सत्तापक्ष और विपक्ष में नैरेटिव की जंग शुरू हो चुकी है। संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत न होने के बावजूद भाजपा द्वारा बीच चुनाव संसद की विशेष बैठक के जोखिम के मूल में उसका नैरेटिव की जंग में भारी पड़ने का अतीत माना जा रहा है, पर इस बार बढ़त का पहला संकेत जारी विधानसभा चुनावों के नतीजों से मिल सकता है।

राज कुमार सिंह
महिला आरक्षण संबंधी संशोधन विधेयक संसद में गिर जाने के बावजूद सत्तापक्ष और विपक्ष द्वारा अपनी-अपनी जीत तथा खुद को महिला हितैषी बताने के दावे बहुत ज्यादा नहीं चौंकाते। विधायिका में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण अब कब और कैसे लागू होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन देश की पूरी राजनीति आधी आबादी के इर्दगिर्द सिमटना तय है। विधेयक संसद में गिरने के कुछ ही मिनटों बाद भाजपा की महिला सांसदों के प्रदर्शन से मिले संकेतों की पुष्टि अगले दिन कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की प्रेस कांफ्रेंस और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन से हो गई।
मोदी की यह टिप्पणी कि ‘नारी अपमान बर्दाश्त नहीं करती’-विपक्ष को सबक सिखाने का राजनीतिक आह्वान ही है। कांग्रेस को ‘सुधार-विरोधी’ बताते हुए प्रधानमंत्री अतीत के उदाहरण गिनाना भी नहीं भूले। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन तक विपक्षी नेताओं का जवाबी आरोप है कि महिला आरक्षण विधेयक 2023 में ही सर्वसम्मति से पारित हो चुका, अब तो परिसीमन विधेयक के बहाने भाजपा देश का राजनीतिक मानचित्र बदलना चाहती है। जाहिर है, दोनों पक्षों ने कुछ स्वाभाविक सवालों से मुंह चुराते हुए अपनी राजनीति के अनुकूल तर्क चुन लिए हैं।
सरकार को लगा कि देश की आधी आबादी को नीति निर्धारण की प्रक्रिया में भागीदारी से अब और वंचित नहीं रखा जा सकता। इसीलिए संसद के बजट सत्र का सत्रावसान करने के बजाय उसकी तीन दिवसीय विशेष बैठक बुलाई गई और महिला आरक्षण संबंधी संशोधन विधेयक को पारित कराने का दांव चला गया। चुनावों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और निर्णायक होती भूमिका ने राजनीतिक सत्ता को यह अहसास कराया है कि उन्हें विधायिका में जल्द आरक्षण देकर अपनी सत्ता भी सुरक्षित की जा सकती है। हालांकि विधायिका में महिलाओं की अधिक भागीदारी के लिए खुद को चिंतित दिखा रही पुरुष प्रधान राजनीति उन्हें अपनी सीटों में हिस्सेदारी देने को तैयार नहीं। इसीलिए संसद की 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करते हुए 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का सुरक्षित रास्ता निकाला गया।
दशकों तक सत्ता का सफल खिलाड़ी रहे विपक्ष को यह समझने में देर नहीं लगी कि इस कवायद का राजग को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में लाभ मिल सकता है। महिला आरक्षण पर आम सहमति के बावजूद नवीनतम जनगणना पर आधारित परिसीमन की शर्त हटाने संबंधी संविधान संशोधन पर सत्तापक्ष और विपक्ष में तकरार के मूल में राजनीति तो है ही, सत्ता संतुलन की चिंता भी है। अभी तक परिसीमन का आधार जनगणना रही है। इसीलिए दक्षिण भारतीय राज्य लोकसभा सीटों की संख्या और परिणामस्वरूप राष्ट्रीय राजनीतिक संतुलन में पिछड़ने की आशंका जताते हैं। बेशक जनसंख्या नियंत्रण और बेहतर साक्षरता दर के सहारे आर्थिक विकास के मोर्चे पर भी दक्षिण भारत ने उत्तर भारत से बेहतर प्रदर्शन किया है।
