पाकिस्तान के आर्मी चीफ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांतिदूत वाली छवि PoK में हो रहे आम लोगों के दमन से मेल नहीं खाती है। इससे पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिरता को लेकर चिंताएं पैदा हो रही हैं।
30 जून, 2026 – इस्लामाबाद: पाकिस्तान के आर्मी चीफ, फील्ड मार्शल आसिम मुनीर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को शांतिदूत के तौर पर पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर देश के अंदर आम लोगों के खिलाफ दमनकारी कार्रवाईयों का सहारा कर रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण PoK में देखने को मिला है, जिसे पाकिस्तान ‘आजाद कश्मीर’ कहता है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में हिंसा आम बात रही है और अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में भी कई जगहों पर बाहरी (पाकिस्तान सेना) शासन से आजादी की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।
संघर्ष वाले इन तीनों इलाकों में पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान सीधे तौर पर भारत पर आरोप लगाता है कि भारत, इजरायल के साथ मिलकर उसे अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है। असलियत यह है कि भारत के खिलाफ छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वॉर) छेड़ने के लिए पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में जो आजादी-समर्थक भावना भड़काई थी, वही उस पर भारी पड़ रही है। पाकिस्तान को एहसास हो रहा है कि यह भावना PoK में जोर पकड़ रही है।
PoK में भारी अत्याचार
PoK में अब तक कम से कम बीस प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया है। हजारों प्रदर्शनकारी PoK के रावलकोट में अब प्रतिबंधित हो चुकी ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) के बैनर तले धरना दे रहे हैं। वहीं गिरफ्तारी के डर से JAAC के नेता भूमिगत हो गए हैं।
पुलिस की सख्ती के कारण मुजफ्फरबाद तक मार्च करने का आह्वान फिलहाल रोक दिया गया है। PoK में पूरी तरह से हड़ताल चल रही है। पाकिस्तानी सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। प्रदर्शनकारियों पर विरोध खत्म करने का दबाव बनाने के लिए सरकार ने भोजन, दवा और ईंधन की आपूर्ति रोक दी है।
पाकिस्तान का 1947 वाला तरीका
दिलचस्प बात यह है कि सितंबर 1947 में भी पाकिस्तानी सरकार ने यही तरीका अपनाया था ताकि महाराजा हरि सिंह को ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ (यथास्थिति समझौता) पर हस्ताक्षर करने के बाद पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा सके। अब ये हो रहा है कि मीडिया में प्रदर्शनकारियों को बदनाम करते हुए उन्हें देशद्रोही और भारतीय एजेंट कहा जा रहा है। इस अभियान की अगुवाई पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ कर रहे हैं।
कश्मीर को लेकर भारत के साथ हुई विभिन्न लड़ाइयों में पाकिस्तान को हुए नुकसान का जिक्र करते हुए उन्होंने PoK के लोगों को अहसान फरामोश करार दिया। उन्होंने यह दावा करके चीजें खराब कर दीं कि रावलकोट में विरोध करने वाले लोग मूल कश्मीरी नहीं हैं। उनका यह दावा भी पूरी तरह ठीक नहीं है कि प्रवासियों के लिए आरक्षित बारह विवादित सीटों पर चुने जाने वाले लोग ही असली कश्मीरी हैं। असल में कश्मीर घाटी और जम्मू इलाके के कुछ मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे और उन्होंने कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का समर्थन किया था।
ख्वाजा आसिफ का दावा गलत
ख्वाजा आसिफ जम्मू-कश्मीर के भारतीय हिस्से से आए प्रवासियों के लिए आरक्षित उन 12 विवादित सीटों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे। ये सीटें इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के लिए सरकार बनाने की प्रक्रिया में हेरफेर करने और संघीय स्तर पर सत्ताधारी पार्टी का पक्ष लेने में काम आती हैं। 53 सदस्यों वाली विधानसभा में ये सीटें किसी भी सरकार का भविष्य तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। इसीलिए 27 जुलाई को होने वाले चुनावों से पहले इन सीटों को खत्म करना प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में से एक है। इन सीटों के लिए वोटिंग पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में होती है।
ख्वाजा आसिफ क्या बता सकते हैं कि अगर ये लोग कश्मीरी नहीं हैं तो पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन्हें क्यों पेश किया है। क्या वह दुनिया को यह भी बताएंगे कि PoK में सरकारों की अगुवाई हमेशा गैर-कश्मीरी लोगों ने की है, जिसकी शुरुआत सरदार इब्राहिम खान से हुई थी।
यह देखना दिलचस्प था कि मूल रूप से PoK के रहने वाले प्रदर्शनकारी लंदन में पाकिस्तानी हाई कमीशन के सामने पाकिस्तान और सेना विरोधी नारे लगाते हुए प्रदर्शन कर रहे थे। विदेशों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों से परेशान होकर पाकिस्तान की सेना PoK में रहने वाले उन लोगों के परिवारों को निशाना बना रही है ताकि वे लोग विरोध से दूर रहें।
पाकिस्तान बेनकाब हुआ
इन विरोध प्रदर्शनों ने पाकिस्तानी सरकार के उस ढोंग को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है, जिसमें वह दावा करती है कि इस इलाके के प्रशासन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है जबकि वह लगातार इसे ‘आजादी की लड़ाई’ का बेस कैंप बताती रही है। पाकिस्तान ने भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत में कई बार यह तर्क दिया है। खासकर तब जब उसकी ज़मीन से चलने वाले आतंकी समूहों का मुद्दा उठाया गया। 1988 में जम्मू-कश्मीर में शुरू हुई अशांति और PoK के विरोध प्रदर्शनों के बीच एक अजीब समानता है। जम्मू कश्मीर में राज्य सरकार के बिजली की कीमतें बढ़ाए जाने के बाद लोगों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया था।
इसी तरह PoK में भी आटे और बिजली की कीमतें बढ़ने से विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। दोनों ही मामलों में बड़े पैमाने पर असंतोष की असली वजह संबंधित केंद्रीय नेतृत्व की राजनीतिक चालें थीं, जिन्होंने अलोकतांत्रिक तरीकों और चुनावी धांधली का इस्तेमाल करके अपनी पसंद की सरकारें बनाईं।
हालांकि इसकी जड़ में आर्थिक तंगी है। शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और युवाओं के लिए रोजगार की कमी ने सिस्टम से भरोसा उठ गया है। यह भावना तब और बढ़ गई जब PoK के लोगों ने जम्मू कश्मीर का दौरा किया और यहां की यूनिवर्सिटी, इंजीनियरिंग कॉलेज और अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं को देखा।
पाकिस्तान के गले की फांस बनेगा PoK?
अहम सवाल यह है कि क्या PoK भी बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की तरह पाकिस्तान के लिए एक नासूर बन जाएगा। दमनकारी उपायों से कुछ समय के लिए राहत तो मिल सकती है लेकिन घाव गहरा हो जाएगा और पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिरता पर असर डालेगा।
असीम मुनीर को समझना चाहिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ से देश के भीतर सेना की गिरती छवि को सुधारने में कोई मदद नहीं मिल सकती। भारत के लिए सबक यह है कि पाकिस्तान को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए। भारत का कोई भी खुला या गुप्त दखल उल्टा पड़ सकता है और वैसी ही स्थिति पैदा कर सकता है जैसी आज पाकिस्तान की है।
नवभारत टाइम्स