सावन का महीना
सावन का महीना या श्रावण मास का हिंदू धर्म में अत्यंत महत्व बताया गया है। यह महीना भगवान भोले की भक्ति को समर्पित माना जाता है। इस माह में कुछ खास बातें हैं जिनके बारे में आज के इस आर्टिकल में जानकारी दे रहे हैं।

सावन का पवित्र महीना शुरू हो चुका है। हिंदू धर्म में सावन के महीने को एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है। सावन के इस पूरे महीने में भगवान शिव के भक्त उनकी भक्ति में रम जाते हैं। पंचांग के अनुसार, देखा जाए तो साल के पांचवे महीने को श्रावण माह कहा जाता है। हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-उपासना करने से वे प्रसन्न होकर अपने भक्तों की सभी परेशानियों का नाश करते हैं। सावन के महीने में पड़ने वाले सोमवार का बहुत खास महत्व होता है।
इस माह को श्रावण मास क्यों कहा जाता है?
क्यों है इस महीने का नाम श्रावण ?
पंचांग के अनुसार, सावन का महीना पांचवा महीना होता है। इस महीने का नाम श्रावण होने के पीछे एक कारण है कि इस महीने पूर्णिमा पर चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में होते हैं। वैदिक ज्योतिष की मानें, तो श्रवण नक्षत्र का स्वामी बृहस्पति ग्रह है। श्रवण का अर्थ होता है सुनना- इस माह में भगवान के स्वरूप के बारे में सुनने से मन के विकार दूर होते हैं. यही कारण है कि इस माह में धार्मिक ग्रंथों का श्रवण करने का विशेष महत्व बताया गया है।
आषाढ के उपरांत आने वाला मास है श्रावण
श्रावण मास कहते ही व्रतों का स्मरण होता है । उपासना में व्रतों का महत्त्व अनन्य साधारण है। सामान्य जनों के लिए वेदानुसार आचरण करना कठिन है । इस कठिनाई को दूर करने के लिए पुराणो में व्रतों का विधान बताया गया है । आषाढ एकादशी से लेकर कार्तिक एकादशी तक की कालावधि में चातुर्मास होता है । अधिकांश व्रत चातुर्मास में ही किए जाते हैं । इनमें विशेष व्रत श्रावण मास में ही आते हैं । जैसे……
१.१ श्रावण सोमवार व्रत
१.२ सोलह सोमवार व्रत
१.३ मंगलागौरी व्रत
१.४ वरदलक्ष्मी व्रत

१ श्रावण सोमवार व्रत
श्रावण मासमें बच्चों से लेकर बडे-बूढों तक सभी के द्वारा किया जाने वाला एक महत्त्वपूर्ण व्रत है, श्रावण सोमवार का व्रत। श्रावण सोमवार के व्रत संबंधी उपास्य देवता हैं भगवान शिवजी।
१ अ. श्रावण सोमवारकी व्रतविधि
इसमें श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को भगवान शिवजी के देवालय में जाकर उनकी पूजा की जाती है । कुछ शिवभक्त श्रावण के प्रत्येक सोमवार को १०८ अथवा विशेष संख्या में बिल्वपत्र शिवपिंडी पर चढाते हैं । कुछ लोग श्रावण सोमवार को केदारनाथ, वैद्यनाथ धाम, गोकर्ण जैसे शिवजी के पवित्र स्थानों पर जाकर विविध उपचारों से उनका पूजन करते हैं । इसके साथ ही श्रावण सोमवार को भगवान शिवजी से संबंधित कथा-पुराणों का श्रवण करना, कीर्तन करना, भगवान शिवजी संबंधी स्तोत्रपाठ करना, भगवान शिवजी का ‘ॐ नमः शिवाय ’ यह नामजप करना इत्यादि प्रकार से भी दिनभर यथाशक्ति भगवान शिवजी की उपासना की जाती है । व्रत के दिन व्रत देवता की इस प्रकार उपासना करना व्रत का ही एक अंग है । श्रावण सोमवार के दिन भगवान शिवजी का नाम जप करना लाभदायी होता है ।
