सफलता केवल 39 पदकों या चौथे स्थान तक सीमित उपलब्धि नहीं है। यह उस नए भारत की कहानी है, जिसने खेलों को राष्ट्रीय शक्ति, आत्मविश्वास और वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया है। गांवों और साधारण परिवारों से निकले खिलाडि़यों ने सिद्ध कर दिया कि सही नीति, आधुनिक प्रशिक्षण और अटूट संकल्प के बल पर भारत अब खेलों में विश्व नेतृत्व की ओर निर्णायक कदम बढ़ा चुका है
10 अगस्त, 2026 – नई दिल्ली : भारत की सफलता केवल 39 पदकों या चौथे स्थान तक सीमित उपलब्धि नहीं है। यह उस नए भारत की कहानी है, जिसने खेलों को राष्ट्रीय शक्ति, आत्मविश्वास और वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया है। गांवों और साधारण परिवारों से निकले खिलाडि़यों ने सिद्ध कर दिया कि सही नीति, आधुनिक प्रशिक्षण और अटूट संकल्प के बल पर भारत अब खेलों में विश्व नेतृत्व की ओर निर्णायक कदम बढ़ा चुका है।
जब ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल-2026 में मुक्केबाजी की 70 किलोग्राम भारवर्ग की स्वर्णिम भिड़ंत के लिए अरुंधति चौधरी रिंग में उतरीं, तब उनका शरीर 102 डिग्री बुखार से तप रहा था। लेकिन भारत की बेटियां परिस्थितियों से हार मानने के लिए नहीं, उन्हें पराजित करने के लिए जानी जाती हैं। तेज बुखार भी उनके अदम्य संकल्प के आगे टिक नहीं सका। उन्होंने इंग्लैंड की मुक्केबाज को अपने दमदार पंचों से परास्त कर स्वर्ण पदक भारत की झोली में डाल दिया।
जब विजेता मंच पर अरुंधति के गले में स्वर्ण पदक सजा और भारत का तिरंगा सबसे ऊंचा लहराते हुए राष्ट्रगान की स्वर-लहरियां गूंजने लगीं, तब उनकी आंखों से बहते आंसू केवल व्यक्तिगत सफलता के नहीं थे; वे उस राष्ट्रभक्ति, तप, त्याग और साधना के आंसू थे, जो हर भारतीय खिलाड़ी अपने भीतर संजोकर चलता है। उसी क्षण राजस्थान के कोटा में भी मानो पूरा शहर गौरव से भर उठा। ढोल-नगाड़ों की थाप पर परिवार, पड़ोसी और स्थानीय लोग इस विजय को अपनी जीत मानकर उत्सव मना रहे थे।
राष्ट्रीय शक्ति बनते खेल
यह केवल अरुंधति चौधरी की कहानी नहीं है। यह उन सभी भारतीय खिलाड़ियों की गाथा है, जो सीमित संसाधनों, कठिन संघर्षों और अनगिनत चुनौतियों के बीच अपने पुरुषार्थ से विश्व मंच पर भारत का मस्तक ऊंचा कर रहे हैं। इनमें अधिकांश खिलाड़ी साधारण परिवारों से हैं। किसी के पिता किसान हैं। किसी की मां खेतों में काम करती हैं। किसी ने आर्थिक कठिनाइयों के बीच अभ्यास जारी रखा, तो किसी ने सरकारी विद्यालय में पढ़ाई करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय किया। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां यह साबित करती हैं कि भारत की असली ताकत उसके महानगरों में नहीं, बल्कि गांवों, कस्बों और सामान्य परिवारों में बसने वाली उस प्रतिभा में है, जो अवसर मिलने पर विश्व को अपनी क्षमता का लोहा मनवा देती है। यही भारत की नई खेल क्रांति का सबसे बड़ा संदेश है।
एक समय था, जब भारत में खेलों का अर्थ लगभग क्रिकेट तक सीमित माना जाता था। ओलंपिक या राष्ट्रमंडल खेलों में यदि कोई भारतीय खिलाड़ी पदक जीत लेता, तो कुछ दिनों के लिए पूरे देश में उत्साह की लहर दौड़ जाती, लेकिन फिर खेल राष्ट्रीय विमर्श के हाशिए पर चले जाते थे। भारत प्रतिभा से समृद्ध था, किंतु व्यवस्था, संसाधनों और दूरदर्शी नीति के अभाव में वह प्रतिभा अक्सर विश्व मंच तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती थी। खेलों को राष्ट्रीय शक्ति के रूप में देखने का दृष्टिकोण भी विकसित नहीं हो पाया था।
