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पहलगाम ; जन्नत की दहलीज पर आतंक का वो खूनी पहरा…

April 22, 2026 By Guest Author

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 जब धर्म पूछकर खामोश कर दी गईं धड़कनें

दोपहर के करीब ढाई बज रहे थे। बैसरन घाटी में खूब चहल-पहल थी। किसी ने नहीं सोचा होगा कि अगले ही पल उनके साथ क्या होना वाला है। बैसरन की खूबसूरत वादियां अचानक चीखों से गूंज उठी। आतंकी एक-एक कर बस गोली मारते गए। पहले नाम पूछा और फिर धर्म। हिंदू सुनते ही मार दिया। जन्नत की दहलीज पर वो आतंक का ऐसा खूनी पहरा था, जिसे देश शायद ही कभी भूल पाएगा।

पहलगाम नरसंहार, पाकिस्तान की बमबारी और भयानक बाढ़... जम्मू-कश्मीर के लिए  2025 की कड़वी यादें! - pahalgam terror attack pakistan shelling jammu  kashmir flood 2025 ntc - AajTak

शंभूनाथ शुक्ल

कश्मीर घाटी में सब कुछ नॉर्मल होने लगा था। वहां का टूरिज्म और पर्यटकों की चहल-पहल देख कर लगता था कि घाटी फिर से 1970-80 के दौर में लौट आई है। जहां फिल्मों की शूटिंग होती थी, देश भर से नव विवाहित जोड़े अपना हनीमून मनाने कश्मीर जाते थे। कश्मीर की हरी-भरी वादियां पूरे देश का मन लुभाती थीं। मगर आज से एक साल पहले अचानक ऐसी वारदात हुई, जिससे घाटी की रौनक चार दशक पहले के आतंक, तनाव और अलगाव की तरफ चली गई। शुरुआती जांच में ही पता चल गया कि यह वारदात हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद की देन है। अन्यथा कहीं भी आतंकवादी अपने शिकार का धर्म पूछ कर वारदात नहीं करते। भारत का दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद से ही देश के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित पाकिस्तान ने सदैव भारत को मजहब के आधार पर बांटने की कोशिश की। इसी की घृणित पुनरावृत्ति पहलगाम की यह आतंकी वारदात थी।

पहलगाम घटना ने पूरी पहल को धो डाला

वह पहलगाम जो सदैव पर्यटकों को लुभाते रहा है, जहां की खूबसूरती को जीने के लिए अमरनाथ जाने वाले धार्मिक पर्यटक भी अपेक्षाकृत लंबे रूट को चुनते हैं, जो यात्रा बाल्टाल वाले मार्ग से मात्र 14 किमी की पड़ती है वही पहलगाम से जाने वाले रूट से 32 किमी की। मगर जिस किसी ने भी पहलगाम वाला रूट नहीं देखा, वह पछताता है। उसे लगता है कश्मीर जा कर भी वह गुलमर्ग की मलमली घास वाला खूबसूरत नजारे देखने से वह वंचित रह गया। इसी पहलगाम के बाबत कहा गया है कि जिस किसी ने कश्मीर नहीं देखा, उसने जीवन में कभी खूबसूरती देखी ही नहीं, इसी को देख कर बादशाह जहांगीर ने कहा था कि अगर दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो इन्हीं हसीन वादियों में। मगर 22 अप्रैल 2025 को इस पहलगाम में एक ऐसी वारदात हुई, जिसके कारण पटरी पर आया कश्मीर फिर उसी आतंकवाद के दौर में चला गया, जिसे मुख्यधारा में लाने के लिए पूरे 40 वर्ष मेहनत की गई।

कश्मीर पर पाक की नापाक नजर

कश्मीर एक ऐसी वादी है, जो हिमालय के हजारों किमी के विस्तार में और कहीं नहीं दिखती है। लगता है, प्रकृति ने यह नायाब सुंदरता भारतीय उप महाद्वीप को ही सौंपी है। यदि अपना कश्मीर और पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए कश्मीर को परस्पर मिला दिया जाए तो उसके आगे स्विटजरलैंड बौना है। पूरे यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में कहीं भी प्रकृति इतनी कृपालु नहीं हुई जितनी कि कश्मीर की वादियों पर। सिंधु के इस पार का यह इलाका दुनिया का स्वर्ग है और इसलिए इसे हथियाने के लिए भारत पर 2500 साल से हमले होते रहे हैं। मगर सिंधु को पार करना कभी भी आसान नहीं रहा। अंग्रेजों ने जड़वादी जिन्ना की मांग पर जाते-जाते भारत को दो हिस्सों में धार्मिक आधार पर बांट गए थे। मगर इसके बाद भी भारत से टूट कर अलग हुआ पाकिस्तान भारत पर नजर गड़ाए रहा। आजादी के फौरन बाद उसके द्वारा पाले गए कबायली आतंकियों ने कश्मीर पर धावा बोला और आधा कश्मीर ले गए।

