कहा- ‘आदेश न मानने की आदत, नतीजों के लिए रहें तैयार’
सुप्रीम कोर्ट ने भाखड़ा-ब्यास बिजली बकाए पर पंजाब को सख्त चेतावनी दी, कहा कि आदेश न मानने की आदत है और नतीजों के लिए तैयार रहें।
03 अगस्त, 2026 – नई दिल्ली : हिमाचल प्रदेश के पक्ष में 1966 से चले आ रहे भाखड़ा नंगल और ब्यास बिजली बकाया मामले को सुलझाने वाले 15 साल पुराने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को शांतिपूर्ण ढंग से लागू करने के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी के प्रस्ताव का पंजाब सरकार ने कड़ा विरोध किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य को आदेश न मानने की आदत है और पुरानी आदतें आसानी से नहीं जातीं।
अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच को बताया कि उन्होंने ऐतिहासिक कैपिटल कॉस्ट लायबिलिटी का स्वतंत्र रूप से पता लगाने के लिए CAG से रिकॉर्ड की जांच करवाने के बाद पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और केंद्रीय बिजली मंत्रालय के साथ व्यापक बातचीत की है।
उन्होंने अदालत को जानकारी दी कि आपसी सहमति से काम करने लायक एक समझौता ढांचा तैयार किया गया है। इसमें कैशलेस समझौते की परिकल्पना की गई है, जिसके तहत संबंधित दावों और देनदारियों को ऊर्जा बकाया के बदले ऊर्जा और कैपिटल कॉस्ट लायबिलिटी की भरपाई के ज़रिए एडजस्ट करने का प्रस्ताव है, जिससे राज्यों के बीच किसी भी सीधे वित्तीय लेनदेन की जरूरत नहीं पड़ेगी।
हिमाचल-हरियाणा की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ने क्या कहा?
हिमाचल और हरियाणा की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और बलबीर सिंह ने कहा कि वे आदेश को लागू करने के लिए अटॉर्नी जनरल के समझौते के प्रस्ताव से सहमत हैं।
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में हिमाचल द्वारा दायर एक मूल मुकदमे पर पारित किया था, जिसमें 1966 में पंजाब के विभाजन के समय संपत्तियों के बंटवारे का समाधान मांगा गया था।
वहीं दूसरी तरफ, पंजाब की ओर से सीनियर एडवोकेट निधेश गुप्ता ने कहा कि राज्य को अटॉर्नी जनरल के प्रस्ताव के व्यावहारिक होने को लेकर मुख्य चिंताएं हैं और राज्य को इससे काफी नुकसान होगा।
15 साल पहले पारित आदेश क्या?
यह देखते हुए कि यह 60 साल पुराने अंतर-राज्यीय विवाद के समाधान के लिए 30 साल पहले दायर मूल मुकदमे पर 15 साल पहले पारित आदेश है, बेंच ने पंजाब पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आपके राज्य को आदेश न मानने की आदत है।
कोर्ट ने आगे कहा कि हिमाचल के पक्ष में एक आदेश है और जब इसे लागू करने का आदेश दिया जाएगा, तो यह 2011 से ब्याज के साथ होगा। अदालत उन्हें आदेश के लाभ से वंचित नहीं होने देगी, इसलिए यदि समझौता कर लिया जाता है तो बहुत अच्छा है, वरना नतीजों के लिए तैयार रहना होगा।
कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 अगस्त की तारीख तय की है। 30 जुलाई के अपने आदेश में बेंच ने स्पष्ट किया कि हालांकि हिमाचल और हरियाणा राज्यों ने सैद्धांतिक रूप से इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की है, लेकिन पंजाब राज्य ने इस पर आपत्ति जताई है। इसलिए न्याय के हित में, पंजाब को अपने रुख पर पुनर्विचार करने और उसे स्पष्ट करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया जाता है।
अटॉर्नी जनरल के प्रस्ताव के अनुसार, पंजाब और हरियाणा, हिमाचल प्रदेश को 15 ‘लीन सीज़न’ (अक्टूबर-मार्च) के दौरान हर साल 871 MU की दर से कुल 13,066 MU ऊर्जा बकाया देंगे। यह 58:42 (भाखड़ा नांगल प्रोजेक्ट) और 60:40 (ब्यास प्रोजेक्ट्स) के अनुपात में होगा।
BBMB द्वारा निर्धारित शुल्क का भुगतान करना होगा
जिस वर्ष में प्रत्येक किस्त प्राप्त होगी, उस वर्ष के लिए हिमाचल को BBMB द्वारा निर्धारित शुल्क का भुगतान करना होगा। इसके अलावा, भाखड़ा नांगल और ब्यास प्रोजेक्ट्स की पूंजीगत लागत के प्रति हिमाचल की देनदारी (जो संयुक्त पंजाब का 7.19% है और 1966-67 से पंजाब व हरियाणा द्वारा लोन सर्विसिंग का प्रतिपूर्ति न किया गया हिस्सा है) का आकलन 420.7 करोड़ रुपये किया गया है, जिसमें पंजाब का हिस्सा 249.2 करोड़ रुपये और हरियाणा का हिस्सा 171.5 करोड़ रुपये है।
पूंजीगत लागत की इस देनदारी को हिमाचल के ऊर्जा बकाया प्राप्तियों के एक हिस्से के खिलाफ समायोजित करने का विचार है, जिसमें 3.85 रुपये प्रति यूनिट की दर से समायोजित की जाने वाली यूनिट्स लगभग 1093 MU हैं।
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर, 2011 को जस्टिस आर वी रवींद्रन और ए के पटनायक की बेंच द्वारा हिमाचल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि राज्य भाखड़ा नांगल प्रोजेक्ट से 1 नवंबर, 1966 से और ब्यास प्रोजेक्ट से यूनिट I और यूनिट II में उत्पादन शुरू होने की तारीखों से, संयुक्त पंजाब राज्य की बिजली का 7.19% हिस्सा पाने का हकदार है।
दैनिक जागरण