एक तरफ चैरिटी की बातें की जाती हैं और यह कहा जाता है कि हम सब बराबर हैं, मगर अफसोस है कि मुनाफे के लिए हर तरह की तरकीबें अपनाई जा रही हैं और लोगों की सेहत से भी खिलवाड़ किया जा रहा है।
क्षमा शर्मा
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इन दिनों दुनिया भर में बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम पर चिंता जताई जा रही है। आस्ट्रेलिया ने सबसे पहले 16 साल तक के बच्चों पर स्कूल में मोबाइल ले जाने और टिकटाक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब आदि के इस्तेमाल पर रोक लगाई। ब्राजील, इंडोनेशिया, मलेशिया, चीन आदि देशों ने भी थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ ऐसा किया है। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, कनाडा, पुर्तगाल, इटली, दक्षिण कोरिया आदि देश भी ऐसा कर रहे हैं या तैयारी में हैं।
इस मामले में भारत में हिमाचल सरकार ने स्कूलों में मोबाइल ले जाने पर पाबंदी लगा दी है। कर्नाटक की सरकार 16 साल तक के बच्चों के लिए डिजिटल मीडिया पर बैन और स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर लगाम कसेगी। आश्चर्यजनक रूप से अमेरिका में ऐसा नहीं किया गया है। इसका कारण शायद यह है कि तमाम बड़ी टेक कंपनियां अमेरिकी ही हैं। इन्होंने ही ऐसे एल्गोरिदम विकसित किए हैं, जो बच्चों को फोन और डिजिटल मीडिया की लत लगा देते हैं। इससे इन्हें भारी मुनाफा होता है। पूंजी के मालिकों को वही भगवान लगती है, दुनिया के बच्चों का क्या होता है, यह दुनिया जाने।
टेक कंपनियों के मालिक यह जानते हैं कि बच्चों पर मोबाइल स्क्रीन और उन पर देखे जाने वाले तमाम कार्यक्रमों का क्या असर पड़ता है। इसलिए वे अपने बच्चों को मोबाइल से दूर रखते हैं। है न कमाल। एक तरफ यह सिखाया गया है कि तकनीक ही असली भगवान है। अगर बच्चों ने जल्द से जल्द इसे नहीं सीखा तो सफलता और जीवन की रेस में पिछड़ जाओगे और दूसरी तरफ उन्हें इसी तकनीक का लती बनाया जा रहा है। पिछले दिनों एक बड़ी टेक कंपनी के मालिक ने अपनी दूसरी बेटी के जन्म पर खुशी प्रकट करते हुए एक पत्र में लिखा कि बच्ची बाहर खेलेगी। फूलों की खुशबू को महसूस करेगी। पत्तों को देखेगी।
ऐसी ही एक और बड़ी टेक कंपनी के कर्ता-धर्ता अपने बच्चे को मोबाइल के पास भी नहीं फटकने देते। एक और बड़ी टेक कंपनी के सर्वेसर्वा ने 11 साल की उम्र तक अपने बेटे को फोन से दूर रखा। इसी तरह कंप्यूटर की दुनिया में बहुत नाम कमाने वाली कंपनी के बड़े भारतीय अफसर ने अपने बच्चों को 14 साल की उम्र तक फोन का इस्तेमाल नहीं करने दिया। एक और टेक कंपनी के प्रमुख अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर समय के बहुत पाबंद हैं। एआइ से जुड़े एक दिग्गज अपने बच्चों के जीवन में एआइ की घुसपैठ जल्दी नहीं कराना चाहते। साफ है कि ये लोग चाहते हैं कि इनके बच्चे मिट्टी की सुगंध महसूस करें। प्रकृति को जीवन का हिस्सा बनाएं। हमेशा भगदड़ में रहने के मुकाबले अकेले रहना भी सीखें।
आज अमेरिका समेत पश्चिमी देशों में ऐसे बहुत से पार्क हैं, जहां बच्चों को विशेष रूप से मिट्टी में खेलने के लिए ले जाया जाता है। कहते हैं कि इससे बच्चों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसकी तगड़ी फीस भी देनी पड़ती है। यही नहीं वहां बच्चे ऐसे स्कूलों में भी पढ़ते हैं, जहां मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी है। एक समय अपने यहां भी मिट्टी में खेलने को जीवन का आवश्यक अंग माना जाता था, लेकिन बैक्टीरिया और रोगों का डर दिखाकर बच्चों से दूर कर दिया गया। सोचने की बात यह है कि अगर आप धनकुबेर हैं, तो आपके लिए अलग नियम हैं और दूसरों के लिए अलग। आपके बच्चे मोबाइल,कंप्यूटर, टीवी, डिजिटल मीडिया से दूर रहें और दूसरे बच्चों को यह सिखाया जाए कि यदि जीवन में ये चीजें नहीं, तो कुछ नहीं।
आप हर रेस में पिछड़ जाएंगे। यह सब पढ़ते हुए आमजन को मूर्ख बनाने के कितने ही तरीके याद आ रहे थे। बहुत पहले बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियां एक खास ब्रांड के साबुन का विज्ञापन करती थीं। इस साबुन का विज्ञापन करने वाली किसी भी हीरोइन ने शायद ही कभी इसका इस्तेमाल किया हो। चाकलेट का विज्ञापन बहुत से अभिनेता-अभिनेत्रियां करते हैं। कई साल पहले एक अभिनेत्री ने कहा था कि उसके बच्चे ने आज तक चाकलेट नहीं खाई। यदि वह कोई अच्छा काम करता है, तो उसे पुरस्कार के रूप में गुड़ दिया जाता है।
यह मार्केटिंग का ही असर है कि लोग बच्चों को तमाम जंक फूड खिलाने में शान समझते हैं। आजकल बच्चे भारतीय भोज्य पदार्थों के मुकाबले स्कूल में लंच के लिए भी ऐसे ही हाई कैलोरी खाने की चीजों को पसंद करते हैं। ऐसी विज्ञापनबाजी के कारण ही भारत के पारंपरिक मिठाई उद्योग पर खतरा मंडरा रहा है। कई खेती करने वाले लोग कह चुके हैं कि वे अपने खेतों में दो तरह की फसलें उगाते हैं। एक वे जिनमें जरा भी कीटनाशक नहीं डाला जाता। वे परिवार के खाने के लिए होती हैं। दूसरी तरह की खेती ऐसी है, जिसमें भरपूर मात्रा में कीटनाशक डाला जाता है, क्योंकि वे बेचने के लिए होती हैं।
यानी हम बचें, बाकी किसी और का क्या होता है, इससे हमें क्या मतलब। कहने को तो यह कहा जाता है कि सब बराबर हैं। जो हम खाते हैं, उससे बेहतर अतिथि को खाने को देते हैं या दूसरों के बच्चों को अपना बच्चा मानें, लेकिन जब दुनिया भर के लोगों में फैले अपने-पराए की भावना नजर आती है तो ये सारी बातें कोरी किताबी लगने लगती हैं। एक तरफ चैरिटी की बातें की जाती हैं और यह कहा जाता है कि हम सब बराबर हैं, मगर अफसोस है कि मुनाफे के लिए हर तरह की तरकीबें अपनाई जा रही हैं और लोगों की सेहत से भी खिलवाड़ किया जा रहा है।
(लेखिका साहित्यकार हैं)
दैनिक जागरण