कश्मीर पर निशाना साधना आसान

मगर फिर भी भारत में जो कश्मीर पड़ा वह भी कोई अपनी खूबसूरती में कमतर नहीं था। अगर पाकिस्तान चुप न बैठता तो आज अकेले कश्मीर अपने पर्यटन से इतना राजस्व लाता कि इसे भारत का नगीना कहा जाता। लेकिन दुर्भाग्य कि पाकिस्तान न तो अपने कब्जे वाले कश्मीर को विकसित कर सका न उसने भारत वाले कश्मीर को विकसित होने दिया। उसने शुरू से ही भारत को शत्रु राष्ट्र समझा और अपने यहां के ट्रेंड आतंकवादियों को भारत भेजता रहा। इसी के चलते भारत और पाकिस्तान अनेक बार टकरा चुके हैं। मजे की बात कि आमने-सामने की लड़ाई में भारत सदैव इक्कीस पड़ा और इसी कारण खीझ कर वह चुपचाप भारत में आतंकवाद के बीज बोता रहा। कश्मीर सबसे सुलभ है क्योंकि एक तो मजहब के आधार पर वहां से यहां आतंकवादियों की घुसपैठ आसान है और दूसरे भारतीय सेना के लिए यह समझना मुश्किल है कि बंदा सीमा के इस पार का है या उस पार का।

लश्कर-ए-तैयबा ने जिम्मेदारी ली

पहलगाम में जो पर्यटक मारे गए, उनको उन लोगों ने मारा जो चेहरे-मोहरे से कोई बाहरी नहीं लग रहे थे। पहलगाम की बायसरन घाटी में जब पर्यटक बेखतके घूम रहे थे, वहां सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी भी नहीं थी, यकायक कुछ सैनिक वर्दी में कुछ लोग आए और पर्यटकों से पहले तो उनका नाम पूछा और फिर मजहब। पर्यटक ने जैसे ही हिंदू बताया उसे गोली मार दी। इस वारदात में कुल 26 लोग मारे गए। इनमें से एक नेपाली नागरिक था और 17 के करीब घायल हुए थे। पूरा देश इस आतंकी वारदात से सन्न रह गया था। कभी किसी ने सोचा नहीं था कि मुख्यधारा में वापसी के बाद शांत कश्मीर में ऐसी दुर्दांत घटना हो जाएगी। हर एक को पता था कि यह वारदात किसने की मगर पाकिस्तान ने इस वारदात पर कोई शोक नहीं जताया। इसके पीछे वही कुटिल नीति कि मारे जाने वाले हिंदू थे। मजे की बात कि खुल कर लश्कर-ए-तैयबा (LeT) नाम के जिस संगठन ने इसकी जिम्मेदारी ली।

कुछ स्थानीय लोगों ने मदद की

सेना की वर्दी में आए इन आतंकवादियों को पहचानना असंभव था। ये दोपहर करीब ढाई बजे आए, उस समय बैसरन घाटी में खूब चहल-पहल थी। किसी ने नहीं सोचा होगा कि अगले ही पल उनके साथ क्या घटने वाला है। ये लोग तो एक-एक कर बस गोली मारते गये, जो बचे उन्होंने ही बताया कि पहले नाम पूछा और फिर धर्म। हिंदू सुनते ही उन्हें मार दिया। सघन जांच चली और आतंकवादियों को पकड़ने के लिए सेना के हेलीकाप्टरों के जरिए पीर पंजाल की पहाड़ियों और जंगलों को छान डाला गया। उनके स्थानीय कनेक्शन को जांचा-परखा गया तो पता चला कि कई स्थानीय लोगों ने उनकी मदद की। एक व्यक्ति मोहम्मद यूसुफ कटारिया ने इन्हें हथियार मुहैया कराये थे। यह भी पता चला कि ये कुछ दिन पहले आ कर स्थानीय लोगों की झोपड़ियों में छुपे थे। जब कटारिया ने इन्हें हथियार मुहैया कराये तब इन्होंने लोकेशन परखी और 22 अप्रैल का दिन चुना था।