पिछले एक दशक में यह परिदृश्य निर्णायक रूप से बदला है। आज का भारत केवल क्रिकेट का देश नहीं, बल्कि उभरती हुई वैश्विक खेल-शक्ति है। आज का युवा केवल क्रिकेटर बनने का सपना नहीं देखता, बल्कि मुक्केबाज, तीरंदाज, पहलवान, निशानेबाज, भारोत्तोलक, धावक, जूडो, पैरा खिलाड़ी और ओलंपिक विजेता बनने का संकल्प लेकर मैदान में उतर रहा है। उसके मन में व्यक्तिगत प्रसिद्धि से अधिक भारत का तिरंगा विश्व मंच पर सबसे ऊपर देखने की आकांक्षा दिखाई देती है। यह परिवर्तन भारतीय समाज में बढ़े राष्ट्रीय आत्मविश्वास का भी प्रतीक है।
भारत का मान बढ़ाते युवा
- युवाओं की असल पहचान सोशल मीडिया पर शोर मचाने या केवल विरोध करने से नहीं, अपितु अपनी प्रतिभा, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण में योगदान से होती है।
- कम उम्र में विश्व शतरंज चैंपियन बने डी. गुकेश और विश्व शतरंज के शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल आर. प्रज्ञानानंद ने भारत की बौद्धिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया से मनवाया।
- नीरज चोपड़ा ने एथलेटिक्स में ओलंपिक स्वर्ण जीतकर भारतीय खेलों को नई पहचान दी, जबकि मनु भाकर ने निशानेबाजी में अपने शानदार प्रदर्शन से नई पीढ़ी को प्रेरित किया। किशोर क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी ने कम उम्र में अपनी प्रतिभा का परिचय देकर भविष्य की उम्मीद जगाई।
- अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में पवन कुमार चांदना, भरत डाका और उनकी युवा टीम ने स्वदेशी तकनीक से विकसित रॉकेट का सफल प्रक्षेपण कर यह साबित किया कि भारत के युवा अब अंतरिक्ष क्षेत्र में भी नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।
- स्टार्टअप जगत में हजारों युवा उद्यमी रोजगार लेने वाले नहीं, अपितु रोजगार देने वाले बन रहे हैं। इनमें से अधिकांश की आयु 30 वर्ष से कम है। स्पष्ट है, नई पीढ़ी केवल सपने नहीं देखती, बल्कि उन्हें अपने ज्ञान, नवाचार, अनुशासन और कठिन परिश्रम से साकार करती है। ये भारत की वह युवा शक्ति है, जो राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हुए विज्ञान, खेल, तकनीक, नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से दुनिया में भारत का मान बढ़ा रही है। यही विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत और भविष्य की सबसे मजबूत आशा है।
दूरदर्शी खेल नीति
यह बदलाव किसी संयोग या क्षणिक उपलब्धि का परिणाम नहीं है। इसके पीछे अच्छी सोच, दूरदर्शी नीतियां और मजबूत संस्थागत ढांचा है। ‘खेलो इंडिया’ के माध्यम से गांव-गांव और विद्यालयों तक खेल संस्कृति को पहुंचाने का प्रयास हुआ। ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम’ के जरिए संभावनाशील खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण, विदेशी कोच, खेल विज्ञान, पोषण, उपकरण और आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया गया। खेल विश्वविद्यालयों, आधुनिक प्रशिक्षण केंद्रों, खेलो इंडिया केंद्रों और खेल अवसंरचना के विस्तार ने प्रतिभाओं को नया मंच दिया। परिणामस्वरूप, भारत में खेल अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सामर्थ्य, अनुशासन, आत्मगौरव और वैश्विक प्रतिष्ठा का माध्यम बनते जा रहे हैं। इन प्रयासों का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि भारत में खेल अब कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों की व्यक्तिगत उपलब्धि भर नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अभिन्न हिस्सा बनते जा रहे हैं। खेलों ने सामाजिक और आर्थिक सीमाओं को तोड़ते हुए प्रतिभा को नई पहचान दी है।