नारायण मेघाजी लोखंडे न होते, तो संडे भी काम करना पड़ता
भारत में काम के घंटे और साप्ताहिक छुट्टी को लेकर अभी भी लोग बहुत चर्चा करते हैं। लेकिन क्या आपलोगों को पता है कि इस छुट्टी के लिए संघर्ष 19वीं सदी में ही शुरू हो गया था। नारायण मेघाजी लोखंडे के नेतृत्व में रविवार को छुट्टी की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था।
अभिषेक मिश्र

आज पूरी दुनिया में वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर बहस चल रही है। भारत में बैंक कर्मचारी हफ्ते में दो दिन छुट्टी की मांग पर डटे हैं। आज की यह बहस हमें 136 बरस पीछे ले जाती है। भारत में काम के घंटे और साप्ताहिक छुट्टी को लेकर संघर्ष 19वीं सदी में ही शुरू हो गया था। तब बंबई (अब मुंबई) की कपड़ा मिलों में काम करने वाले कामगारों ने नारायण मेघाजी लोखंडे के नेतृत्व में रविवार को छुट्टी की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था।
आंदोलन के जनक : भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के जनक कहे जाने वाले लोखंडे ने सबसे पहले कामकाजी घंटे कम करने, समय पर वेतन देने और काम के दौरान मजदूरों के चोटिल होने पर आर्थिक मदद देने की मांग उठाई। भारत में श्रम आंदोलन के महत्वपूर्ण दस्तावेज और स्रोत संपादित करने वाले इतिहासकार और लेखक एस. डी. पुणेकर (S.D. Punekar) व आर. वरीकाईल (R. Varickayil) ने ‘लेबर मूवमेंट इन इंडिया : डॉक्यूमेंट्स 1850-1890’ में यह कहानी दर्ज की है।
मजदूर हुए संगठित : भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) की इस किताब में बताया गया है कि नारायण मेघाजी लोखंडे ने 1884 में बंबई के मिल मजदूरों की बैठक बुलाई। बैठक में मजदूरों ने हर रविवार छुट्टी, रोजाना दोपहर में आधे घंटे का ब्रेक, सुबह 6:30 बजे से सूर्यास्त तक काम और हर महीने 15 तारीख तक वेतन देने की मांग रखी। इस पर 5,500 मजदूरों ने दस्तखत किए। इसके अलावा, मजदूरों ने काम के दौरान चोटिल होने पर आर्थिक क्षतिपूर्ति और अपंग होने पर पेंशन देने की मांग की। 1848 में ठाणे में जन्मे लोखंडे ने 1870 में मंडवी टेक्सटाइल मिल में स्टोर कीपर के तौर पर काम शुरू किया था। इससे पहले वह रेलवे और डाक विभाग में काम कर चुके थे। मिल में काम करते हुए वह मजदूरों की मुश्किलों से रूबरू हुए। इसके बाद उन्होंने मजदूरों को संगठित करना शुरू किया।
महिलाएं भी साथ : धीरे-धीरे मजदूरों का आंदोलन जोर पकड़ने लगा। 24 अप्रैल 1890 को महालक्ष्मी के रेस कोर्स मैदान में 10 हजार से ज्यादा मिल मजदूर जुटे। इस सभा में महिला श्रमिकों ने भी अपनी आवाज बुलंद की। 10 जून 1890 को मिल मालिकों ने रविवार की साप्ताहिक छुट्टी की मांग स्वीकार कर ली। इसके अलावा, सरकार ने लोखंडे को फैक्टरी लेबर कमीशन का एसोसिएट सदस्य भी बनाया। शुरुआत में लोखंडे का आंदोलन मुख्य रूप से कामकाजी घंटे और आराम के अधिकार से जुड़ा था, लेकिन उस दौर में उठाए गए सवाल धीरे-धीरे श्रमिकों की व्यापक सामाजिक सुरक्षा की बहस का हिस्सा बन गए। तब यह सवाल उठने लगा कि मजदूर को सिर्फ काम के बदले मजदूरी मिले या बीमारी, चोट, बुढ़ापे और काम छूटने जैसी परिस्थितियों में भी आर्थिक सहारा दिया जाए।
भविष्य की सुरक्षा : लोखंडे के समय मजदूर जिस सुरक्षा की मांग कर रहे थे, वह आगे चलकर रिटायरमेंट के बाद की आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था तक पहुंची। भारत में प्रोविडेंट फंड की दिशा में पहला कदम 1925 में उठा। हालांकि, शुरू में यह सिर्फ कुछ निजी संस्थानों तक ही लागू था। 1929 में रॉयल कमीशन ऑन लेबर ने औद्योगिक मजदूरों के लिए प्रोविडेंट फंड (भविष्य निधि) की जरूरत पर जोर दिया। आजादी के बाद 1948 में कोयला खदानों में ऐसी स्कीम शुरू हुई। 15 नवंबर 1951 को सरकार ने एम्प्लॉयी प्रोविडेंट फंड ऑर्डिनेंस पास किया। 4 मार्च 1952 को कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम लागू किया गया। नवंबर तक सीमेंट, सिगरेट, इंजीनियरिंग, लोहा-इस्पात, कागज और कपड़ा उद्योगों के मजदूरों को इसके दायरे में लाया गया। समय के साथ यह सुरक्षा व्यवस्था और व्यापक होती गई।
नवभारत टाइम्स