोमबत्ती विषाक्त गैसें, जलने पर बेंजीन, टॉल्यून और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें छोड़ती हैं। जबकि दीपक में प्राकृतिक तेल या शुद्ध घी के जलने से इतना नुकसान नहीं होता है। मोमबत्ती से कालिख और पार्टिकुलेट मैटर (Soot & PM2.5), यह हवा में भारी मात्रा में बारीक कालिख और नैनो पार्टिकल्स छोड़ती है, जो फेफड़ों में फंस सकते हैं। दीपक में रूई की बाती और तेल के दहन से कम मात्रा में प्राकृतिक कालिख निकलती है।
सुगंध और रसायन सुगंधित मोमबत्तियों में सिंथेटिक सेंट होते हैं, जो आंतरिक प्रदूषण को और बढ़ा देते हैं। प्राकृतिक दीपक में कृत्रिम रसायन नहीं होता। कचरा जलने के बाद प्लास्टिक, शीशा या सिंथेटिक मोम का कचरा बचता है जो नष्ट नहीं होता। मिट्टी का दीया बायोडिग्रेडेबल (मिट्टी में मिलने वाला) होता है।
मोमबत्ती के जलने और बुझने पर निकलने वाला काला धुआं (कालिख) फेफड़ों में जमा हो सकता है। हेल्थलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी तरह का धुआं फेफड़ों के लिए ठीक नहीं है, जिससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और एलर्जी के मरीजों की तकलीफ बढ़ सकती है। खुशबूदार मोमबत्तियों में सिंथेटिक फ्रेग्रेंस और थैलेट्स जैसे रसायनों का इस्तेमाल होता है। बंद कमरे में इन्हें जलाने से लोगों को सिरदर्द, चक्कर आना, खांसी और आंखों में जलन की शिकायत हो सकती है।
मोमबत्ती का दुष्प्रभाव
क्रिसमस के दौरान दुनिया भर में मोमबत्तियां जलाने से काफी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) पर्यावरण में उत्सर्जित होती है। यह उत्सर्जन मुख्य रूप से मोमबत्तियों में इस्तेमाल होने वाले ‘ईंधन’ यानी पैराफिन मोम के जलने के कारण होता है। इस उत्सव के दौरान ईंधन के फैलाव और उसके पर्यावरणीय प्रभाव को इस प्रकार समझा जा सकता है।
स्टॉकहोम एनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट ने 2007 में The Carbon Cost of Christmas नाम से एक अध्ययन प्रकाशित किया था। इसमें अनुमान लगाया गया था कि क्रिसमस के तीन दिनों के दौरान भोजन, यात्रा, रोशनी और उपहारों से प्रति व्यक्ति लगभग 650 किलोग्राम CO₂ उत्सर्जन हो सकता है। यह उस अध्ययन में इस्तेमाल किए गए वार्षिक कार्बन फुटप्रिंट का लगभग 5.5 प्रतिशत था।
आतिशबाजी का भी खेल समझिये
आतिशबाजी को ही ले लीजिए, जिसमें केवल दीपावली पर्व ही निशाने पर होता है, परन्तु पाश्चात्य नव वर्ष के अवसर पर दुनिया भर में बड़े पैमाने पर आतिशबाजी की जाती है, जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य को भारी नुकसान होता है। पाश्चात्य नव वर्ष की रात को कुछ ही घंटों के भीतर आतिशबाजी से हवा में पार्टिकुलेट मैटर (PM10 और PM2.5), कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाता है। सामान्य तौर पर हवा में कणों की सुरक्षित सीमा 50 माइक्रोग्राम होती है, जो आतिशबाजी के दौरान बढ़कर 1,000 माइक्रोग्राम या उससे भी अधिक हो जाती है। अंग्रेजी नव वर्ष पर आतिशबाजी और पटाखे फोड़ने से स्थानीय स्तर पर वायु और ध्वनि प्रदूषण में भारी वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, संघीय पर्यावरण एजेंसी के अनुसार, केवल जर्मनी में नव वर्ष की आतिशबाजी से लगभग 2,050 टन PM10 कण उत्पन्न होते हैं।
अंग्रेजी नव वर्ष के जश्न के दौरान ध्वनि प्रदूषण का स्तर सामान्य से 40% से 60% तक बढ़ जाता है, जो कई शहरों में 80 डेसिबल से लेकर 110 डेसिबल से ऊपर तक पहुँच जाता है। आवासीय क्षेत्रों के लिए रात के समय ध्वनि की सुरक्षित सीमा 45 डेसिबल तय की गई है। लेकिन 31 दिसंबर की रात 12 बजे के आसपास यह सीमा पूरी तरह टूट जाती है।
नए साल का स्वागत करने के लिए छोड़े जाने वाले पारंपरिक पटाखों से 100 से 140 डेसिबल तक की तीव्र ध्वनि उत्पन्न होती है, जो कानों के लिए बेहद दर्दनाक और नुकसानदेह होती है। पब, क्लबों और सोसायटियों में बजने वाले म्यूजिक सिस्टम की आवाज़ अक्सर 90 से 100 डेसिबल पार कर जाती है। लेकिन इन सब पर हिंदू विरोधी सभी तत्व चुप्पी साध लेते हैं।
उत्सव और खुशी का माध्यम हैं पटाखे
दीपावली पर पटाखे जलाना सदियों से उत्सव और खुशी का एक बड़ा माध्यम रहा है। पटाखे जलाने के मुख्य फायदों में सामाजिक उत्सव का आनंद, आर्थिक गतिविधियां, सांस्कृतिक महत्व और कुछ हद तक पारंपरिक मान्यताएं शामिल हैं। यद्यपि आज के समय में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए ग्रीन पटाखों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन पारंपरिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से पटाखों के कई पहलू हैं। पटाखों की रोशनी और आवाज को अज्ञानता पर ज्ञान और अंधकार पर प्रकाश की विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
रंग -बिरंगी आतिशबाजी और पटाखे बच्चों और बड़ों सभी के मन को प्रफुल्लित करते हैं। यह उत्सव के माहौल को और अधिक जीवंत बनाता है। सामूहिक रूप से पटाखे जलाने के लिए लोग अक्सर अपने परिवारों, पड़ोसियों और दोस्तों के साथ खुले मैदानों या छतों पर इकट्ठा होते हैं, जिससे आपसी मेलजोल बढ़ता है। भारत में पटाखा उद्योग एक बहुत बड़ा व्यापार है। दीपावली के दौरान इस उद्योग से लाखों श्रमिकों, छोटे दुकानदारों और व्यापारियों को रोजगार और आजीविका मिलती है।
यहां आतिशबाजी को बढ़ावा देने की बात नहीं है, क्योंकि हर हिंदू यह जानता है कि धुआं एवं ध्वनि का अतिरेक मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी है। इसलिए वह पर्यावरण और प्रदूषण की दृष्टि से पटाखों का सीमित प्रयोग करता है,और अब तो ग्रीन पटाखों का युग आ गया है। इसलिए पटाखों को लेकर केवल हिंदुओं को निशाना बनाना अनुचित है। हिंदू धर्म नित्य नूतन, चिर पुरातन है, इसलिए देश, काल और परिस्थितियों को देखकर अपने आप में परिवर्तन करने की अद्भुत क्षमता रखता है।
पांचजन्य