मानव जीवन और प्रकृति का संबंध अत्यंत गहरा एवं अटूट है। पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व जल, वायु, भूमि, वनस्पति तथा जैव विविधता पर निर्भर करता है।

मानव जीवन और प्रकृति का संबंध अत्यंत गहरा एवं अटूट है। पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व जल, वायु, भूमि, वनस्पति तथा जैव विविधता पर निर्भर करता है। प्रकृति केवल हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं करती, बल्कि हमें संतुलित एवं स्वस्थ जीवन जीने की प्रेरणा भी देती है। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और विभिन्न पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रहा है, तब प्रकृति के महत्व को समझना और भी आवश्यक हो गया है।
5 से 16 जून 1972 के बीच संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीडन के स्टॉकहोम शहर में विश्व का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें 119 देशों ने भाग लिया था। इसी सम्मेलन से विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की नींव पड़ी। इस सम्मेलन का नारा था—“केवल एक पृथ्वी”। इसी के साथ “विश्व पर्यावरण दिवस” की शुरुआत हुई। तब से प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
इस वर्ष की थीम है – “प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।” इस थीम का मुख्य उद्देश्य लोगों को प्रकृति के महत्व के प्रति जागरूक करना तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए प्रकृति-आधारित समाधानों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। यह संदेश देता है कि स्वस्थ पर्यावरण, जैव विविधता का संरक्षण, वनों की सुरक्षा, जल स्रोतों का संवर्धन तथा प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग ही मानव समाज के सुरक्षित, समृद्ध और टिकाऊ भविष्य की आधारशिला हैं।
जलवायु संरक्षण में प्रकृति की भूमिका
प्रकृति हमें सिखाती है कि संतुलन और सह-अस्तित्व ही विकास का वास्तविक आधार है। जंगल, नदियाँ, पर्वत, आर्द्रभूमियाँ और महासागर पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, जिससे वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। यदि हम प्रकृति के इन प्राकृतिक तंत्रों का संरक्षण करें और उनसे प्रेरणा लेकर विकास की योजनाएँ बनाएं, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पर्यावरण प्रदूषण: एक गंभीर चुनौती
वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण एक गंभीर चुनौती बन चुका है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग तथा प्लास्टिक प्रदूषण ने वायु, जल और मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। इसका सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। विशेष रूप से वायु प्रदूषण आज विश्वभर में साँस संबंधी रोगों का एक प्रमुख कारण बन गया है।
वायु में उपस्थित सूक्ष्म कण (PM2.5 और PM10), धुआँ, रासायनिक गैसें तथा विषैले तत्व फेफड़ों तक पहुँचकर गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। एलर्जी, अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), निमोनिया, फेफड़ों का कैंसर तथा क्षय रोग (टीबी) जैसी समस्याएँ प्रदूषित वातावरण में अधिक देखने को मिलती हैं।
PM 1 वाले अति सूक्ष्म प्रदूषित कण फेफड़े से होकर रक्त संचरण में जाकर विभिन्न अंगों में पहुंचते हैं और बहुत सी बीमारियों को पैदा करते हैं जैसे डॉयबिटीज, बीपी, हृदय की बीमारियां, स्ट्रोक, माइग्रेन, कैंसर, लिवर और किडनी की बीमारियों आदि।
बच्चे, बुजुर्ग , कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले और लंबी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति वायु प्रदूषण के नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।बच्चे, बूढेऔर जवान ही नहीं माँ के गर्भ में पल रहे गर्भावस्था भ्रूण को भी नुकसान पहुंचता है। मां की गर्भनाल (Umbilical Cord) से रक्त संचरण के माध्यम से प्रदूषक कण गर्भस्थ शिशु के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और उसे बहुत से नुकसान जैसे गर्भ में ही मृत्यु, विकास का रुक जाना, कम वजन का बच्चा पैदा होना, पैदायशी बीमारियों का होना आदि।
जलवायु परिवर्तन भी श्वसन रोगों को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बनता जा रहा है। बढ़ते तापमान, जंगलों में लगने वाली आग, धूल भरी आँधियाँ, परागकणों की मात्रा में वृद्धि तथा मौसम के असामान्य बदलाव साँस संबंधी रोगों के जोखिम को बढ़ाते हैं। गर्मी की लहरें और वायु गुणवत्ता में गिरावट अस्थमा तथा अन्य फेफड़ों की बीमारियों के रोगियों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती हैं।
टीबी जैसी संक्रामक बीमारी पर भी पर्यावरणीय परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। भीड़भाड़, खराब वेंटिलेशन, वायु प्रदूषण और सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ टीबी के प्रसार को बढ़ावा दे सकती हैं। स्वच्छ वातावरण, पर्याप्त वायु संचार और प्रदूषण नियंत्रण जैसे उपाय टीबी सहित कई श्वसन रोगों की रोकथाम में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