२. श्रावण सोमवार व्रतसे संबंधित उपवास
इस दिन संभव हो, तो निराहार उपवास रखते हैं । निराहार उपवास अर्थात दिनभर आवश्यकतानुसार केवल जल प्राशन कर किया जाने वाला उपवास । दूसरे दिन भोजन कर यह उपवास तोडा जाता है । कुछ लोग नक्त व्रत रखते हैं । नवतकाल अर्थात सूर्यास्त के उपरांत तीन घटिका अर्थात ७२ मिनट, अथवा नक्षत्र दिखने तक का काल । व्रतधारी दिनभर कुछ न सेवन कर इस नक्तकाल में भोजन कर व्रत रखते हैं ।
३. श्रावण सोमवार को किए जाने वाले कुछ धार्मिक कृत्य
कुछ स्थानों पर शिवभक्त यथाशक्ति किसी एक सोमवार अथवा महीने के प्रत्येक सोमवार को कांवर यात्रा करते हैं । इस यात्रा में शिवभक्त कांवर में गंगा जल लेकर भगवान शिवजी से संबंधित निकट के किसी तीर्थ क्षेत्र में जाते हैं तथा कांवर का जल शिवपिंडी को चढाते हैं । इस प्रकार किए गए शिवाभिषेक का थोडा जल वापस लाकर शिवभक्त उसका प्रयोग तीर्थ के रूपमें करते हैं । यह यात्रा नंगे पैर अर्थात बिना जूते-चप्पल पहने, पैदल चलते हुए की जाती है । कुछ स्थानों पर श्रावण के तीसरे सोमवार को मेले का आयोजन भी किया जाता है । श्रावण के अंतिम सोमवार को इस व्रत का पारण किया जाता है, कुछ स्थानों पर भंडारे किए जाते हैं तथा कुछ स्थानों पर पूरे श्रावण मासमें अन्नछत्र चलाया जाता है । यह व्रत रखने से भगवान शिवजी प्रसन्न होते हैं एवं भक्त को सायुज्य मुक्ति मिलती है तथा ऐसी मान्यता है कि इस विधिद्वारा भगवान शिवजी से एकरूपता प्राप्त होती है। इसी व्रतको जोडकर महिलाएं श्रावण के प्रत्येक सोमवार को एक अन्य उपव्रत रखती हैं।
४. शिवमुष्टि व्रत
विवाह के उपरांत पहले पांच वर्ष सुहागिनें क्रम से यह व्रत करती हैं । इसमें श्रावण के प्रत्येक सोमवार को एकभुक्त रहकर अर्थात एक ही समय भोजन कर शिवलिंग की पूजा की जाती है । शिवमुष्टि व्रतविधि शिवजी के देवालयमें जाकर की जाती है । जिन्हें देवालय में जाकर यह विधि करना संभव न हो, वे घर पर भी संकल्प कर यह पूजाविधि कर सकती हैं ।
५. शिवमुष्टि व्रत-विधि
१. भगवान शिवजी को प्रार्थना कर पूजाविधि आरंभ कीजिए ।
२. प्रथम आचमन कीजिए ।
३. उसके उपरांत संकल्प कीजिए ।
| मम श्रीशिवप्रीतिद्वारा सर्वोपद्रवनिरासपूर्वं भर्तृस्नेह-अभिवृद्धि-स्थिरसौभाग्य-पुत्रपौत्र-धनधान्य-समृद्धि-क्षेम-आयुः-सुखसंपदादि-मनोरथ-सिद्ध्यर्थं शिवमुष्टिव्रतं करिष्ये । |
इसका अर्थ है, मैं, मेरी शिव प्रीति द्वारा सर्व उपद्रवकारी द्रव्यों का विनाश कर, पति पर स्नेह की अभिवृद्धि, सौभाग्यस्थिरता, पुत्र-पौत्र-प्रपौत्र; धन, धान्य इनकी समृद्धि; क्षेम, आयु, सुख, संपत्ति इत्यादि मनोरथों की सिद्धि के लिए यह शिवमुष्टि व्रत करती हूं ।
