राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) हिमालय की ग्लेशियर झीलों में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लगा रहा है, लेकिन दुर्गम क्षेत्र और सटीकता एक चुनौती है

डॉ. मनीष मेहता
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) राज्यों के साथ मिल कर हिमालय की ग्लेशियर झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगा रहा है। इसमें से उत्तराखंड रीजन में हम लोगों ने भी कुछ प्रोजेक्ट जमा किए हैं। जहां तक मेरी जानकारी है एशियाई देशों में कहीं भी ग्लेशियर टूटने को लेकर बहुत प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं है।
उसकी सटीकता भी ज्यादा नहीं है। यह मुश्किल काम भी है। आप सुनामी का अनुमान लगा सकते हैं कि भूकंप आया है तो सुनामी आएगी। दूसरी बात हिमालय बहुत दुरूह क्षेत्र हैं। यहां सभी जगह पहुंचना संभव नहीं है। हिमालय के अंदर 10,000 ग्लेशियर हैं। हिमालय अपने आप में खुद एक बहुत जटिल सिस्टम है, जिसे समझना बहुत मुश्किल है।
अब सवाल यह है कि हम अर्ली वार्निंग सिस्टम कहां लगाएं। बहुत अच्छा उदाहरण उत्तराखंड में दिखता है कि केदारनाथ में बाढ़ आई। आपने केदारनाथ घाटी और आसपास के क्षेत्र में फोकस किया तो अचानक ऋषिगंगा में बाढ़ आ गई वो भी जाड़े के मौसम में। यह अप्रत्याशित था। इसके बाद धराली में घटना हो गई। इसके बाद तमक में। अर्ली वार्निंग सिस्टम तब कारगर होता है जब आपको पता हो कि यहीं पर आएगा तो यहीं पर फिट कर दो।
यह भी सवाल है कि घाटी में लगाना कहां है क्योंकि एक घाटों में हजारों छोटे छोटे चैनल हैं जो सक्रिय हैं। आपको पता ही नहीं कि कहां टूटना है तो आप कैसे करोगे। सवाल यह नहीं है कि हमारा निगरानी तंत्र कितना कारगर है। सवाल यह है कि हम लोगों को जागरूक कैसे करें। लोगों को यह बताना होगा कि पर्वतीय क्षेत्र में आप कहां घर बनाएं। कहां इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करें।
नेपाल की बाढ़ यह सीख देती है कि आपको बस्तियां कहां बसानी है। आप नदी के किनारे ही कई मंजिल के घर बना रहे हैं। आपको हमेशा नदी के डूब क्षेत्र के बाहर घर बनाना चाहिए। यहां तक केदारनाथ त्रासदी ने भी सबक दिया था कि आपको इन्फ्रास्ट्रक्चर कहां बनाना है। आपको यह याद रखना होगा कि आज नहीं तो कल बाढ़ का क्षेत्र अपनी पूरी जगह लेगा।
अगर आप पहले के लोगों को देखें तो वे लोग हमेशा पहाड़ पर बहुत ऊंची जगह पर घर बनाते थे। नीचे नहीं बनाते थे। वे नदी के किनारे नहीं बैठे थे। अब नई सभ्यता में होम स्टे और तमाम चीजों के साथ बनी हैं और ये कहीं भी निर्माण कर रहे हैं। किसी भी राज्य की कोई आपदा नीति नहीं है कि इसमें तय किया गया हो कि आपको कहां घर बनाना है और कहां नहीं। तो लोग इसकी कीमत चुका रहे हैं और अगर सबक नहीं सीखा गया तो लोग आगे भी कीमत चुकाते रहेंगे।
(लेखक वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से जुड़े हैं)
पंजाब केसरी