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल-2026 इस बदलाव की सशक्त अभिव्यक्ति है। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान प्राप्त किया। मुक्केबाजी, जूडो, भारोत्तोलन, एथलेटिक्स और पैरा स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास, तकनीकी दक्षता और मानसिक दृढ़ता का प्रदर्शन किया, उसने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब कुछ पारंपरिक खेलों तक सीमित राष्ट्र नहीं रहा। वह अनेक खेल विधाओं में विश्व की अग्रणी शक्तियों को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच चुका है।
छोटी जगह की बड़ी गूंज
इस सफलता का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि इसके नायक महानगरों के वातानुकूलित प्रशिक्षण केंद्रों से नहीं, बल्कि भारत के गांवों, छोटे कस्बों और साधारण परिवारों से निकलकर आए हैं। यह भारत की उस जीवंत सामाजिक शक्ति का प्रमाण है, जहां प्रतिभा किसी वर्ग, भाषा या भूगोल की मोहताज नहीं होती। जब राष्ट्र अवसर देता है, व्यवस्था विश्वास जगाती है और समाज खिलाड़ियों के साथ खड़ा होता है, तब सामान्य परिवारों की संतानें विश्व मंच पर भारत का तिरंगा सबसे ऊंचा फहराती हैं।
ग्लासगो की यह सफलता उस नए भारत का उद्घोष है, जिसने खेलों को राष्ट्रशक्ति का महत्वपूर्ण आयाम बना दिया है। यह उस भारत की कहानी है, जो अपनी सांस्कृतिक ऊर्जा, युवा सामर्थ्य और राष्ट्रीय आत्मविश्वास के बल पर विश्व मंच पर नई पहचान गढ़ रहा है। यदि यही गति और प्रतिबद्धता बनी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत केवल राष्ट्रमंडल खेलों में ही नहीं, बल्कि ओलंपिक सहित प्रत्येक वैश्विक प्रतियोगिता में खेल महाशक्ति के रूप में स्थापित होगा। यह यात्रा पदकों की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और आत्मगौरव से परिपूर्ण भारत के उदय की यात्रा है।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल-2026 में भारत की चौथे स्थान की उपलब्धि इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस बार पदक तालिका का पूरा गणित बदल चुका था। अब तक राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के सबसे बड़े पदक स्रोत रहे कुश्ती और शूटिंग इस संस्करण का हिस्सा ही नहीं थे। पिछले कई संस्करणों में भारत के कुल पदकों का बड़ा हिस्सा इन्हीं दो खेलों से आता रहा है। इनके हटने के बाद भारत के प्रदर्शन को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन नए भारत ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया। भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि उसकी खेल शक्ति अब दो-चार पारंपरिक स्पर्धाओं पर निर्भर नहीं रही। मुक्केबाजी, जूडो, भारोत्तोलन, एथलेटिक्स और पैरा स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास और निरंतरता के साथ पदक जीते, उसने पदक तालिका का पूरा समीकरण बदल दिया।
रिंग में मुक्केबाजों का वर्चस्व
सबसे अधिक प्रभावशाली प्रदर्शन मुक्केबाजी में देखने को मिला। भारतीय मुक्केबाजों ने केवल पदक नहीं जीते, बल्कि रिंग में अपना नया वर्चस्व स्थापित किया। पुरुष और महिला, दोनों वर्गों में खिलाड़ियों ने तकनीकी दक्षता, आक्रामकता, धैर्य और मानसिक दृढ़ता का ऐसा प्रदर्शन किया कि कई मुकाबलों में पारंपरिक ताकत माने जाने वाले देशों के खिलाड़ी भी उनके सामने टिक नहीं सके। यह सफलता बताती है कि भारतीय मुक्केबाजी अब व्यक्तिगत प्रतिभा के भरोसे नहीं, बल्कि मजबूत प्रशिक्षण व्यवस्था, वैज्ञानिक तैयारी और प्रतिस्पर्धी खेल संस्कृति के आधार पर आगे बढ़ रही है।