मास्टर माइंड पाकिस्तान में

इस वारदात ने भारत को भयानक शॉक में दिया। हर भारतवासी बेचैन हो गया। इतने निर्दोष नागरिकों की इस बेरहमी से हत्या। वहां ऐसे जोड़े भी थे, जिनकी हाल में शादी हुई थी। उनकी पत्नियां बेवा (विधवा) हो गईं। हर राजनीतिक दल ने इसके लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया। पाकिस्तान के साथ रिश्ते और भी कटु हो गए। साजिद जट नाम के जिस आतंकवादी को इसका मास्टर माइंड बताया गया, उसके पाकिस्तान में छुपे होने के पुख़्ता सबूत मिले हैं। तत्काल भारत सरकार ने पाकिस्तान से लगती सीमा पर मजबूत किलेबंदी कर दी। भारत में मौजूद पाकिस्तानी नागरिकों को तलाश कर उन्हें वापस उनके मुल्क भेजा जाने लगा। दोनों देशों ने अपने एयर स्पेस बंद कर दिए गए और किसी भी तरह की आवाजाही को रोक दिया। पहलगाम वारदात को अंजाम देने वाले आतंकवादियों को भी मार दिया गया लेकिन मास्टर माइंड तो पाकिस्तान में छिपा बैठा था।

जेडी वेंस के भारत दौरे के वक्त यह वारदात हुई

यह वारदात तब हुई जब अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस भारत दौरे पर थे। उधर पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर लगातार भारत विरोधी बयान दे रहे थे। यह वह समय भी था जब अमरनाथ की धार्मिक यात्रा शुरू होने वाली थी। यही मौका आतंकवादियों ने चुना और निर्दोष पर्यटकों को मार डाला। पाकिस्तानी सेना के इस वारदात से सीधा संबंध होने के सबूत भी मिले। आईएसआई द्वारा आतंकी संगठनों को भारत जा कर ऐसी घटना को अंजाम देने के निर्देशों का भी पता चला। दुनिया भर के तमाम देशों ने इस वारदात की निंदा की। उन्होंने भारत के साथ अपनी संवेदनाएं भी व्यक्त कीं। यूरोपीय यूनियन भी इस दुख की घड़ी में भारत के साथ था। वे संगठन भी जो धार्मिक स्वतंत्रता के लिए काम करते हैं। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने की ठान ली। सशस्त्र सेनाओं और सीमा सुरक्षा बल ने आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की योजना बनाई।

ऑपरेशन सिंदूर

पहलगाम वारदात के 15 दिन बाद भारत सरकार ने एक हवाई सैन्य कार्रवाई की जिसका मकसद पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों को नष्ट करना था। इसका नाम ऑपरेशन सिंदूर रखा गया। पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद और कोटली तथा पंजाब प्रांत के बहावलपुर को निशाना बनाया गया। इसका मकसद लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविरों को नष्ट करना। इस सैन्य कार्रवाई में भारत ने मिसाइलों के अलावा राफेल विमानों को लगाया। पाकिस्तान ने अपनी मिसाइलों से जम्मू कश्मीर को निशाना बनाया। छह मई 2025को शुरू हुआ यह ऑपरेशन चार दिन बाद 10 मई को रोक दिया गया। भारत का कहना था कि इसे भारतीय सेनाओं द्वारा अपना मकसद पूरा कर लेने के बाद रोक दिया गया। मगर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार कहते रहे कि यह कार्रवाई उनकी मध्यस्थता से समाप्त हुई। हालांकि भारत ने इसे सदैव नकारा।

TV9 हिन्दी

https://www।tv9hindi।com/india/pahalgam-attack-anniversary-incident-unravels-decades-of-peace-efforts-kashmir-tourism-3760606।html

पहलगाम हमले की बरसी: दर्द, साहस और उम्मीद

मलिक असरग हाशमी

जम्मू कश्मीर के पहलगाम की वादियों में अप्रैल की ठंडी हवा आज भी वही है, लेकिन एक साल पहले की 22 अप्रैल की दोपहर ने इस खूबसूरत जगह की रूह तक हिला दी थी। बैसरन घाटी, जिसे अक्सर “मिनी स्विट्जरलैंड” कहा जाता है, उस दिन सैलानियों की हंसी से नहीं बल्कि गोलियों की आवाज और चीखों से गूंज उठी थी। 26 लोगों की जान गई। कई परिवार बिखर गए। और कश्मीर की पहचान पर एक गहरा जख्म दर्ज हो गया।

एक साल बाद जब इस हमले की बरसी आई, तो पहलगाम में सन्नाटा और संवेदनाओं का अजीब संगम दिखा। बाजार खुले थे, दुकानें सजी थीं, लेकिन ग्राहकों का इंतजार करती आंखों में एक खालीपन था। सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। हर रास्ते पर चौकसी थी। मगर इन सबके बीच सबसे ज्यादा मौजूद थी यादें। वो यादें जो हर चेहरे पर साफ दिखती हैं।

https://www।hindi।awazthevoice।in/stories-news/anniversary-of-the-pahalgam-attack-pain-courage-and-hope-88097।html

पहलगाम आतंकी हमले की बरसी: दिल पत्थर, यादों की धरोहर और नहीं भूल पा रहे वो खौफनाक मंजर

