ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की ISI भारत में अपने जासूसी नेटवर्क को मजबूत करने के लिए युवाओं को मात्र 500-1000 रुपये में भर्ती कर रही है।
21 मई, 2026 – नई दिल्ली : ऑपरेशन सिंदूर के दैरान भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान के आतंकी ढांचे को गहरी चोट देने के साथ सैन्य प्रतिष्ठानों और रणनीतिक संपत्तियों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया। वहीं, पाकिस्तान बड़े जवाबी हमले के बावजूद भारत में कोई बड़ा हमला करने में विफल रहा। इस शर्मिदंगी के बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI भारत के भीतर अपने जासूसी नेटवर्क को मजबूत बनाने के लिए आक्रामक अभियान चला रही है।
भारतीय एजेंसियों ने ऐसे कई नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें एक सीसीटीवी जासूसी आपरेशन और इन्फ्लुएंसर्स का एक नेटवर्क शामिल है। हालांकि ये बड़े मामले हैं, लेकिन एजेंसियां उन युवाओं के एक बड़े नेटवर्क को लेकर ज्यादा परेशान हैं जो मात्र 500 रुपये जैसी छोटी रकम के लिए जानकारी देने को तैयार हो जाते हैं। ये कम लागत वाले जासूस 500 से 1,000 रुपये के बीच चार्ज करते हैं। इनकी संख्या बहुत अधिक हैं और इनको ट्रैक करना काफी मुश्किल होता है।
ISI इनसे जो जानकारी मांगती है, वह भले ही छोटी लग सकती है, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए, किसी युवक को रेलवे स्टेशन के बाहर बैठकर भारतीय सैनिकों की आवाजाही पर नजर रखने के लिए कहा जाता है।
सैन्य गतिविधियों पर नजर
भारतीय सेना अपने सैनिकों की आवाजाही के लिए रेलवे पर बहुत ज्यादा निर्भर है। देश भर में टैंक, तोपखाने और भारी रसद ले जाने के लिए भी सेना रेलवे का उपयोग करती है। नियमित रूप से विशेष सैन्य ट्रेनें चलाती है और शांति या युद्ध दोनों ही समय में सैनिकों को तेजी से तैनात करने के लिए रेलवे नेटवर्क का उपयोग करती है। इस तरह की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बहुत ज्यादा ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती। इन नए लड़कों को बस ट्रेन का समय, उसकी आवाजाही का विवरण और गंतव्य के बारे में जानकारी देनी होती है।
रणनीतिक संपत्ति बने जासूस
इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक अधिकारी ने बताया कि ऐसे कामों के लिए ISI उन युवाओं की तलाश करती है जो रेलवे स्टेशनों पर बिना किसी काम के घूमते रहते हैं।
ये कम लागत वाले जासूस पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के लिए रणनीतिक संपत्ति बन गए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिए उसे ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता क्योंकि ऐसे लोगों को काम पर रखना बहुत सस्ता है।
पैसे का लालच कर रहा नेटवर्क का विस्तार
एक अन्य अधिकारी ने समझाया कि ऐसे मामलों में भर्ती की रणनीति भी बहुत आसान होती है। भारत में मौजूद हैंडलर्स को इस जासूसी काम के लिए बस कुछ युवाओं की पहचान करने को कहा जाता है।
बदले में इन लड़कों को अपने दोस्तों के ग्रुप से ऐसे ही और लोगों को ढूंढने के लिए कहा जाता है। इन युवाओं के लिए, सिर्फ पैसे का लालच ही उन्हें इस नेटवर्क में खींच लाता है। अधिकारी ने बताया कि इन लोगों से काम करवाने के लिए यह कम भुगतान ही काफी होता है।
सस्ते फोन को ट्रैक करना मुश्किल
कम लागत वाला यह नेटवर्क बिना जीपीएस या बिना रिकार्डिंग सुविधा वाले सस्ते फोन का इस्तेमाल करता है। इसका मतलब है कि इन फोन को ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है।
इन लोगों को बस जानकारी जुटानी होती है और फिर उसे अपने आकाओं तक पहुंचाना होता है। काम पूरा होने के बाद सिम कार्ड फेंक दिए जाते हैं और उन्हें नए सिम कार्ड दे दिए जाते हैं।
जासूसी नेटवर्क के अलग-अलग स्तर
एक अन्य अधिकारी ने कहा कि ISI कई स्तरों पर जासूसी नेटवर्क बनाने में लगी है। इसके पास कुछ ऐसे नेटवर्क भी हैं, जो संवेदनशील जगहों पर सौर ऊर्जा से चलने वाले सीसीटीवी कैमरे लगाते हैं। इन लोगों को हर कैमरा लगाने के लिए 10,000- 15,000 रुपये के बीच भुगतान किया जाता है।
व्हाइट कालर नेटवर्क इसके बाद आता है व्हाइट-कालर यानी पढ़े-लिखे लोगों का नेटवर्क। इन लोगों को 50,000- 75,000 रुपये के बीच मिलते हैं। इन लोगों को ऊंचे स्तर की जानकारी जुटाने के लिए रखा जाता है। यह वही नेटवर्क है जिसका इस्तेमाल हनी ट्रैप और भारत के रक्षा तथा विज्ञान और तकनीक क्षेत्रों के बारे में बहुत संवेदनशील जानकारी जुटाने के लिए किया जाता है।
दैनिक जागरण