अंग्रेजों के ‘बांटो और राज करो’ के नैरेटिव का सच
अंग्रेजों ने पंजाब को 1857 के विद्रोह से अलग दिखाने के लिए ‘मार्शल रेस’ का नैरेटिव गढ़ा। लेकिन अजनाला हत्याकांड से लेकर फिरोजपुर और लुधियाना के विद्रोह तक, पंजाब ने आजादी की पहली लड़ाई में जो बलिदान दिया, वह अद्वितीय है।
राकेश जैन

Role of Punjab in 1857 Revolt : अंग्रेजों ने भारत पर बांटो और राज करो की नीति पर चलते हुए शासन किया, जिसके चलते अनेक तरह के झूठे नैरेटिव गढ़े गए जिससे भाई-भाई के बीच लड़ाई चलती रहे। भारतीय समाज को बांटने के लिए अंग्रेजों ने योद्धा (मार्शल) और गैर-योद्धा वर्गों में विभाजित करने का प्रयास किया। इनमें पठानों, गोरखों व सिखों को मार्शल जाति बताया गया। केवल इतना ही नहीं देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद चलने वाले आंदोलनों से पंजाब के लोगों को दूर रखने के लिए यह झूठ घड़ा गया कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहा और यहां के लोगों ने इस समय अंग्रेजों की सहायता की।
जबकि सच्चाई यह है कि सम्पूर्ण भारत में राष्ट्रीय समर (1857) का पंजाब में वही स्वरूप रहा जो अन्य स्थानों पर था। संघर्ष से पूर्व नाना साहेब पेशवा तथा अज़ीमुल्ला खां ने पंजाब प्रान्त में जी.टी. रोड से जुड़ी छावनियों की यात्रा की थी, विशेषकर अम्बाला के प्रति वे बड़े सजग थे जहां ब्रिटिश सेना का शस्त्रागार भी था। उन्होंने पंजाब के नागरिकों व सिक्खों से भी सम्बन्ध स्थापित किये। इसी बादशाह भान्ति बहादुरशाह जफर ने भी न केवल पटियाला के राजा को बल्कि पटियाला की जनता के नाम भी कुछ पत्र भेजे जो पकड़े गये तथा अम्बाला के डिप्टी कमिश्नर डग्लस फोरसीथ को सौंप दिये गये। बहादुरशाह जफर ने कुछ घोषणाएं लाहौर व अन्य सैनिक छावनियों में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रसारित की थीं।
अम्बाला तथा मेरठ में क्रान्ति अम्बाला सामरिक तथा संचार की दृष्टि से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान था। यहां अंग्रेजों का एक विशाल शस्त्रागार तथा भारी तोपखाना भी था। अम्बाला में 60वीं देसी पलटन, 5वीं देसी पलटन व चौथी लाइट कैविलरी थी। योजना थी कि 31 मई को प्रात: 10 बजे जबकि रविवार होने के कारण अनेक अंग्रे•ा गिरजाघर गये हुए होंगे, सेना में बगावत की जाए तथा शस्त्रागार, बन्दूकें व अन्य सामग्री लूट ली जाये और सैनिक दिल्ली कूच करें। परन्तु योजना सफल न हो सकी।
फिरोजपुर में क्रांति
दिल्ली में हुए संघर्ष की सूचना सर्वप्रथम तार द्वारा लाहौर भेजी गई। समाचार सुनते ही राबर्ट मिण्टगुमरी मियांमीर छावनी पहुंचा और भारतीय सैनिकों को नि:शस्त्र करने की योजना बनी। 13 मई की प्रात: सभी सैनिकों को परेड में बुलाया गया। उनके पीछे अंग्रेज सेना को बन्दूकों से लैस करके 12 तोपों के साथ घेरा बनाया गया। परेड में खड़े होते ही भारतीय सैनिकों को हथियार डालने को कहा गया। अत: कुछ ही मिनटों में लगभग 3000 भारतीय सैनिकों को नि:शस्त्र कर दिया गया। इस घटना ने पंजाब में भयंकर संघर्ष को कुछ हद तक दबा दिया।
इस घटना के 6 घण्टे बाद ही फिरोजपुर की 45वीं देसी पलटन व 57वीं देसी पलटन ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। 61वीं इंगलिश पलटन द्वारा भारतीय सेना के विद्रोह के दमन का प्रयास किया गया। सेना ने शहर में लूटपाट की। सरकारी भवनों में आग लगा दी। अगले दिन अंग्रेजी सेना ने सख्ती से दमन किया। 13 जून को अनेक भारतीयों को फांसी दी गई।
गोबिन्दगढ़ व अमृतसर में क्रान्ति