देश के राजस्व में भी उनका योगदान भी अपेक्षाकृत अधिक रहा है। इसके लिए उन्हें राजनीतिक दंड नहीं दिया जाना चाहिए, पर उत्तर भारतीय राज्यों को भी राजनीतिक नेतृत्व और शासन तंत्र की इन मोर्चों पर नाकामी के लिए दंडित नहीं किया जा सकता। लोकसभा चुनाव क्षेत्र की आबादी दक्षिण भारत के मुकाबले उत्तर भारत में दोगुनी होना तर्कसंगत नहीं। भारत सरीखे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विवकेपूर्ण सोच से ही ऐसी जटिल चुनौतियों से निपटते हुए भविष्य के लिए संतुलित नीतियां बनाई जा सकती हैं, लेकिन हमारी राजनीति तो समस्याओं से मुंह चुराने की आदी रही है। आपातकाल के दौरान 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के जरिये 2001 तक लोकसभा सीटें 543 पर फ्रीज कर दीं, तो वाजपेयी सरकार ने उसे 2026 तक बढ़ा दिया।
अमित शाह ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होने संबंधी दक्षिणी राज्यों की आशंका दूर करते हुए आश्वासन दिया कि सभी राज्यों में सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ेगी, जिससे अनुपात का संतुलन प्रभावित नहीं होगा। फिर भी विपक्ष बिना परिसमीन ही महिला आरक्षण लागू करने तथा नवीनतम जनगणना आधारित परिसीमन के संवैधानिक प्रविधान पर जोर देता रहा, तो उसके भी कारण हैं। पहला, सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि वाले फार्मूले से भी भाजपाई वर्चस्व वाले उत्तर और पश्चिम भारत में सीटें ज्यादा बढ़ेंगी, जिससे लोकसभा में बहुमत पाना आसान हो जाएगा। दूसरा, इस फार्मूले का उल्लेख संविधान संशोधन विधेयक में नहीं था। यानी परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाता। शाह ने विधेयक में इस संशोधन के लिए एक घंटे का समय मांगा, पर विपक्ष नहीं माना।
नवीनतम जनगणना आधरित परिसीमन की संवैधानिक बाध्यता समाप्त कर उसे संसद के साधारण बहुमत यानी सरकार की मर्जी पर छोड़ देने के खतरों के प्रति विपक्ष की चिंताएं समझी जा सकती हैं, लेकिन परिसीमन संबंधी जटिलताओं का हल राजनीतिक नहीं, राष्ट्रीय सोच से ही संभव है। संविधान हर मतदाता को एक वोट का अधिकार देता है और हर वोट की ताकत बराबर है। इसलिए सिर्फ राजनीतिक संतुलन के लिए परिसीमन में जनसंख्या को नजरअंदाज करने का सोच अलोकतांत्रिक है।
तेलंगाना के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की कर राजस्व, जीडीपी और सामाजिक विकास मापदंडों के आधार पर राज्यों की सीटें तय करने की मांग राष्ट्रीय एकता के लिए विभाजनकारी है तो महिला आरक्षण में ओबीसी और मुस्लिम आरक्षण की मांग सामाजिक समरसता के लिए खतरनाक।
सत्तापक्ष और विपक्ष में नैरेटिव की जंग शुरू हो चुकी है। संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत न होने के बावजूद भाजपा द्वारा बीच चुनाव संसद की विशेष बैठक के जोखिम के मूल में उसका नैरेटिव की जंग में भारी पड़ने का अतीत माना जा रहा है, पर इस बार बढ़त का पहला संकेत जारी विधानसभा चुनावों के नतीजों से मिल सकता है। तमिलनाडु और बंगाल में अभी मतदान होना है, जहां महिला मतदाता अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावी हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
दैनिक जागरण