पहलगाम आतंकी हमले की बरसी पर पीड़ित परिवारों ने अपने प्रियजनों को याद किया। हमले में मारे गए लोगों के परिवार आज भी उस खौफनाक मंजर को नहीं भूल पा रहे हैं।

22 अप्रैल, 2026 – नई दिल्ली : 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम की बैसरन घाटी में हंसते-खेलते लोगों की खुशियां देखते ही देखते रूदन में बदल गईं। मानवता के दुश्मन आतंकियों ने मासूम बच्चों और पत्नियों के सामने परिवार के पुरुष सदस्यों को धर्म पूछकर गोलियों से भून दिया था।

देश ने ऑपरेशन सिंदूर कर 22 निर्दोष लोगों के साथ हुई क्रूरता का बदला ले लिया, लेकिन उस खौफनाक दौर को यादकर आज भी प्रभावित परिवार सिहर उठते हैं।

परिजनों के घाव आज भी हरे

कानपुर के शुभम द्विवेदी के स्वजन उनकी यादों की धरोहर को सहेजे हुए हैं तो करनाल के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल के स्वजन चाहकर भी उस काले दिन को भूल नहीं पा रहे।

कानपुर के रघुवीर नगर हाथीपुर निवासी सीमेंट कारोबारी संजय द्विवेदी व स्वजन के दिल पर बने घाव आज भी हरे हैं। उनके पुत्र शुभम द्विवेदी की नवविवाहिता एशान्या के हाथों की मेंहदी भी सही ढंग से छूट नहीं पाई थी कि दोनों की हंसती-खेलती दुनिया उजड़ गई।

‘गम में दिल तो पत्थर हो ही गया, शरीर भी निर्जीव मालूम पड़ता है’

स्वजन कहते हैं कि शुभम के गम में दिल तो पत्थर हो ही गया, शरीर भी निर्जीव जान पड़ता है। ऐसा लगता है जैसे शुभम ने हमारी सारी खुशियों को देश के नाम कुर्बान कर दिया। अब बस यही लगता है कि दोबारा कोई ऐसी आतंकवादी घटना न हो। शुभम को बलिदानी का दर्जा नहीं दिए जाने से परिवार मायूस है।

वे कहते हैं कि अगर बलिदानी दर्जा न भी मिले तो उसके समकक्ष कुछ सरकार दे, जिससे उनकी यादों में जी सकें। करनाल के सेक्टर-7 निवासी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल का परिवार आज भी गम और गर्व के दोराहे पर खड़ा है। विनय के पिता राजेश नरवाल पानीपत में जीएसटी विभाग में अधीक्षक हैं।

भर आईं विनय के पिता की आंखें

दैनिक जागरण से बातचीत में उनकी आंखें भर आईं। वह कहते हैं, विनय ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है, लेकिन एक पिता के तौर पर मेरा मानना है कि उसे सच्ची श्रद्धांजलि तब मिलेगी, जब इस दुनिया से आतंकवाद मिट जाएगा।

राजेश कहते हैं कि यदि सरकार विनय की स्मृति में कोई अस्पताल या शिक्षण संस्थान शुरू करती है, तो वे सरकार से मिलने वाली पूरी राशि और परिवार की संपत्ति में विनय का हिस्सा दान कर देंगे। वे अपने बेटे के नाम को जनकल्याण के माध्यम से अमर देखना चाहते हैं।

विनय की बहन सृष्टि ने यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी है। विनय की विधवा हिमांशी अब गुरुग्राम में अपने माता-पिता के साथ रहती हैं। पिता ने एक मई को विनय के जन्मदिन पर इस बार भी रक्तदान शिविर का निर्णय लिया है।

यादों के भरोसे आगे बढ़ रहा सुशील का परिवार

पहलगाम में आतंकियों की क्रूरता का शिकार हुए इंदौर के वीणापुर में रहने वाले सुशील नथानियल का परिवार उनकी यादों के भरोसे आगे बढ़ रहा है। सुशील एलआईसी में अधिकारी थे। पत्नी सरकारी शिक्षक हैं, बेटी आकांक्षा बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत है।

पत्नी के सरकारी सेवा में होने के कारण परिवार बेटे ऑस्टिन की एलआईसी में अनुकंपा नियुक्ति चाहता था, लेकिन उसे अनुकंपा नियुक्त नहीं मिली। जम्मू कश्मीर व असम सरकार के माध्यम से आर्थिक मदद भी मिली थी।

दैनिक जागरण

https://www।jagran।com/news/national-pahalgam-terror-attack-anniversary-hearts-turned-to-stone-a-legacy-of-memories-unable-to-forget-that-horrifying-scene-40213583।html


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