गुलाम जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान सरकार के उपनिवेशवादी और सौतेले व्यवहार के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिसमें 30 से अधिक लोग मारे गए हैं।
विजय क्रांति

गुलाम जम्मू-कश्मीर में इन दिनों पाकिस्तान की सेना और सरकार की जुगलबंदी वाले सत्ता प्रतिष्ठान के विरुद्ध भारी उबाल दिख रहा है। पीओजेके कहा जाने वाला यह इलाका निरंतर पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के दमन का शिकार रहा है। जून के पहले सप्ताह में ही राजधानी मुजफ्फराबाद से लेकर मीरपुर तक फैले जनाक्रोश में 30 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।
पुलिस की गोली में गंभीर रूप से घायलों की संख्या भी 200 के करीब है। पाकिस्तान सरकार के उपनिवेशवादी सौतेले व्यवहार के खिलाफ यहां की जनता के सामूहिक आक्रोश का यह पहला प्रकटीकरण नहीं है। भारत में कानूनी रूप से शामिल हो चुके जम्मू-कश्मीर पर 1947 में पाकिस्तानी सेना के हमले के दौरान हथिया लिए गए इस इलाके के लोग पिछले 60-70 साल से पाकिस्तानी दमन के खिलाफ आवाज उठाते आ रहे हैं।
मई 2024 में भी सरकार विरोधी प्रदर्शनों में करीब चार लोग मारे गए थे। पिछले साल अक्टूबर में भी प्रदर्शन कर रहे नौ लोग पुलिस के हाथों मारे गए।
यह समझना जरूरी है कि भारत के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले का कारण केवल यह नहीं था कि मुस्लिम बहुल रियासत के हिंदू महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान के बजाय भारत में शामिल होने का फैसला किया था। इसके पीछे दोनों देशों के साझा अंग्रेज सेनापति लार्ड माउंटबेटन और ब्रिटिश सरकार का यह कुत्सित इरादा भी था कि समाजवादी विचारधारा के प्रति घोर आकर्षण रखने वाले पंडित नेहरू के नेतृत्व वाले भारत और सोवियत संघ तथा चीन के बीच भौगोलिक संपर्क को पूरी तरह तोड़ दिया जाए।
इसीलिए जहां एक ओर पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर पर हमला करके वहां अपना कब्जा जमाने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश कमांडरों ने रियासत के गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान का कब्जा करा दिया।
गुलाम जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता के प्रति पाकिस्तानी शासक अब भी उपनिवेशवादी नजरिया अपनाए हुए हैं। यही कारण है कि वहां की जनता बार-बार विद्रोह में उठ खड़ी होती है। मौजूदा विरोध-प्रदर्शनों की जड़ें भी 2023 के उस प्रविधान से जुड़ी हैं, जिसमें आर्थिक मुद्दों और स्थानीय प्रशासन में पाकिस्तानी दखलंदाजी बढ़ाई गई थी।
यह आंदोलन गेहूं-आटे की आसमान छूती कीमतों और अपने ही प्रांत में पैदा हुई बिजली की तंग एवं महंगी आपूर्ति के खिलाफ शुरू हुआ था, जिसकी कमान स्थानीय व्यापारियों, वकीलों और विद्यार्थियों के साझा संगठन ‘जम्मू कश्मीर ज्वाइंट्स आवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के हाथ में थी। पाकिस्तानी शासन ने गेहूं के दाम घटाने और बिजली की आपूर्ति सुधारने तथा उसकी दरें घटाने के वादे तो किए, लेकिन उन पर अमल नहीं किया।

विरोध की यह सुलगती चिंगारी तब और भड़क गई, जब बीते दिनों पाकिस्तान सरकार ने जेएएसी को ‘आतंकी’ संगठन घोषित कर दिया और उसके नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। कई नेताओं पर करोड़ों का इनाम तक रख दिया। पांच जून को कमेटी के एक नेता शाहजेब हबीब को पुलिस एनकाउंटर में मार दिए जाने पर जनता का गुस्सा बेकाबू हो गया।
शासन-प्रशासन ने इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाकर आंदोलन को दबाने का प्रयास तो किया, पर वे उसमें सफल नहीं हो पाए। पाकिस्तान भले ही इसमें 11 लोगों के मारे जाने की बात कर रहा हो, पर एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठन और पश्चिमी समाचार एजेंसियों के अनुसार यह संख्या 30 से अधिक है।
कहने को तो वर्तमान आंदोलन के पीछे आटे और बिजली के बढ़े दाम मुख्य वजह हैं, लेकिन इसका कहीं व्यापक कारण पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान का इस क्षेत्र और उसकी जनता के प्रति सौतेला रवैया है। यह उल्लेखनीय है कि 1973 के पाकिस्तानी संविधान की पहली धारा में पाकिस्तान के जिन प्रांतों के नाम शामिल हैं, उनमें इस तथाकथित ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ का नाम नहीं है।
यहां तक कि पाकिस्तानी संसद में ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ से एक भी सांसद का प्रविधान नहीं है। इसकी जगह पाकिस्तान की धारा-257 में केवल इतना उल्लेख है कि ‘भविष्य में जब भी जम्मू-कश्मीर के लोग पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करेंगे, तब उनकी इच्छा के मुताबिक फैसला किया जाएगा।’ तब तक इस क्षेत्र के लिए 1974 के एक ‘आंतरिक संविधान’ के तहत शासन व्यवस्था रखी गई है, जिसमें एक क्षेत्रीय सरकार, असेंबली, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और राष्ट्रीय झंडे और प्रतीक का प्रविधान किया गया है।
हालांकि इस असेंबली या किसी भी पद के लिए प्रत्याशी के रूप में पर्चा भरने से पहले पाकिस्तान के प्रति अपनी आस्था के शपथपत्र पर हस्ताक्षर करना जरूरी है। वर्तमान आंदोलन की एक बड़ी मांग यह भी है कि संविधान के तहत भारतीय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान में आकर बसे कश्मीरियों को ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ की असेंबली में जो 15 सीटें दी गई हैं, उसे समाप्त किया जाए। यहां के लोगों की शिकायत है कि पाकिस्तान सरकार दूसरे हिस्सों में बसे इन कश्मीरियों को असेंबली में बिठाकर स्थानीय नेताओं के बहुमत को उपेक्षित कर देती है।
पाकिस्तान इस क्षेत्र के बारे में भले ही स्वायत्तता का दावा करे, पर सच यह है कि पाकिस्तानी संविधान में 13वां संशोधन कर इस्लामाबाद में एक विशेष ‘एजेके काउंसिल’ का गठन किया गया है, जो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ का प्रशासन संभालती है। इस काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में क्षेत्र के सभी 52 मुख्य विषय आते हैं, जिसके आधार पर यह काउंसिल ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ की असेंबली और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को कभी भी हटा सकती है।
इसी कारण आंदोलनकारियों की एक प्रमुख मांग यह भी है कि पाकिस्तानी संविधान के इस प्रविधान के अंतर्गत ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ में पाकिस्तानी वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की नियुक्तियों और उनके विशेषाधिकारों को बंद किया जाए। पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान कभी इसके लिए तैयार नहीं होगा। इसलिए लगता नहीं कि आने वाले दिनों में यहां गतिरोध कम हो पाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सेंटर फार हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन हैं)
दैनिक जागरण