इस संकल्पमें नवविवाहिता की व्यापक कुटुंब भावना दिखाई देती है । इससे यह स्पष्ट होता है कि सनातन हिंदु धर्म व्यक्ति पर किस प्रकार के जीवन मूल्य अंकित करता है – यही सनातन हिंदु धर्म की महानता है ।
शिवमुष्टि व्रत के आगे की पूजा विधि
१. अब ताम्रपात्रमें रखी शिवपिंडी पर चंदन चढाइए ।
२. अब शिवपिंडी पर श्वेत अक्षत चढाइए ।
३. अब शिवपिंडी पर श्वेत पुष्प चढाइए ।
४. इसके उपरांत शिवपिंडी पर बिल्वपत्र चढाइए । बिल्वपत्र को औंधे रख उसके डंठल को पिंडी की ओर कर पिंडी पर चढाइए ।
५. अब धुले हुए चावल मुष्टि में लेकर शिवपिंडी पर इस प्रकार चढाइए ।
६. शिवमुष्टि चढाने के इसी कृत्य को पांच बार दोहराइए ।
७. तदुपरांत धूप दिखाइए एवं उसके उपरांत दीप दिखाइए ।
८. अब नैवेद्य निवेदित कीजिए ।
९. अब शिवजी को कर्पूर आरती दिखाइए ।
१०. अंतमें पुनः एकबार शिवजी को भावपूर्ण प्रार्थना कीजिए ।
अभी हमने शिवमुष्टि व्रतकी विधि देखी । इसी पद्धति से पूजन कर श्रावण के प्रत्येक सोमवार को शिवपिंडी पर विशिष्ट अनाज चढाना चाहिए ।
६. शिवपिंडीपर अनाज चढाना
१. पहले सोमवार को शिवमुष्टि के लिए चावल का उपयोग करते हैं ।
२. दूसरे सोमवार को शिवमुष्टि के लिए श्वेत तिल का उपयोग करते हैं ।
३. तीसरे सोमवार की शिवमुष्टि है, मूंग
४. चौथे सोमवार को शिवमुष्टि के लिए गेहूं का उपयोग करते हैं ।
५. जिस वर्ष श्रावणमास में पांचवां सोमवार आए तो, शिवमुष्टि के लिए यवकी (जौकी) बाली अर्थात वीट विथ हस्क का उपयोग करते हैं ।
७. सोलह सोमवार व्रत
यह भगवान शिवजी से संबंधित एक फलदायी व्रत है । इस व्रत का आरंभ श्रावण के पहले सोमवार को किया जाता है । इसमें क्रमशः सोलह सोमवार को उपवास रख, सत्रहवें सोमवार को व्रत की समाप्ति करते हैं । इस व्रत में `सोलह सोमवार व्रतकथा’ का पाठ किया जाता है । इस व्रत में निर्जल उपवास रखा जाता है । जिनके लिए ऐसा करना संभव नहीं, उन्हें गेहूं, गुड एवं घी में हलवा अथवा खीर बनाकर एक बार ग्रहण करने की विधि बताई गई है । व्रत की समाप्ति के समय सोलह दंपतियों को बुलाकर भोजन कराया जाता है, तथा वस्त्र एवं दक्षिणा दी जाती है । जो यह व्रत करता है, अथवा व्रतकथा का श्रवण करता है, उसके सर्व पापों एवं दुःखों का नाश होता है तथा उसकी सर्व मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ।
८. श्रावण मास का एक अन्य प्रचलित व्रत है मंगलागौरी

इस व्रतसे संबंधित देवी मंगलागौरी हैं । मंगलागौरी सौभाग्यदात्री देवी हैं । यह नवविवाहित स्त्रियों का व्रत है । विवाह के उपरांत सुहागिनें प्रथम पांच वर्ष तक यह व्रत करती हैं। श्रावण महीने के प्रत्येक मंगलवार को यह व्रत किया जाता है । यह व्रत कुछ स्थानों पर विवाह के उपरांत प्रथम वर्ष में आने वाले श्रावण माहमें माता-पिताके घर; तथा उपरांत के चार वर्ष पति के घर किया जाता, तो कुछ स्थानों पर यह व्रत प्रथम वर्ष के श्रावण माह के प्रथम मंगलवार को माता-पिता के घर, दूसरे मंगलवार को पति के घर किया जाता है । प्रथम वर्ष का तीसरा एवं चौथा मंगलवार तथा उपरांत के चार वर्ष में आने वाले श्रावण माह के मंगलवार किसी सगेसंबंधी के घर जाकर मंगलागौरी का पूजन करते हैं । यह संभव न हो, तो अपने ही घर में यह व्रतपूजा की जाती है।
