आम आदमी पार्टी ने अपने ही बनाए इन सांसदों के खिलाफ घृणा अभियान चलाया और उनकी खामोशी को कमजोरी मान लिया गया परंतु अब इन सांसदों ने चुप्पी तोड़ी है और इसके लिए पार्टी के अरविंद केजरीवाल को जिम्मेवार ठहराया है।
राकेश सैन

जैसे -जैसे आम आदमी पार्टी के नेता व कार्यकर्ता पार्टी छोड़ रहे हैं, उससे लगने लगा है कि जल्द ही यह दल ‘अकेला अरविंद पार्टी ’ बनने जा रहा है। हाल ही में पंजाब के छह और दिल्ली के आप सांसद ने पार्टी को छोड़ भाजपा का दामन थामा। पार्टी ने अपने ही बनाए इन सांसदों के खिलाफ घृणा अभियान चलाया और उनकी खामोशी को कमजोरी मान लिया गया परंतु अब इन सांसदों ने चुप्पी तोड़ी है और इसके लिए पार्टी के अरविंद केजरीवाल को जिम्मेवार ठहराया है।
सांसद राघव चड्ढा ने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है। जिसमें उन्होंने कहा कि पॉलिटिक्स में आने से पहले मैं एक सीए था, मेरे सामने एक बेहतर करियर था, उसे छोड़कर मैं राजनीति में आया। अपना करियर बनाने के लिए राजनीति में नहीं आया। एक पॉलिटिकल पार्टी का फाउंडिंग मेंबर बना, जिस पार्टी को मैंने अपने प्राइम यूथ के 15 साल दिए। अपने खून-पसीने और बहुत मेहनत से इस पार्टी को सींचा, लेकिन आज ये पुरानी वाली पार्टी नहीं रही। इस पार्टी में आज टॉक्सिक वर्क एनवायरमेंट है। आपको काम करने से रोका जाता है, पार्लियामेंट में बोलने से रोका जाता है और ये पार्टी आज चंद भ्रष्ट लोगों के हाथ में फंसकर रह गई है, जो अब देश के लिए नहीं, बल्कि अपने निजी फायदे के लिए काम कर रही है।
राघव ने गिनाए तीन विकल्प
पिछले कुछ सालों से मैं यह महसूस कर रहा था कि शायद मैं एक गलत पार्टी में एक सही आदमी हूं। इसी के चलते मेरे सामने सिर्फ तीन विकल्प थे; पहला विकल्प कि मैं राजनीति ही छोड़ दूं। दूसरा विकल्प कि मैं इसी पार्टी में रहूं और चीजें ठीक करने की कोशिश करूं, जो कि हुआ नहीं। तीसरा विकल्प कि मैं अपनी ऊर्जा और अनुभव लेकर किसी और पार्टी के साथ जुड़कर सकारात्मक राजनीति करूं। इसलिए अकेले मैंने ही नहीं, मेरे साथ छह और सांसदों ने यह फैसला लिया कि हम इस पार्टी से रिश्ता तोड़ देंगे। एक आदमी गलत हो सकता है, दो आदमी गलत हो सकते हैं, लेकिन सात लोग गलत नहीं हो सकते।
इस पार्टी के साथ जुड़े थे, क्या वे सारे लोग गलत थे?
उन्होंने कहा कि आप ऐसे समझिए, आप में से जितने ऑफिस जाने वाले लोग हैं, अगर आपका वर्कप्लेस टॉक्सिक बन जाए तो आप कितना काम कर पाएंगे? क्या आप वहां काम कर पाएंगे? क्या आप वहां काम कर पाएंगे? आपको वहां काम करने से रोका जाए, आपकी मेहनत को दबाया जाए, आपको चुप कराया जाए, तो आप क्या करेंगे? उस स्थिति में सही फैसला यही है कि आप उस जगह को छोड़ दें। शायद हमने भी वही किया। आप में से कई लोगों ने पूछा कि क्या मैं आम लोगों के मुद्दे वैसे ही उठाता रहूंगा? तो मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मैं आपकी समस्याओं को लगातार और जोश के साथ उठाऊंगा, और अच्छी बात यह है कि अब हम उन दिक्कतों के हल भी ढूंढ पाएंगे।
साहनी बोले, हम गद्दार नहीं, केजरीवाल को अवगत करवाया था
आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए राज्यसभा सांसद विक्रमजीत साहनी ने चुप्पी तोड़ी है। आप के आरोपों पर साहनी ने कहा कि हम गद्दार नहीं हैं। हम 10 गुना ज्यादा काम करेंगे। वर्ष 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में सांसद राघव चड्ढा और संदीप पाठक का अहम रोल था लेकिन पिछले कुछ समय से उन्हें साइड लाइन कर दिया गया।
सांसद साहनी ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि आप के दिल्ली चुनाव हारने के बाद नई टीम ने मोर्चा संभाल लिया। चड्ढा को संसद में उपनेता के पद से हटाने के बाद रोष बढ़ गया। दोनों प्रमुख नेताओं को नजरअंदाज करना गलती थी। बाकी सांसदों में भी इसे लेकर असंतोष था। साहनी ने कहा कि वह इसे लेकर आप प्रमुख केजरीवाल से भी मिले थे। केजरीवाल ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए बोल दिया था।
इस कारण नहीं दिया इस्तीफा
