1975-77 का आपातकाल स्वतंत्र भारत के सामने आई सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक था। इसने दिखाया कि संवैधानिक सुरक्षा उपायों के कमजोर होने और जनता की स्वतंत्रता पर अंकुश लगने पर लोकतांत्रिक संस्थाएं किस प्रकार दबाव में आ सकती हैं।
लेखक: गजेंद्र सिंह शेखावत

25 जून, 2026 – आपातकाल लागू होने के 50 साल बाद भी देश उस दौर पर विचार कर रहा है, जिसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक के रूप में याद किया जाता है। संविधान हत्या दिवस ( लोकतंत्र अमर रहे) के राष्ट्रीय स्मरणोत्सव के समापन समारोह के आयोजन का उद्देश्य केवल इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि उन चिरस्थायी मूल्यों पर चिंतन करना है जो हमारे गणतंत्र को कायम रखते हैं। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक माध्यम है और इसकी भावना हमेशा युग की भावना होती है।
प्रस्तावना संवैधानिक मार्गदर्शक
भारत की लोकतांत्रिक भावना हमारी सभ्यतागत परंपराओं में गहराई से निहित है। सदियों से, हमारे समाज ने परामर्श, सामूहिक विचार-विमर्श और जनभागीदारी की संस्थाओं का पोषण किया है। प्राचीन सभाओं और समितियों से लेकर स्वतंत्रता के बाद की संसदीय प्रणाली तक, हमने सदैव जनता की सामूहिक इच्छा में विश्वास किया है।
प्रस्तावना आज भी हमारा संवैधानिक मार्गदर्शक है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व – ये महज संवैधानिक आदर्श नहीं, राष्ट्रीय आकांक्षाएं हैं। ये सार्वजनिक नीतियों का मार्गदर्शन करते हैं, संस्थाओं को आकार देते हैं और राज्य तथा नागरिक के बीच संबंधों को परिभाषित करते हैं।
1975-77 का आपातकाल स्वतंत्र भारत के सामने आई सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक था। इसने दिखाया कि संवैधानिक सुरक्षा उपायों के कमजोर होने और जनता की स्वतंत्रता पर अंकुश लगने पर लोकतांत्रिक संस्थाएं किस प्रकार दबाव में आ सकती हैं। उस दौर का प्रभाव राजनीतिक जीवन से कहीं अधिक व्यापक था।
ये अनुभव याद दिलाते हैं कि संवैधानिक अधिकार अमूर्त कानूनी सिद्धांत नहीं हैं। वे ऐसे सुरक्षा उपाय हैं, जो नागरिकों की गरिमा, स्वतंत्रता और दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। जब इन अधिकारों का हनन होता है, तो इसका असर केवल संस्थाओं पर नहीं, आम लोगों पर भी पड़ता है। फिर भी उस दौर की सबसे महत्वपूर्ण सीख लोकतांत्रिक लचीलापन है।
इस अवसर को चिह्नित करते हुए एक सुनियोजित प्रदर्शनी, समारोह का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह प्रदर्शनी भारतीय लोकतंत्र के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में से एक की दृश्य यात्रा प्रस्तुत करती है, जिसमें अभिलेखीय सामग्री, प्रतिरोध की कहानियां, संवैधानिक उपलब्धियां और आपातकाल के दौरान लोगों के अनुभव शामिल हैं। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राम बहादुर राय का स्मृति व्याख्यान संवैधानिक सतर्कता और लोकतांत्रिक नवीनीकरण के व्यापक विषय को समकालीन प्रासंगिकता प्रदान करता है।
स्वतंत्रता की जीवंत गाथाएं
2021 में ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ (AKAM) के उपलक्ष्य में शुरू की गई डिजिटल डिस्ट्रिक्ट रिपॉजिटरी (DDR) अग्रणी पहल है। DDR पहल पर प्रदर्शनी का उद्देश्य देश के कोने-कोने से बलिदान, साहस और जनभागीदारी की सैकड़ों अनसुनी कहानियों को सामने लाना है। संस्कृति मंत्रालय ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की इन अनसुनी कहानियों से संबंधित 10 लघु फिल्में भी बनाई हैं।
अब तक DDR की समर्पित वेबसाइट पर 19,500 से अधिक वृत्तांत उपलब्ध कराए गए हैं। संस्कृति मंत्रालय के अधीन सांस्कृतिक संसाधन और प्रशिक्षण केंद्र (CCRT) ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कम ज्ञात पहलुओं को उजागर करने वाली कई कहानियों के संकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस अवसर पर हमें दो ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है जो साहस, त्याग और सेवा के साक्षात प्रतीक हैं। महाराष्ट्र के शेषराव लक्ष्मणराव खोट, जिन्होंने छात्र के रूप में हैदराबाद मुक्ति आंदोलन में भाग लिया था और आंध्र प्रदेश के एड्डुला सूर्यनारायण रेड्डी, जिन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करने पर 11 वर्ष की आयु में पुलिस ने हिरासत में लिया था।
विरासत का 11वां संस्करण उन सांस्कृतिक परंपराओं, कलात्मक अभिव्यक्तियों और साझा धरोहर का उत्सव मनाता है, जिन्होंने पीढ़ियों से संवाद, विविधता और सामाजिक एकता को बढ़ावा दिया है। हम स्वतंत्रता सेनानी, सांस्कृतिक दूरदर्शी और संस्था निर्माता कमलादेवी चट्टोपाध्याय की स्मृति को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। शास्त्रीय प्रस्तुतियां उन संगीत परंपराओं पर आधारित हैं, जो पीढ़ियों, क्षेत्रों और विचारधाराओं के बीच सदियों से चले आ रहे संवाद के माध्यम से विकसित हुई हैं।
‘एनाजोरी: लोकनाद-जनजातीय समरसता का स्वर-संगम’ असम और पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का उत्सव मनाती है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत की शक्ति अनेक पहचानों को समाहित करने की उसकी क्षमता में निहित है। इस समारोह से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण घटना महर्षि दयानंद सरस्वती कला गुरुकुल और कलाग्राम की आधारशिला रखने से संबंधित है। यह गुरुकुल प्रणाली की सदियों पुरानी परंपरा से प्रेरित है।
संविधान हत्या दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम बताते हैं कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था मात्र नहीं है, बल्कि जीवंत परंपरा है। 2047 में स्वतंत्रता शताब्दी की ओर बढ़ते हुए आइए हम इस भावना को नए सिरे से प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ाएं।
नवभारत टाइम्स