भारतीय खेलों की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह बनकर उभरी है कि आज किसी खिलाड़ी की सफलता केवल उसके परिवार या राज्य की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के गौरव का विषय बनती है। यही कारण है कि गांवों, जनजातीय क्षेत्रों और छोटे कस्बों से निकलने वाली प्रतिभाएं अब स्वयं को विश्व मंच तक पहुंचने में सक्षम मानने लगी हैं। हरियाणा के अखाड़ों से लेकर पूर्वोत्तर के मुक्केबाजी केंद्रों तक, पंजाब और उत्तर प्रदेश के एथलेटिक्स ट्रैक से लेकर मध्य भारत के तीरंदाजी प्रशिक्षण केंद्रों तक, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और ओडिशा की खेल अकादमियों से लेकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के दुर्गम क्षेत्रों तक, देश का लगभग हर भूभाग भारत की खेल यात्रा में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह भारत की उस सांस्कृतिक एकात्मता का भी प्रमाण है, जहां विविधता प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति का आधार बनती है।
जिद जीतने की
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि भारतीय खिलाड़ी अब केवल प्रतियोगिताओं में भाग लेने के उद्देश्य से मैदान में नहीं उतरते, बल्कि विजय के स्पष्ट लक्ष्य के साथ उतरते हैं। उनके भीतर यह विश्वास विकसित हुआ है कि विश्व की कोई भी शक्ति भारतीय प्रतिभा,अनुशासन और परिश्रम के सामने अजेय नहीं है। यही मानसिक परिवर्तन भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है। पदक उसका परिणाम हैं, मूल शक्ति वह राष्ट्रीय आत्मविश्वास है, जिसने भारत को खेल जगत में एक नई पहचान दी है। आने वाले वर्षों में यही आत्मविश्वास भारत को वैश्विक खेल महाशक्ति बनने की दिशा में सबसे बड़ी ऊर्जा प्रदान करेगा।
वास्तव में ग्लासगो का संदेश केवल इतना नहीं है कि भारत चौथे स्थान पर रहा। इसका बड़ा संदेश यह है कि भारत की खेल व्यवस्था अब अधिक व्यापक, संतुलित और बहुआयामी हो चुकी है। यदि किसी एक या दो खेल को प्रतियोगिता से बाहर भी कर दिया जाए, तब भी भारत के पास अनेक ऐसी खेल विधाएं हैं, जो देश को पदक दिलाने की क्षमता रखती हैं। यही किसी भी उभरती खेल महाशक्ति की सबसे बड़ी पहचान होती है। इस बदलाव में शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक अवसरों पर खिलाड़ियों से सीधे संवाद किया है। बड़े आयोजनों से पहले खिलाड़ियों से मुलाकात, उनके परिवारों का उत्साहवर्धन, सफलता के बाद सम्मान और ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रमों में खिलाड़ियों की उपलब्धियों का उल्लेख, इन सबने खेलों को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया है। खेलों को सम्मान मिलने से युवाओं में भी नई ऊर्जा का संचार हुआ है।
खुले नए अवसरों के द्वार
भारतीय खेलों में सबसे बड़ा बदलाव एथलेटिक्स में दिखाई देता है। एक समय था, जब ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों की मौजूदगी केवल औपचारिक मानी जाती थी। आज स्थिति बदल रही है। भाला फेंक, लंबी कूद, पैदल चाल, दौड़ और अन्य स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ी विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। उन्हें आधुनिक प्रशिक्षण और बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं।