साहनी ने कहा कि वे इस्तीफा देने लगे थे लेकिन अपने करीबियों के साथ विचार-विमर्श के बाद ही इस्तीफा न देने का फैसला लिया और इस दौरान सहमति बनी कि भाजपा ही पंजाब का भला कर सकती है। इसके बाद ही पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया गया। इसके अलावा पंजाब को जो मिलना चाहिए था वो सही समन्वय के कारण मिल नहीं पा रहा है। पिछले चार साल से चुनावी मोड ही चल रहा है और राज्य और केंद्र सरकार दोनों एक दूसरे को कोस रहे रहे हैं। युवा पीढ़ी खेती नहीं करना चाहती है तो ऐसे हालात में पंजाब का क्या हो सकता है, क्योंकि केंद्र सरकार पंजाब के लिए बहुत कुछ करना चाहती है।
साहनी ने कहा कि फ्रेट सब्सिडी देने के लिए केंद्र तैयार है लेकिन आंकड़ों के साथ प्रस्ताव तो देना ही होगा। चुनाव के बारे में अभी कुछ नहीं कहना चाहता हूं, क्योंकि पंजाब के लोग समझदार हैं और 2027 विधानसभा चुनाव में उचित फैसला लेंगे।
पार्टी काडर का हौसला हो रहा है पस्त
आम आदमी पार्टी (आप) का एक तरफ कुनबा बिखर रहा है और मनोबल भी पस्त होने को है, ऐसे समय में आप के सामने अब एकजुटता की चुनौती है। पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों द्वारा पाला बदलने के बाद कार्यकर्ताओं में मायूसी है। 14 माह में दूसरी बार है कि जब आप के कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरने वाली स्थिति पैदा हुई है। फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद आप के खासकर दिल्ली के कार्यकर्ताओं में ही नहीं पार्ट के नेताओं में भी मायूसी देखी गई थी। कार्यकर्ता इससे उबर रहे थे कि यह साथ सात राज्यसभा सदस्यों द्वारा पाला बदलने की घटना ने एक बार फिर कार्यकर्ताओं में मायूसी को बढ़ावा दे दिया है।
बड़ी संख्या में पाला बदल सकते हैं कार्यकर्ता
कहा यहां तक भी जा रहा है कि पार्टी छोड़कर गए अपने खास राज्यसभा सदस्यों के साथ बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पाला भी बदल सकते हैं। इसे देखते हुए आप के सामने कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने के साथ-साथ एकजुटता बनाए रख पाना भी बड़ी चुनौती है।
वर्तमान हालात बड़ा संकट
आप के लिए वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम किसी बड़े संकट से कम नहीं है। एक ओर जहां पार्टी फरवरी 2025 के विधानसभा चुनाव में मिली हार के जख्मों से उबरने की कोशिश कर रही थी, वहीं अब सात राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने ने संगठन की नींव हिला दी है।
पस्त मनोबल… फिर कैसे भरेगा जोश?
राजधानी के सियासी गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतृत्व अपने बिखरते कुनबे और पस्त पड़े कार्यकर्ताओं में फिर से जोश भर पाएगा? पार्टी के भीतर से आ रही खबरें बताती हैं कि सात राज्यसभा सदस्यों का जाना केवल नेताओं का जाना नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास की हार है जिसे कार्यकर्ता अपना आदर्श मानते थे। विभिन्न वार्डों और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय कार्यकर्ता अब असमंजस में हैं। खतरा इस बात का भी है कि बड़ी संख्या में स्थानीय कार्यकर्ता और पदाधिकारी अपने पसंदीदा सांसदों के नक्शे कदम पर चलते हुए दूसरी पार्टी का दामन थाम सकते हैं।
नेतृत्व की रणनीति पर सवाल
सांसदों के इस कदम ने न केवल पार्टी की आंतरिक एकता को उजागर किया है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि यदि उच्च सदन के प्रतिनिधि ही सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे, तो आम कार्यकर्ताओं का भविष्य क्या होगा? यह स्थिति पार्टी की अनुशासन और एकजुटता वाली छवि को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।
आप के सामने दोहरी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आप के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली पार्टी के भीतर मची भगदड़ को तुरंत रोकना और दूसरी कर्यकर्ताओं के गिरे हुए मनोबल को फिर से उठाना। यदि नेतृत्व ने जल्द ही कोई ठोस संवाद कार्यक्रम या बड़े संगठनात्मक बदलाव नहीं किए, तो आने वाले समय में पार्टी का ढांचा और भी कमजोर हो सकता है। फिलहाल, आप एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां उसे अपनी विचारधारा और संगठन को बचाने के लिए नए सिरे से संघर्ष करना होगा। पंजाब-दिल्ली की सड़कों पर पार्टी का झंडा बुलंद करने वाला कार्यकर्ता आज हताश हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि केजरीवाल और उनकी टीम इस अस्तित्व के संकट से बाहर निकल पाने में कितनी सफल होती है। कहीं ऐसा न हो कि आप का अर्थ वास्तव में ही अकेला अरविंद पार्टी हो जाए।
पांचजन्य