अमृतसर की गोबिन्दगढ़ छावनी में भी भारतीय सैनिकों को बड़े ही नाटकीय ढंग से नि:शस्त्र किया गया। 13 मई की रात्रि को आसपास के क्षेत्रों के 200 इक्कों में अंग्रेज सैनिकों को बिठला कर अमृतसर भेजा गया। अगले दिन प्रात: गोबिन्दगढ़ की छावनी में भारतीय सैनिकों को नि:शस्त्र किया।
जालन्धर व फिल्लौर में विद्रोह
जालन्धर छावनी पंजाब की एक प्रमुख छावनी तथा पंजाब का सबसे बड़ा शस्त्रागार फिल्लौर में था। यहां की 36वीं तथा 91वीं देसी पलटन ने संघर्ष कर दिया। कर्नल हार्टले ने कुछ ब्रिटिश कम्पनियों को शस्त्रागार की सुरक्षा के लिए फिल्लौर भेजा। फिल्लौर का किला जालन्धर से 24 मील की दूरी पर है। सेना में विद्रोह होने पर कुछ अंग्रेज मारे गये।
लुधियाना में विद्रोह
लुधियाना में पहले से ही ब्रिटिश शासन के प्रति असन्तोष था। जून 1857 में जालन्धर तथा फिल्लौर से दिल्ली जाते हुए भारतीय सैनिक जब लुधियाना में रुके तो अनेक नागरिक भी उनके साथ हो गये। यहां के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर रिक्कैट्स ने लुधियाना दुर्ग की रक्षा के लिए युद्ध किया। अनेक लोग मारे गये।
मुल्तान में विद्रोह
मुल्तान पंजाब को सिन्ध से जोडने वाली महत्त्वपूर्ण कड़ी रहा है। सितम्बर, 1857 में मुल्तान के किले में 48 ब्रिटिश तोपची और दो भारतीय रेजीमेण्टें थीं। जालन्धर में भारतीय सैनिकों के विद्रोह ने अंग्रे•ा अधिकारियों को चौकन्ना कर दिया था । स्थिति को भांपते हुए भारतीय सैनिकों ने हथियार डाल दिये। दोनों रेजीमेण्टों को नि:शस्त्र किया गया तथा 59 व्यक्तियों को गोली से मार दिया गया।
एक भयावह हत्याकाण्ड
दो सप्ताह पश्चात् फिरोजपुर में एक और हत्याकाण्ड हुआ। नि:शस्त्र 10वीं लाइट कैविलरी को जब घोड़े वापिस करने को कहा गया तो वे भाग खड़े हुए। ब्रिगेडियर इन्नेस ने उनका पीछा किया। उसने दावा किया कि उसने एक ही घोड़े पर बैठे-बैठे 100 भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। पेशावर में नि:शस्त्र भारतीय रेजीमेण्ट के सैनिक चारों ओर धर्मान्ध मुस्लिम आबादी से घिरे थे। 28 अगस्त को सब नि:शस्त्र सैनिकों को छावनी के निकट एकत्रित होने के लिए कहा गया। भारतीयों को लगा कि उन्हें शीघ्र ही मार दिया जायेगा, अत: उन्होंने कुछ शस्त्र लूटे तथा खैबर की ओर भागे। जमरूद पहुंचने तक 700 सैनिक मारे जा चुके थे।
पंजाब के बाहर पंजाबियों की बगावत
बनारस में लुधियाना रेजीमेण्ट को 5 जून को नि:शस्त्र करने का प्रयत्न हुआ तो 13वीं अनियमित कैविलरी तथा सिक्खों ने विरोध किया। महू में 23वीं रेजीमेण्ट में ब$गावत करने पर 90 सिक्ख 4 जुलाई, 1857 को आगरा में पकड़े गये। झांसी में 12वीं पंजाबी रेजीमेण्ट के 21 सिक्खों को फांसी दी गई। डेरा इस्माईल खां में मालवा क्षेत्र के सिक्ख सैनिकों ने अपने अधिकारियों को मारने का प्रयत्न किया था।
वास्तव में 1857 के प्रथम राष्ट्रीय स्वातंत्र्य संघर्ष में पंजाब ने अपनी गौरवशाली परम्परा का निर्वाह किया। ‘यातना घर’ के नाम से बदनाम अण्डमान की जेल ‘काला पानी’ में 218 सिपाही विद्रोहियों का पहला जत्था पंजाब से ही गया था।
अजनाला हत्याकाण्ड
लाहौर में भारतीय सैनिकों की चार रेजीमेण्टें नि:शस्त्र कर दी गई थीं। इसमें से 26वीं भारतीय रेजीमेण्ट के सैनिकों ने चुपचाप खिसकने की योजना बनाई। एक मेजर तथा कुछ ब्रिटिश सारजेण्टों को कुछ सन्देह हुआ। सभी 282 व्यक्तियों को अजनाला के पास पकड़ लिया गया।