आज खेल केवल प्रतियोगिता नहीं रहे, बल्कि तेजी से विकसित होता आर्थिक क्षेत्र भी बन चुके हैं। खेल उद्योग, फिटनेस, खेल उपकरण, खेल विज्ञान, खेल प्रबंधन, खेल पर्यटन और प्रसारण अधिकारों के माध्यम से हजारों करोड़ का आर्थिक तंत्र विकसित हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय सफलता मिलने से निजी कंपनियां भी खिलाड़ियों के प्रायोजन के लिए आगे आ रही हैं। इससे खिलाड़ियों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और वे पूरी तरह अपने खेल पर ध्यान दे पाते हैं। साथ ही, स्टेडियम, प्रशिक्षण केंद्र, होटल, परिवहन और खेल उपकरण उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
भारत अब खेलों में अवसर तलाशने वाला देश नहीं, अपितु प्रतिस्पर्धा का नेतृत्व करने वाला देश बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ग्लासगो की सफलता ने अब भारत के सामने एक बड़ा लक्ष्य भी निर्धारित कर दिया है। राष्ट्रमंडल खेलों की उपलब्धियां तभी सार्थक मानी जाएंगी, जब उनका स्वाभाविक विस्तार लॉस एंजिलिस ओलंपिक-2028 में दिखाई देगा। अब प्रश्न केवल पदकों की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि भारत को स्थायी खेल महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का है। इसके लिए खिलाड़ियों की तैयारी को एक निरंतर राष्ट्रीय अभियान के रूप में देखना होगा, जिसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को बिना किसी व्यवधान के विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा, खेल विज्ञान और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण का लाभ मिलता रहे। साथ ही, अगले चरण की चुनौतियों को भी स्वीकार करना होगा।
खेल सुविधाओं का समान विस्तार देश के प्रत्येक जिले तक पहुंचे, प्रतिभा चयन पूरी तरह निष्पक्ष और योग्यता आधारित हो, खेल चिकित्सा, पुनर्वास और खेल विज्ञान को और अधिक सुदृढ़ बनाया जाए तथा विद्यालयों में खेलों को सह-पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र निर्माण के अनिवार्य आधार के रूप में स्थापित किया जाए। विश्व की खेल महाशक्तियां केवल प्रतिभा के भरोसे नहीं बनतीं; वे मजबूत संस्थागत व्यवस्था और दीर्घकालिक राष्ट्रीय संकल्प के बल पर तैयार होती हैं। यदि प्रतिभा खोज, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पारदर्शी चयन प्रक्रिया और खिलाड़ियों को निरंतर सहयोग इसी तरह मिलता रहा तो आने वाले वर्षों में भारत केवल कॉमनवेल्थ या एशियाई खेलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ओलंपिक में भी शीर्ष देशों की सूची में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है।
हरियाणा भारत की खेल राजधानी!
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल-2026 में भारत की सफलता के पीछे यदि किसी एक राज्य की सबसे प्रभावशाली भूमिका दिखाई देती है, तो वह हरियाणा है। देश की कुल आबादी का लगभग दो प्रतिशत हिस्सा रखने वाला यह राज्य एक बार फिर भारतीय खेलों का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा। मुक्केबाजी, जूडो, एथलेटिक्स और अन्य स्पर्धाओं में हरियाणा के खिलाड़ियों ने न केवल पदक जीते, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि भारत की खेल क्रांति का सबसे सशक्त केंद्र आज हरियाणा बन चुका है।
ग्लासगो में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वालों में हरियाणा के कई खिलाड़ियों ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 11 पदक जीते। इसमें 7 स्वर्ण, 2 रजत और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। मुक्केबाजी में जैस्मीन लांबोरिया (57 किग्रा), साक्षी चौधरी (51 किग्रा), प्रीति पंवार (54 किग्रा), प्रिया घंघास (60 किग्रा), सचिन सिवाच (60 किग्रा) और अंकुश पंघाल (80 किग्रा) ने स्वर्ण पदक जीते। वहीं,जूडो में हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीतकर नया इतिहास रचा, जबकि पैरा एथलेटिक्स में सोमन राणा ने भारत का गौरव बढ़ाया। इनके अलावा हरियाणा के कई अन्य खिलाड़ियों ने भारतीय दल का प्रतिनिधित्व किया और विभिन्न स्पर्धाओं में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया।
