परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पादन का माडल धीरे-धीरे बड़े केंद्रीकृत संयंत्रों से हटकर अधिक स्थानीय प्रणालियों की ओर बढ़ सकता है। वर्तमान में भारत में जैविक कचरे का बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है।
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विशाल खालदे
दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव अब ऊर्जा बाजारों पर भी असर डाल रहा है। एलपीजी की आपूर्ति को लेकर हो रही चर्चाओं ने फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या देश को ईंधन के मोर्चे पर कुछ और घरेलू स्रोतों को मजबूत करना चाहिए? दरअसल भारत के पास पहले से ही एक ऐसा संसाधन है जिसे अक्सर केवल कचरा समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यही संसाधन भविष्य में गैस आपूर्ति का एक घरेलू आधार बन सकता है। यह संसाधन है जैविक कचरा, जो खेतों से लेकर शहरों की रसोइयों तक हर जगह मौजूद है। हर साल भारत में बड़ी मात्रा में जैविक कचरा उत्पन्न होता है। इसमें खेतों से निकलने वाला फसल अवशेष, पशुओं का गोबर, शहरों का गीला कचरा और बाजारों से निकलने वाला खाद्य कचरा शामिल है।
इन सबका उपयोग बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस बनाने के लिए किया जा सकता है। इस गैस का उपयोग खाना पकाने, बिजली बनाने या वाहनों को चलाने में किया जा सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने सस्टेनेबल अल्टरनेटिव टूवर्ड्स अफोर्डेबल ट्रांसपोर्टेशन (एसएटीएटी) योजना शुरू की थी। इसका लक्ष्य देश में कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्र स्थापित करना और जैविक कचरे को ईंधन में बदलना है। पिछले कुछ वर्षों में देश में ऐसे कई संयंत्र स्थापित किए गए हैं और उनसे गैस का उत्पादन भी शुरू हो चुका है। यदि इस व्यवस्था को विस्तार दिया जाए, तो इसका प्रभाव केवल शहरों की रसोइयों तक सीमित नहीं रहेगा। यह कृषि, शहरी प्रबंधन, उद्योग और परिवहन सहित कई क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।

भारत के खेतों से हर साल लाखों टन फसल अवशेष और पशुओं का गोबर निकलता है। इन सामग्रियों को संसाधित करने के लिए बड़े बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा सकते हैं। यदि ऐसे संयंत्र गांवों और सहकारी समितियों के माध्यम से विकसित किए जाएं, तो हर साल पर्याप्त मात्रा में गैस का उत्पादन किया जा सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त आय का स्रोत भी बन सकता है। गोबर और कृषि अवशेष से गैस बनाने के कुछ प्रयोग पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहले ही शुरू हो चुके हैं। किसान अपने पशुओं का गोबर या खेत का अवशेष गैस संयंत्रों तक पहुंचाते हैं और बदले में उन्हें भुगतान मिलता है। संयंत्र में बनने वाली गैस का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है, जबकि अवशेष जैविक खाद के रूप में फिर खेतों में लौट जाता है। इससे एक चक्र बनता है-कचरा खेत से निकलता है और खाद बनकर फिर खेत में लौटता है।
ऐसी संभावना शहरों में भी मौजूद है। भारतीय शहरों से सालाना छह करोड़ टन ठोस कचरा निकलता है, जिसमें आधे से अधिक जैविक होता है। यदि इस कचरे को अलग करके बायोगैस संयंत्रों तक पहुंचाया जाए तो काफी मात्रा में गैस तैयार की जा सकती है। इंदौर ने बेहतर कचरा प्रबंधन के साथ बायोगैस परियोजनाओं पर काम किया है, जहां गीले कचरे से ऊर्जा बनाने की पहल हुई है। जमशेदपुर में भी खाद्य कचरे को बायोगैस में बदलने के प्रयोग किए गए हैं। यदि नगर निकाय बाजारों, होटलों और घरों से गीला कचरा व्यवस्थित तरीके से इकट्ठा कर उसे बायोगैस संयंत्रों तक भेजें, तो शहरों को दो लाभ मिल सकते हैं। एक तरफ कचरे की मात्रा कम होगी और दूसरी तरफ गैस का एक स्थानीय स्रोत तैयार होगा।
उद्योग क्षेत्र में भी बायोगैस की भूमिका बढ़ सकती है। खाद्य प्रसंस्करण, डेरी या कपड़ा उद्योग जैसे कई छोटे और मध्यम उद्योग जैविक अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं। यदि ऐसे उद्योग अपने परिसर में छोटे बायोगैस संयंत्र स्थापित करें, तो वे अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक हिस्सा स्वयं पूरा कर सकते हैं। इससे एलपीजी या अन्य ईंधनों पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है। परिवहन क्षेत्र में भी कंप्रेस्ड बायोगैस का उपयोग बढ़ रहा है। देश में सीएनजी पर चलने वाले वाहन मौजूद हैं और उसी ढांचे में बायोगैस आधारित ईंधन का उपयोग भी किया जा सकता है। कुछ शहरों में आटो-रिक्शा और छोटे ट्रक ऐसे ईंधन का उपयोग करना शुरू कर चुके हैं।
हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि बायोगैस अचानक भारत की पूरी ऊर्जा जरूरतों को बदल देगी। देश की कुल गैस मांग बहुत बड़ी है, लेकिन यदि कृषि, शहरों, उद्योगों और परिवहन में छोटे-छोटे प्रयास जुड़ते जाएं, तो उनका प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई दे सकता है। उत्साहजनक बात यह है कि अब कई छोटे, विकेंद्रीकृत और आसानी से स्थापित किए जा सकने वाले बायोगैस सिस्टम उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ प्लग-एंड-प्ले माड्यूलर तकनीकों के रूप में आते हैं, जो होटल, बाजार, हाउसिंग सोसायटी या छोटे उद्योगों के स्तर पर ही जैविक कचरे को गैस में बदलने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं।
परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पादन का माडल धीरे-धीरे बड़े केंद्रीकृत संयंत्रों से हटकर अधिक स्थानीय प्रणालियों की ओर बढ़ सकता है। वर्तमान में भारत में जैविक कचरे का बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है। खेतों में फसल अवशेष जला दिए जाते हैं, शहरों में गीला कचरा लैंडफिल में जमा हो जाता है और रसोई का कचरा शहरों के बाहर डाला जाता है, लेकिन यदि इसी कचरे को एक संसाधन के रूप में देखा जाए, तो तस्वीर काफी अलग हो सकती है। संभव है कि वही कचरा, जिसे आज समस्या माना जाता है, आने वाले समय में भारत के लिए ईंधन का एक छोटा, लेकिन स्थिर स्रोत बन जाए।
दैनिक जागरण