प्यू रिसर्च के अनुसार, अमेरिका में हिंदू और भारतीय सबसे अधिक शिक्षित हैं, 70% स्नातक या उससे अधिक। लेख भारतीयों के देश प्रेम पर भी प्रकाश डालता है, जबकि कुछ भारतीय बुद्धिजीवी विदेश में भारत की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करते हैं।
क्षमा शर्मा

हाल में प्यू रिसर्च से जुड़ी खबर में बताया गया कि अमेरिका में रहने वाले तमाम धार्मिक समूहों में हिंदू सबसे अधिक पढ़े-लिखे हैं। इसके बाद यहूदी समुदाय है। 70 प्रतिशत हिंदुओ ने स्नातक या उससे अधिक पढ़ाई की है। इसी क्रम में 65 प्रतिशत यहूदियों के पास स्नातक या उससे अधिक पढ़ाई की योग्यता है। इन दोनों समूहों की तुलना में अमेरिकियों में मात्र 35 प्रतिशत लोगों के पास इतनी शिक्षा है।
मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई समूहों में दस में से चार के पास स्नातक तक की शिक्षा है। प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के पास भी औसत से अधिक शिक्षा है, जबकि कैथोलिक समूहों की शिक्षा राष्ट्रीय औसत से कम है। प्यू रिसर्च से जुड़ी खबर यह भी बताती है कि अधिकांश भारतीय जो अमेरिका आए हैं, वे उच्च शिक्षा लेकर ही आए हैं।
एक अन्य खबर में बताया गया कि भारतीयों को भारत से बहुत कम शिकायत है। वे अपने देश के निंदा अभियानों में शामिल नहीं होते। सिर्फ तीन प्रतिशत भारतीय ही अपने देश के बारे में नकारात्मक राय रखते हैं। अमेरिका में अपने देश को नापसंद करने वाले लोगों की संख्या 20 प्रतिशत और ब्रिटेन में 29 प्रतिशत है। भारत, स्पेन, कनाडा, इंडोनेशिया आदि देशों के लोगों को इस पर भी गर्व है कि उनके देश में बहुत सी भाषाएं बोली जाती हैं। यह निष्कर्ष 25 देशों के 30 हजार लोगों से बातचीत करके निकाला गया।
अपने ही देश भारत की निंदा करने वाले तीन प्रतिशत लोगों में बुद्धिजीवी तबका और विशेष तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या ज्यादा प्रतीत होती है। इसका एक उदाहरण इस लेखिका को हाल की अमेरिका यात्रा के दौरान मिला। एक बड़े विश्वविद्यालय में भारत के बारे में एक संगोष्ठी थी। वहां जाना हुआ। बोलने वाले विश्वविद्यालय के वरिष्ठ भारतीय प्रोफेसर ही थे।
लगभग दो घंटे के संबोधन और पीपीटी में उन्होंने जो चीजें दिखाईं, उनमें बारंबार यही कहा गया कि इस देश में यह बुराई है, वह बुराई है। यहां तो कुछ हुआ ही नहीं है। आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा ही पिछड़ा है। महिलाओं के मामले में तो इसका रिकार्ड बहुत खराब है। जो आंकड़े उन्होंने प्रस्तुत किए, वे भी पता नहीं कहां से निकाल कर लाए थे। उनसे भारत की एक बहुत ही पिछड़े हुए देश की छवि बनती थी। निःसंदेह अपने देश की आबादी के लिए बहुत कुछ करना अभी बाकी है, लेकिन कुछ हुआ ही नहीं, यह बात तथ्यों से परे हैं।
संगोष्ठी के बाद यह लेखिका उन प्रोफेसर महोदय से मिलने गई। उनसे पूछा कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों मान लिया है कि भारत से कोई उम्मीद ही नहीं है और वह एक बेकार देश है। चूंकि वे परिचित थे, तो बाहर निकलते वक्त साथ आए। अपनी कार में बैठते हुए उन्होंने जो कहा, उसे सुनकर बहुत हैरानी हुई। वह बोले कि अगर हम ऐसा नहीं करेंगे, तो हमें कौन पूछेगा? यानी हमें कोई पूछे, हमारा करियर परवान चढ़े, हम प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचें, इसलिए हम कहेंगे कि भारत किसी लायक ही नहीं है। आखिर यह बेईमानी नहीं तो और क्या है?
कुछ दशक पहले एक परिचित लड़की एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन में काम करती थी। अक्सर बहुत से देशों में जाती थी। एक बार अमेरिका में एक सेमिनार में गई। वहां एक अमेरिकी लड़की ने उसे देखकर नफरत से कहा कि तुम यहां क्या कर रही हो। क्या आता है तुम्हें? एक तरफ तो प्यू रिसर्च कह रहा है कि भारतीय, जिनमें अधिकांश हिंदू हैं, सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, तो दूसरी तरफ पिछले सालों में ट्रंप के दिए गए बयान उनके इस डर की पुष्टि भी करते हैं कि कहीं भारतीय उनकी रही-सही दुनिया को न उजाड़ दें।
इसीलिए भारतीयों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं ताकि उन्हें किसी तरह से रोका जा सके। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका में वहां के नागरिकों की पढ़ने-लिखने और अपनी योग्यता बढ़ाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। इसीलिए दुनिया भर के पढ़े-लिखे लोग अमेरिका के विभिन्न विश्व प्रसिद्ध संगठनों में बड़ी संख्या में काम करते हैं। जिस सिलिकॉन वैली पर अमेरिका इतराता है, उसमें भारतीयों का ही वर्चस्व है। इसीलिए अब कोशिश है कि रोजगार में प्राथमिकता अमेरिकी लोगों को ही मिले।
इस तरह की बातें अमेरिकी सरकार द्वारा ही की जा रहीं हैं। आखिर कौन रोकता है कि ऐसा न हो, लेकिन इसके लिए अपने नागरिकों में वह योग्यता भी पैदा कीजिए। यद्यपि अमेरिका के बड़े-बड़े उद्योगपति कह चुके हैं कि यदि भारतीयों को रोका गया, तो यह अमेरिका के लिए ही नुकसानदायक होगा। आम तौर पर विदेश में भारतीयों की बहुत सकारात्मक छवि है।
एक बार ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े रेडियो समूह में काम करने वाली एक भारतीय महिला ने कहा था कि हमारे बारे में माना जाता है कि हम शांति प्रिय समूह है। अपने काम से काम रखते हैं। प्यू रिसर्च ने भारतीयों के जिस देश प्रेम के बारे में बताया, वह भी मैंने खुद महसूस किया। एक बार फ्रांस जाते हुए एक मुस्लिम महिला मिली। उसने बड़े दुख से कहा कि वह पांच साल से भारत नहीं जा पाई है। उसे अपने देश की बहुत याद आती है। अपने देश से अच्छा कुछ नहीं है। यह कहते हुए उसकी आंखें भर आईं। वास्तव में यह देश ही है, जो हमें पालता-पोसता है और पहचान दिलाता है, लेकिन कुछ लोग हैं, जो यह भूल जाते हैं। हैरानी इस पर है कि इनमें बुद्धिजीवी अधिक हैं।
(लेखिका साहित्यकार हैं)
दैनिक जागरण