अजनाला के इस हत्याकाण्ड में फ्रैडरिक हेनरी कूपर ने स्वयं बढ़चढ़ कर भाग लिया। कूपर के अनुसार इन सबको एक कमरे में बन्द कर दिया गया जिनमें से 45 सैनिक रात्रि की गर्मी, थकावट, ऑक्सीजन की कमी से मर गये तथा शेष अगले दिन अर्थात् 1 अगस्त जो बकरा ईद का दिन था, कूपर द्वारा अहंकार पूर्वक ईसाइयों की बकरा ईद के रूप में 237 व्यक्तियों को 10-10 के एक दल में एक-दूसरे से बान्धकर तोप द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया। कमरे में मारे गए सैनिकों की लाशों को घसीट कर बाहर निकाला गया और उन्हें एक पुराने कुएं में जो कि थाने से सौ गज की दूरी पर था, डाल दिया गया। कुएं में जो जगह बाकी रही थी वह ऊपर से भर दी गई।
पंजाब की जनता का योगदान
इस संघर्ष में सर्वप्रथम महाराज सिंह ने जन जागरण किया, परन्तु उनको शीघ्र ही गिरफ्तार कर लिया गया था। सामान्यत: नागरिकों के दो प्रकार के प्रयास थे। लोगों ने चीफ कमिश्नर के सैक्रेटरी रिचर्ड टैम्पल के अनुसार सभी प्रमुख यूरोपियन अधिकारियों को मारने की योजना बनाई गई, परन्तु वह असफल हो गई। अमृतसर में बड़ी संख्या में बैरागियों को गिरफ्तार कर जेलों में बन्द कर दिया गया। एक ब्राह्मïण राधाकिशन को फांसी दी गई।
अनेक सिक्ख सैनिकों को फांसी दे दी गई। लुधियाना 1857 के प्रमुख संघर्ष केन्द्रों में एक था। यहां की तत्कालीन मुस्लिम जनसंख्या तीन-चौथाई थी। यहां के डिप्टी कमिश्नर जी. रिक्कैट्स के अनुसार संघर्ष का नेतृत्व अब्दुर कादिर नाम के एक बहुत खतरनाक व्यक्ति ने किया था। यहां की जनता ने न केवल जालन्धर के सैनिक संघर्षकत्र्ताओं का भव्य स्वागत किया बल्कि सरकारी इमारतों तथा खजाने को लूटने को प्रेरित किया था।
परिणामस्वरूप मिशन चर्च, स्कूल लायबरेरी, पुस्तक भण्डार सभी नष्ट कर दिये गये। अनेक कैदियों को छोड़ दिया जो दिल्ली की ओर चल दिये थे। इसी भान्ति जान निकोलसन की दिल्ली जाती हुई सेना को परेशान किया। लोगों ने संघर्ष के लिए शस्त्र भी इकट्ठा किए। डिप्टी कमिश्नर जी. रिक्कैटस नेअत्यन्त वीभत्स तथा दमनकारी तरीके अपनाये। शस्त्रों के लिए घर-घर तलाशी हुई तथा नगर में दस-ग्यारह बैलगाडिय़ों पर शस्त्र इकट्ठे किये गये। अनेकों को जुर्माना भरने को कहा। नगर पर 25294 रुपए जुर्माना किया तथा 25 नागरिकों को फांसी दी गई।
फिरोजपुर के लोगों ने ही 45वीं भारतीय रैजीमेण्ट को नगर में लूट के लिये प्रोत्साहित किया था। श्यामदास संन्यासी ने वहां के लोगों को प्रेरित करने में मुख्य भूमिका निभाई, उसे फांसी दी गई, उसके अनुयायियों पर हमले किये तथा अनेक मारे गये। सियालकोट में विद्रोह का बड़ा रौद्र रूप रहा। 9 जुलाई को भारतीय रेजीमेण्ट के विद्रोह से चारों ओर विद्रोह की ज्वाला भडक़ी। ब्रिगेडियर ब्रीड, कैप्टन बिशप कत्ल कर दिए गए। पादरी हंटर व उसके परिवार को भी कत्ल कर दिया गया।
यहां की पंजाबी मिलिटरी पुलिस ने भी विद्रोह में भाग लिया। अनेकों को फांसी दी गई तथा लगभग 50 ग्रामवासियों को दण्डस्वरूप बैंतें मारी गईं। 6 नम्बरदारों को भी फांसी हुई। सियालकोट नगर पर 7500/- रुपया जुर्माना भी किया गया। गोगीरन में 17 सितम्बर, 1857 को संघर्ष प्रारम्भ हो गया। यह तेजी से कमनलिया, तोलउम्बा, चीचावतनी शारकोट, हड़प्पा तथा पाकपटन तक फैला। संघर्षकर्ताओं की संख्या 125000 तक आँकी गई।
संघर्ष को दबाने के लिए झँग, लियाह, लाहौर, मुल्तान से सेनायें भेजी गईं। पेशावर नगर की पूरी आबादी ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया। सरकार द्वारा इसके दमन के लिए एक पासपोर्ट व्यवस्था बनाई गई तथा गुप्तचरों का जाल फैलाया गया। दो यूरोपियन रेजीमेण्टों तथा तोपखाने की मदद से वहां शान्ति हो सकी।
यह ठीक है कि पंजाब की देसी रियासतों जैसे पटियाला, जींद, नाभा, कपूरथला ने इस दौरान अंग्रेजों की हर तरह से सहायता की परंतु यह कहना ठीक नहीं होगा कि इस संग्राम से पंजाब बिल्कुल दूर रहा, यह अर्धसत्य होगा।
पांचजन्य