इस व्रत में शिव एवं गणपति के साथ गौरी की प्रतिमा का षोडशोपचार पूजन किया जाता है । इस व्रतमें रात को जागरण करने का भी महत्त्व बताया गया है । सुहागिनें अपनी सखियों के साथ मंगलागौरी के लिए विविध खेल खेलती हैं, साथ ही पारंपरिक गीत भी गाती हैं । प्रातःकाल गौरी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है । पांचवें वर्ष इस व्रत की समाप्ति करने का विधान है । समाप्ति करते समय ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है । इसके उपरांत उन्हें सोने के नाग की प्रतिमा एवं दक्षिणा दी जाती है । यथाशक्ति सुहागिनों को उपायन अर्थात सौभाग्य के प्रतीकस्वरूप भेंट वस्तुएं दी जाती हैं । इस व्रत में सौभाग्य द्रव्यों के साथ साडी-चोली, लड्डू एवं फल भरा ताम्रपात्र माता को उपायन में दिया जाता है ।
८ अ. पूर्ण श्रद्धा-भावके साथ मंगलागौरीका व्रतआचरण करनेसे लाभ
१. सौभाग्य अखंड बना रहता है ।
२. सौख्यसंपदा की प्राप्ति होती है ।
३. मृत्यु टलती है अर्थात आयु वृद्धि होती है ।
श्रावण महीने में आने वाले व्रतों के कारण व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर लाभ होते हैं । यह देखकर व्रतों की परिकल्पना करने वाले हमारे ऋषिमुनियों के चरणों में हमारे सिर श्रद्धा से झुक जाते हैं ।
श्रावण मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, स्वास्थ्य और आत्मिक शुद्धि से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस माह के व्रत, पर्व और परंपराएं हमें सकारात्मकता, शांति और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।
श्रावण अर्थात् श्रवण। श्रवण का अर्थ क्या है? जिस महीने में बैठ कर सब कथाएँ सुनते हैं। ईश्वर का गुणगान सुनते हैं, तो हमारे मन को विश्राम मिलता है। श्रावण मास की यही विशेषता है। और श्रावण मास में, बारिश के मौसम में लोग बाहर ज्यादा नहीं जाते हैं। सन्यासियों के लिए भी यही था। पहले संन्यासी जगह जगह घूमते थे, तो इस महीने को चातुर्मास कहा गया (चातुर्मास कहते हैं, लेकिन चातुर्मास को केवल दो महीने में ही पूर्ण कर देते हैं। पहले तो पूरा चार महीने का चातुर्मास करते थे।) एक साधु, सन्यासी, महात्मा किसी जगह पर या एक गाँव में, किसी शहर में चार महीने के लिए रुक जाते थे। जब चार महीने एक गाँव में रुकते थे, तब सारे भक्त उनके पास आते थे और उनसे ज्ञान की बातें सुनते थे। जब बारिश होती है, तो खेतों में कुछ काम भी नहीं होता है। सब प्रकृति देख लेती है। सावन के महीने में बैठ कर कथाएँ सुनो, गीत गाओ, प्रसन्न रहो।