जारी किया मुस्लिम लीगी फरमान
11 सितंबर, 2026 – नई दिल्ली : जिस कश्मीर में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर दशकों तक राजनीतिक और वैचारिक विवाद रहा, उसी कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पूरे गीत के दौरान सम्मान में खड़े दिखाई दिए। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में आयोजित पहले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में सोमवार 7 सितंबर को ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण बजाया गया। शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में आयोजित इस समारोह में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला समेत वहां मौजूद सभी नेता पूरे गीत के दौरान सम्मान में खड़े रहे। पूरा गायन करीब तीन मिनट से अधिक चला। लेकिन वंदे मातरम् के पूरे संस्करण को इस तरह सम्मान मिलना कांग्रेस को रास नहीं आया।
‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण गाने से कांग्रेस को लगी मिर्ची
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण को सम्मान देने से कांग्रेस को मिर्ची लग गई। कांग्रेस ने पूरे वंदे मातरम को लेकर आपत्ति जताई और अपने सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस से पार्टी के रुख के साथ खड़े होने की अपील कर दी। खास बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब कांग्रेस ने अपने पार्टी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सिर्फ पहले दो अंतरे गाने का फैसला किया है। यानी एक तरफ कांग्रेस का सहयोगी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस और उसके नेता उमर अब्दुल्ला पूरे गीत के दौरान खड़े नजर आए, दूसरी तरफ कांग्रेस ने सहयोगी दल को पुराने कांग्रेस फैसले का पालन करने की नसीहत दे दी।
अब्दुल्ला पिता-पुत्र को कांग्रेस का मुस्लिम लीगी फरमान
कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने एक्स पर इसका एक वीडियो जारी कर कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण कांग्रेस की उस समझ के अनुरूप नहीं है, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने स्वीकार किया था। कांग्रेस का तर्क है कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए गीत के पहले दो अंतरों को स्वीकार किया था और ऐसा कथित तौर पर इसलिए किया गया था ताकि गीत के धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों को लेकर विभिन्न समुदायों में असहजता पैदा न हो।
वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस के लिए गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और अन्य नेताओं का निर्णय महत्वपूर्ण है। कांग्रेस का कहना है कि पूर्ण संस्करण “समन्वित और बहुलतावादी” भारतीय ethos के साथ असहजता पैदा करता है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस को पसंद नहीं आया कांग्रेस का फरमान
कांग्रेस ने केवल अपना फैसला दोहराने तक बात सीमित नहीं रखी, बल्कि अपने सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस को भी उसी लाइन पर चलने की नसीहत दी। यही बात नेशनल कॉन्फ्रेंस को पसंद नहीं आई। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने तीखी प्रतिक्रिया दी और जोर देकर कहा कि कांग्रेस अपने सहयोगियों को शर्तें नहीं थोप सकती। नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता बशीर अहमद ने कहा, “गठबंधन सहयोगी के तौर पर आप यह तय नहीं कर सकते कि कितना गाए या किस तरह गाए। वेणुगोपाल को ट्वीट करने का अधिकार है, लेकिन वे अपनी बात थोप नहीं सकते। यह लोगों की पसंद है। हम लोगों पर कुछ भी थोपने के खिलाफ हैं।” मामला इतना बढ़ा कि कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच सार्वजनिक बयानबाजी शुरू हो गई।
1930 के दशक में जी रही कांग्रेस, नहीं बदली मुस्लिम लीग मानसिकता
अब सवाल उठता है कि क्या धार्मिक संवेदनशीलता के नाम पर राष्ट्रीय गीत के एक हिस्से को स्थायी रूप से सीमित रखना चाहिए ? क्या समय के साथ समाज और राजनीतिक परिस्थितियों में आए बदलाव के अनुसार पूरे संस्करण को स्वीकार नहीं किया जा सकता? क्या कांग्रेस हिन्दू देवी-देवताओं के सम्मान में खड़ी नहीं हो सकती ? क्या आज भी भारत में 1930 के दशक की परिस्थितियां हैं? तब भारत स्वतंत्र नहीं था, कांग्रेस और मुस्लिम लीग अलग-अलग राजनीतिक दावों के बीच संघर्ष कर रहे थे और देश में सांप्रदायिक तनाव बहुत अधिक था। आज भारत एक संप्रभु गणराज्य है और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। ऐसे में स्पष्ट है कि समय बदला, लेकिन सबसे पुरानी पार्टी की मुस्लिम लीगी मानसिकता नहीं बदली। इसका प्रमाण असम, बंगाल और केरल ने दिया है।
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