यह कोई संयोग नहीं है। हरियाणा की खेल संस्कृति दशकों से अनुशासन, परिश्रम और प्रतिस्पर्धा की भावना पर आधारित रही है। गांवों के अखाड़ों से लेकर आधुनिक खेल अकादमियों तक यहां खेल जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। किसान परिवारों के बच्चे खेतों में श्रम करते हुए शारीरिक मजबूती प्राप्त करते हैं और फिर वही ऊर्जा खेल मैदान में दिखाई देती है। परिवार भी खेल को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि यहां बेटियां भी मुक्केबाजी, कुश्ती, भारोत्तोलन और एथलेटिक्स जैसे कठिन खेलों में विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन कर रही हैं।
राज्य की खेल व प्रोत्साहन नीतियों ने इस खेल संस्कृति को नई गति दी है। इसमें केंद्र सरकार की योजनाओं का भी योगदान है। हरियाणा का अनुभव पूरे देश के लिए एक मॉडल है। जब समाज खेलों को सम्मान देता है, परिवार बेटियों और बेटों को समान अवसर देता है, सरकार आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराती है और खिलाड़ी कठोर तपस्या करते हैं, तब विश्व विजेता तैयार होते हैं। यह मॉडल बताता है कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासित, आत्मविश्वासी और राष्ट्रनिष्ठ पीढ़ी तैयार करने का सशक्त साधन हैं।
ग्लासगो की सफलता ने यह संदेश भी दिया है कि हरियाणा केवल ‘पहलवानों की धरती’ नहीं है। वह मुक्केबाजी, जूडो, एथलेटिक्स, पैरा खेलों और अनेक अन्य स्पर्धाओं में भी भारत की सबसे बड़ी प्रतिभा भूमि बन चुका है। जिस प्रकार हरियाणा के गांवों से निकलकर सामान्य परिवारों के युवा विश्व मंच पर भारत का तिरंगा सबसे ऊपर पहुंचा रहे हैं, वह विकसित भारत की नई खेल संस्कृति का प्रतीक है।
हरियाणा के इस मॉडल का विस्तार पूरे देश में करने की आवश्यकता है। ग्लासगो में हरियाणा के खिलाड़ियों ने केवल पदक नहीं जीते, उन्होंने यह सिद्ध किया है कि राष्ट्र के प्रति समर्पण, कठोर परिश्रम और अवसरों का समुचित उपयोग किसी भी राज्य को भारत की खेल राजधानी बना सकता है।
समाज भी बने सहभागी
आज आवश्यकता इस बात की भी है कि सरकार की नीतियों के साथ समाज भी इस राष्ट्रीय अभियान का सहभागी बने। परिवार खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करें, शिक्षण संस्थान खेलों को संस्कार और नेतृत्व निर्माण का माध्यम बनाएं, उद्योग जगत खेलों में निवेश को राष्ट्र निर्माण का दायित्व समझे और समाज अपने खिलाड़ियों को केवल विजय के क्षणों में नहीं, बल्कि संघर्ष के दिनों में भी संबल प्रदान करे। जब शासन, समाज और संस्कार-ये तीनों एक दिशा में आगे बढ़ेंगे, तभी भारत विश्व खेल मंच पर स्थायी नेतृत्व स्थापित कर सकेगा। ग्लासगो की सफलता उस आत्मविश्वासी भारत का उद्घोष है, जो हर क्षेत्र की तरह खेल जगत में भी विश्व को नेतृत्व देने की क्षमता विकसित कर रहा है। जिस दिन भारत का प्रत्येक बालक और प्रत्येक बालिका खेल मैदान को भी राष्ट्रसेवा का माध्यम मानकर आगे बढ़ेगा, स दिन ओलंपिक के पदक केवल लक्ष्य नहीं रह जाएंगे, बल्कि भारत के स्वाभाविक सामर्थ्य की अभिव्यक्ति बन जाएंगे। यही विकसित भारत की खेल यात्रा का अगला और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय होगा।
पांचजन्य