सितंबर में बाहर आएंगे पहले अग्निवीर; रिटेंशन पर सरकार ले सकती है बड़ा फैसला
अग्निपथ योजना अब पहली बड़ी परीक्षा के दौर में पहुंच गई है। सितंबर में नौसेना के पहले अग्निवीर चार साल की सेवा पूरी कर बाहर आएंगे, जबकि सेना और वायुसेना के बैच भी जल्द एग्जिट करेंगे। अब बहस दावों से आगे बढ़कर वास्तविक नतीजों पर होगी।
15 जुलाई, 2026 – नई दिल्ली : भारतीय सेनाओं में भर्ती की अग्निपथ योजना अब अहम मोड़ पर पहुंच गई है। सितंबर में भारतीय नौसेना के पहले बैच के अग्निवीर चार साल की सेवा पूरी कर बाहर आएंगे। कुछ महीनों बाद अगले साल की शुरुआत में भारतीय सेना और वायुसेना के पहले बैच भी सेवा पूरी करेंगे। पहली बार ऐसा होगा जब अग्निपथ योजना और अग्निवीर पर बहस किसी आशंका या राजनीतिक आरोप के आधार पर नहीं, जमीन पर दिखने वाले नतीजों के आधार पर होगी। यही वजह है कि 20 जुलाई से संसद के मॉनसून सत्र में यह मुद्दा फिर गर्म हो सकता है।
रिटेंशन पर इसलिए नजर
अग्निपथ की घोषणा के बाद देश के कई हिस्सों में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे। विपक्ष ने इसे युवाओं के भविष्य व राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा। वहीं, सरकार ने इसे सेना को ज्यादा युवा बनाने और भविष्य की जरूरतों के मुताबिक तैयार करने वाला बड़ा सुधार बताया। चार साल बाद अब दोनों पक्षों के सामने अपने-अपने दावों की परीक्षा का वक्त है।
अभी नियम है कि अग्निवीर के हर बैच के अधिकतम 25% को नियमित सेवा में शामिल किया जाएगा। बाकी 75% सेवा पूरी करने के बाद बाहर आएंगे। हालांकि सेनाएं शुरू से चाह रही हैं कि कम से कम 50% अग्निवीरों को स्थायी किया जाना चाहिए। जब योजना लागू हुई थी, तब भी अग्निवीरों के रिटेंशन रेट को लेकर सवाल उठे थे। उस समय इंटरनल मीटिंग्स में कहा गया कि अभी स्कीम लागू कर देते हैं, बाद में रिटेंशन रेट 40% तक किया जा सकता है। स्कीम के ऐलान के वक्त भी सरकार ने कहा था कि जरूरत के हिसाब से बदला हो सकता है। पेपर लीक मामले में युवा जिस तरह आक्रामक दिखे उसके मद्देनजर यह देखना होगा कि क्या सरकार सितंबर से पहले अग्निवीरों के रिटेंशन पर कोई बड़ा फैसला लेती है।
सरकार कैसे करेगी बचाव
दो साल पहले करगिल विजय दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अग्निपथ को लेकर एक अहम बात कही थी। उन्होंने साफ कहा था कि यह योजना पैसे बचाने के लिए नहीं लाई गई है और इसका मकसद सेना को युवा रखना व युद्ध के लिए अधिक सक्षम बनाना है। यह बयान इसलिए अहम था क्योंकि अग्निपथ की शुरुआत से ही विपक्ष सरकार पर पेंशन और वेतन का खर्च कम करने की कोशिश का आरोप लगाता रहा है। अगर सरकार 25% से ज्यादा अग्निवीरों को परमानेंट करने का फैसला करती है, तो उस बयान का महत्व और बढ़ जाएगा। तब सरकार कह सकेगी कि वित्तीय बोझ चिंता नहीं थी और ऑपरेशनल जरूरतों के हिसाब से नीति में बदलाव किया जाता रहा है।
सुधार नहीं, राजनीति भी
अग्निपथ सिर्फ रक्षा सुधार का ही विषय नहीं रह गया है, राजनीतिक मुद्दा भी है। पहली बार बड़ी संख्या में ऐसे युवा सामने होंगे, जिन्होंने चार साल सेना में सेवा की है। उनके अनुभव, उन्हें बाहर आकर मिलने वाले रोजगार पर सबकी नजर रहेगी। सितंबर से शुरू होने वाला पहला एग्जिट अग्निपथ की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी होगा। तब बहस इस पर नहीं होगी कि अग्निपथ कैसा विचार था, बहस इस पर होगी कि चार साल बाद उसका नतीजा क्या निकला।
नवभारत टाइम्स