प्रकृति-आधारित समाधान आज जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निपटने का प्रभावी माध्यम बनकर उभरे हैं। वर्ष 2018 से वायु मित्र अभियान के अंतर्गत बड़े पैमाने पर लोगों को वृक्षारोपण, शहरी हरित क्षेत्र विकसित करना, जल स्रोतों का संरक्षण, जैव विविधता को बढ़ावा देना तथा स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करना जैसे उपायों के बारे में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाते हैं। हरित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में तनाव कम होता है, वायु गुणवत्ता बेहतर होती है और श्वसन रोगों का खतरा भी घटता है।
प्लास्टिक प्रदूषण: बढ़ता पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट

प्लास्टिक प्रदूषण भी पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए एक बढ़ता हुआ खतरा है। प्लास्टिक के सूक्ष्म कण (माइक्रोप्लास्टिक्स) अब वायु, जल और खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर चुके हैं। वैज्ञानिक शोध यह संकेत देते हैं कि ये सूक्ष्म कण मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए एकल-उपयोग प्लास्टिक का उपयोग कम करना और टिकाऊ विकल्प अपनाना समय की आवश्यकता है।
लेखक द्वारा इंडियन जर्नल ऑफ इम्मुनोलॉजी एंड रेस्पिरेटरी मेडिसिन में प्रकाशित लेख “सेव द प्लैनेट” के अनुसार, प्लास्टिक प्राकृतिक रूप से संशोधित चीजों जैसे—प्राकृतिक रबर, नाइट्रोसेल्युलोज, कोलेजन, गैललाइट आदि से विकसित हुआ है। प्लास्टिक का बैग बहुत हल्का होने के बावजूद अपने से कई गुना अधिक वजन उठा सकता है, इसलिए यह बहुत उपयोगी होता है। लेकिन प्लास्टिक तब तक जहरीली गैसें और पदार्थ छोड़ता रहता है जब तक यह पूरी तरह विघटित नहीं हो जाता। इसके कारण भूमि की उर्वरता समाप्त हो सकती है और यदि फसल होती भी है, तो उसमें विषैले तत्व मौजूद रहते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं।
प्लास्टिक अपने निर्माण से लेकर विघटन तक मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर दुष्प्रभाव डालता है। इसके उपयोग और अपशिष्ट से उत्पन्न विषैले रसायन तथा माइक्रोप्लास्टिक सांस, भोजन, पानी और त्वचा के संपर्क के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। माइक्रोप्लास्टिक, जिनका आकार 5 मिमी से कम होता है, आज हवा, मिट्टी, जल स्रोतों तथा खाद्य पदार्थों में व्यापक रूप से पाए जा रहे हैं। एक अध्ययन में समुद्री नमक, रॉक सॉल्ट, टेबल सॉल्ट, स्थानीय कच्चे नमक तथा विभिन्न प्रकार की चीनी के सभी नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति दर्ज की गई। शोध के अनुसार एक किलोग्राम नमक में लगभग 90 तथा एक किलोग्राम चीनी में 11.85 से 68.25 तक माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए। वर्तमान में विश्व का प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष नहीं बल्कि लगभग प्रति सप्ताह 5 ग्राम प्लास्टिक का अनजाने में सेवन कर रहा है। इससे हार्मोनल असंतुलन, कैंसर, फेफड़ों की समस्याएँ तथा बच्चों में जन्म संबंधी विकृतियों और विकास संबंधी विकारों का खतरा बढ़ रहा है, जिसके कारण प्लास्टिक प्रदूषण वैश्विक जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन गया है।
सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध
राज्य सरकार ने 1 जुलाई 2022 से राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से सिंगल यूज़ प्लास्टिक के निर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लागू किया है। इस निर्णय का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे में कमी लाकर पर्यावरण, वन्यजीवों और मानव स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान को रोकना है। प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जागरूकता अभियान, निरीक्षण और उल्लंघन करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है।
प्रधानमंत्री ने शुरू किया Life आंदोलन
पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 में “पर्यावरण के लिए जीवन” अर्थात Life for Environment (LIFE) आंदोलन की शुरुआत की थी। LIFE का दृष्टिकोण है—ऐसी जीवनशैली अपनाना जो हमारे ग्रह पृथ्वी के अनुकूल हो और उसे कोई नुकसान न पहुंचाए। ऐसे जीवन जीने वालों को “ग्रह समर्थक लोग” कहा जाता है। हमारा ग्रह एक है, लेकिन हमारे प्रयास अनेक होने चाहिएं।
पर्यावरण संरक्षण में नागरिकों की भूमिका
स्वच्छ पर्यावरण का निर्माण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऊर्जा की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, प्लास्टिक का कम प्रयोग, जल संरक्षण, वृक्षारोपण तथा पर्यावरण के प्रति जागरूक जीवनशैली अपनाकर हम जलवायु संरक्षण में योगदान दे सकते हैं। छोटे-छोटे प्रयास सामूहिक रूप से बड़े परिवर्तन ला सकते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रकृति को केवल संसाधन न समझें, बल्कि उसे अपने अस्तित्व का आधार मानें। प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर ही हम जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना कर सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।
पांचजन्य