एक ओर महिलाओं के विरुद्ध हिंसा समाज के लिए चुनौती है, तो दूसरी ओर झूठे आरोपों और विधिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग की समस्या भी न्याय व्यवस्था के समक्ष एक गंभीर प्रश्न बनकर उभरी है। इसका समाधान अब होना ही चाहिए।
डॉ. ऋतु सारस्वत

हाल में देश की शीर्ष अदालत ने एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए एक ऐसी चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकर्षित किया, जो केवल न्याय व्यवस्था ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। न्यायालय ने कहा, “वैवाहिक अथवा व्यावसायिक संबंधों में जुड़े पक्षकार प्रतिशोध की भावना से एक-दूसरे के विरुद्ध आपराधिक प्रकृति के तुच्छ एवं दुर्भावनापूर्ण दावे करने तथा आरोप लगाने का काम कर रहे हैं।
वे अनैतिक और कुटिल उपायों का सहारा लेते हैं। अनेक मामलों में कानून और पुलिस का सहारा न्याय प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि दूसरे पक्षकार तथा उसके परिवारजनों पर दबाव बनाने, उन्हें परेशान करने तथा प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से लिया जाता है। यह सब पक्षकार और उसके परिवारजनों के प्रति घृणा और तिरस्कार की भावना से प्रेरित होकर किया जाता है।” सर्वोच्च न्यायालय की यह चिंता निराधार नहीं है।
वैवाहिक विवादों में झूठे और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों की प्रवृत्ति को लेकर समय-समय पर न्यायालयों ने गंभीर टिप्पणियां की हैं। दहेज उत्पीड़न, वैवाहिक क्रूरता, घरेलू हिंसा तथा अन्य कानूनी प्रविधानों के अंतर्गत ऐसे मामले तमाम सामने आए हैं, जिनमें आरोप न्यायिक परीक्षण में सिद्ध नहीं हो सके। कई बार सामान्य, अस्पष्ट और व्यापक आरोपों के आधार पर पूरे परिवार को मुकदमेबाजी के दायरे में खड़ा कर दिया जाता है।
यह सच है कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा, दहेज उत्पीड़न और भेदभाव की समस्या वास्तविक है तथा उससे संघर्ष करना किसी भी सभ्य समाज का दायित्व है, किंतु भारतीय समाज की चुनौती केवल इतनी भर नहीं है। सत्य यह भी है कि अनेक पुरुष झूठे आरोपों, दुर्भावनापूर्ण मुकदमों और लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं के कारण मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा का सामना कर रहे हैं। पुरुषों की समस्याएं आज भी अपेक्षित सामाजिक और विधिक विमर्श का विषय नहीं बन सकी हैं।
परिणामस्वरूप अनेक बार उनकी पीड़ा को या तो गंभीरता से लिया ही नहीं जाता अथवा उसे सामाजिक विमर्श का वैध विषय नहीं माना जाता। यही कारण है कि 22 जनवरी, 2025 को ‘ज्योति उर्फ किट्टू बनाम राज्य’ मामले में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा को यह टिप्पणी करनी पड़ी कि यह धारणा कि वैवाहिक संबंधों में केवल महिलाएं ही शारीरिक अथवा मानसिक क्रूरता की शिकार होती हैं और इसके कोई अपवाद नहीं हैं, जीवन की कठोर वास्तविकताओं के विपरीत हो सकती है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, ” जिस प्रकार महिलाएं क्रूरता और हिंसा से संरक्षण की अधिकारिणी हैं, उसी प्रकार पुरुष भी विधि के अंतर्गत समान सुरक्षा पाने के अधिकारी हैं।”
लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि कोई भी महिला अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान को दांव पर लगाकर दुष्कर्म, यौन उत्पीड़न की मिथ्या शिकायत नहीं करेगी। यही कारण था कि ऐसे आरोपों को सामान्यतः विश्वसनीयता के साथ देखा जाता था। इस संदर्भ में गत वर्ष केरल उच्च न्यायालय ने कहा था कि बदलते सामाजिक परिदृश्य में इस धारणा का यांत्रिक रूप से अनुसरण नहीं किया जा सकता कि केवल आरोप लगाए जाने मात्र से उसकी सत्यता स्वतः सिद्ध हो जाती है। न्यायालय ने माना कि यद्यपि ऐसे मामले अपवादस्वरूप हो सकते हैं, तथापि कुछ प्रकरणों में गंभीर आरोप प्रतिशोध, दबाव या अन्य स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से भी लगाए गए। इसलिए किसी भी आरोप की सत्यता का निर्धारण पूर्वधारणाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों की कसौटी पर ही किया जाना चाहिए। वास्तव में समस्या का मूल कारण अधिकार नहीं, बल्कि अधिकार और उत्तरदायित्व के बीच बिगड़ता संतुलन है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों का संरक्षण आवश्यक है, किंतु उतना ही आवश्यक यह भी है कि उन अधिकारों के प्रयोग के साथ जवाबदेही भी सुनिश्चित हो। जब किसी कानून का उपयोग संरक्षण के स्थान पर प्रतिशोध, दबाव अथवा व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति का माध्यम बनने लगे, तो उसका प्रभाव केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है। देशभर में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जिनमें वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया का सामना करने के पश्चात आरोप असत्य अथवा प्रमाणित न हो पाने वाले सिद्ध हुए।
ऐसे मामलों में केवल मुकदमे का परिणाम ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि वह सामाजिक, मानसिक और आर्थिक क्षति भी महत्वपूर्ण होती है, जिसका सामना आरोपित व्यक्ति और उसका परिवार करते हैं। प्रतिष्ठा की हानि, सामाजिक कलंक, पारिवारिक विघटन और मानसिक आघात ऐसे घाव हैं, जिनकी भरपाई प्रायः किसी न्यायिक आदेश से नहीं हो पाती। यह भी उतना ही सत्य है कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाली वास्तविक हिंसा और उत्पीड़न के मामलों में कानून का कठोर और प्रभावी होना अनिवार्य है, किंतु किसी एक समस्या का समाधान दूसरी समस्या की उपेक्षा करके नहीं किया जा सकता। एक ओर महिलाओं के विरुद्ध हिंसा समाज के लिए चुनौती है, तो दूसरी ओर झूठे आरोपों और विधिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग की समस्या भी न्याय व्यवस्था के समक्ष एक गंभीर प्रश्न बनकर उभरी है। इसका समाधान अब होना ही चाहिए।
(लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं)
दैनिक जागरण