भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में किसी की आस्था दूसरे की पीड़ा का कारण नहीं बननी चाहिए और किसी की भावना दूसरे के अधिकारों को कुचलने का औजार भी नहीं बननी चाहिए।
हरबंश दीक्षित

बकरीद पर गाय की कुर्बानी को लेकर बंगाल में एक बार फिर टकराव की परिस्थितियां बन रही हैं। ताजा विवाद केवल मजहबी मामले को नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के उस संवेदनशील क्षेत्र को फिर सामने ले आया है, जहां आस्था, कानून, सामाजिक सद्भाव और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी एक-दूसरे की परीक्षा लेते हैं। प्रश्न यह नहीं कि किसी समुदाय को अपने मजहब का पालन करने का अधिकार है या नहीं? यह अधिकार संविधान ने स्पष्ट रूप से दिया है।
प्रश्न यह है कि क्या किसी अवसर पर गोवंश की बलि को ऐसा अनिवार्य मजहबी आचरण माना जा सकता है, जिसके सामने राज्य के वैध पशु-संरक्षण कानून निष्प्रभावी हो जाएं? कलकत्ता हाई कोर्ट का ताजा रुख इसी प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देता है। उसने बंगाल सरकार की उस व्यवस्था में हस्तक्षेप से इन्कार किया, जिसके तहत गाय, बैल, बछड़ा, भैंस आदि का वध बिना वैधानिक प्रमाणपत्र और अधिकृत स्थान के नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ईद-उल-अजहा में गाय की कुर्बानी इस्लाम की ऐसी अनिवार्य मजहबी आवश्यकता नहीं, जिसे अनुच्छेद 25 के अंतर्गत पूर्ण संरक्षण प्राप्त हो। यह दृष्टिकोण अचानक नहीं आया है। इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट की लंबी संवैधानिक परंपरा और अनेक निर्णयों की ठोस पृष्ठभूमि है। संविधान धार्मिक स्वतंत्रता को मूल अधिकार का दर्जा देता है। अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा आस्था को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है, किंतु यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक प्रविधानों के अधीन है। इसी अनुच्छेद में राज्य को सामाजिक सुधार और लोकहित से जुड़े कानून बनाने की शक्ति भी दी गई है। इसलिए मजहबी आजादी का अर्थ यह नहीं कि हर परंपरा कानून से ऊपर हो जाए।
गाय की कुर्बानी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का पहला बड़ा निर्णय मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य का है। इस मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के गोवध निषेध कानूनों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी इस्लामी मजहबी आचरण का हिस्सा है और उस पर रोक अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बकरीद पर कुर्बानी का मजहबी महत्व हो सकता है, पर गाय की ही कुर्बानी अनिवार्य नहीं है। इस्लामी परंपरा में बकरी, भेड़, ऊंट आदि विकल्प उपलब्ध हैं। इसलिए गाय की कुर्बानी को इस्लाम की अनिवार्य मजहबी प्रथा नहीं माना जा सकता।
मजहब के नाम पर हर सामाजिक, सांस्कृतिक या परंपरागत व्यवहार को संवैधानिक संरक्षण नहीं मिल सकता। संरक्षण उसी आचरण को मिलेगा जो मजहब विशेष का मूल, आवश्यक और अविभाज्य हिस्सा हो। यदि कोई आचरण वैकल्पिक है, परंपरागत है या सामाजिक सुविधा से जुड़ा है, तो राज्य उसे लोकहित में नियंत्रित कर सकता है। इसी दृष्टि को सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्टेट आफ वेस्ट बंगाल बनाम आशुतोष लाहिड़ी’ में और स्पष्ट किया।
राज्य सरकार ने बकरीद पर स्वस्थ गायों के वध के लिए छूट देने की कोशिश की थी। कलकत्ता हाई कोर्ट ने उस छूट को अनुचित माना और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के दृष्टिकोण को सही ठहराते हुए कहा कि बकरीद पर स्वस्थ गाय की कुर्बानी मुसलमानों की अनिवार्य मजहबी आवश्यकता नहीं है। यदि राज्य का कानून कहता है कि केवल उम्रदराज, अक्षम या अनुपयोगी पशु का वध वैधानिक प्रमाणपत्र के बाद ही हो सकता है, तो बकरीद के नाम पर स्वस्थ गोवंशीय पशुओं के वध की खुली छूट नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने पशु-संरक्षण और राज्य की विधायी शक्ति को भी बार-बार मान्यता दी है। गुजरात राज्य बनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब जमात मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के कठोर गोवध निषेध कानून को वैध ठहराया था। गोवध निषेध को केवल बहुसंख्यक धार्मिक भावना से जोड़कर देखना अधूरा दृष्टिकोण होगा। संविधान ने स्वयं पशुधन संरक्षण को अनुच्छेद 48 में नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा माना है। हां, यह भी उतना ही आवश्यक है कि इस नीति को लागू करते समय राज्य किसी समुदाय को राजनीतिक लाभ के लिए निशाना बनाने की प्रवृत्ति से बचे।
आस्था का सम्मान कानून-विरोधी आग्रह से नहीं बढ़ता। बकरीद का संदेश त्याग, संयम और ईश्वर-निष्ठा का है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने न तो मजहबी स्वतंत्रता को नकारा और न ही राज्य को असीमित शक्ति दी। उसने केवल इतना कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि गाय की कुर्बानी इस्लाम की अनिवार्य मजहबी प्रथा नहीं है, तब राज्य के पशु-वध नियंत्रण कानूनों को बकरीद के नाम पर अनदेखा नहीं जा सकता।
भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में किसी की आस्था दूसरे की पीड़ा का कारण नहीं बननी चाहिए और किसी की भावना दूसरे के अधिकारों को कुचलने का औजार भी नहीं बननी चाहिए। आज आवश्यकता है कि सरकारें कानून को निष्पक्षता से लागू करें, धर्मगुरु समाज को संयम का संदेश दें, राजनीतिक दल आग में घी डालने से बचें और नागरिक यह समझें कि अधिकारों के साथ संवैधानिक उत्तरदायित्व भी होते हैं।
(लेखक विधि मामलों के विशेषज्ञ हैं)
दैनिक जागरण