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सत्ता के विस्तार की भाजपाई रणनीति

June 15, 2026 By Guest Author

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विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में साढ़े चार दशक में सत्ता का ऐसा सफर किसी भी राजनीतिक दल के लिए प्रेरक हो सकता है और लक्ष्य भी। 

राजकुमार सिंह

सत्ता के विस्तार की भाजपाई रणनीति | Dainik Jagran - newspaper - Read this  story on Magzter.com

सरकारों द्वारा अपने 100 दिन का भी जश्न जोर-शोर से मनाने के दौर में नरेन्द्र मोदी सरकार का 13वें वर्ष में प्रवेश बड़ी उपलब्धि है। लोकसभा में मात्र दो सीटों से शुरुआत करने वाली भाजपा के लिए यह ऐतिहासिक उपलब्धि भी है कि केंद्र में लगातार तीसरी बार उसकी सरकार होने के साथ ही 22 राज्यों में भी उसकी या उसके नेतृत्व वाले राजग की सत्ता है।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में साढ़े चार दशक में सत्ता का ऐसा सफर किसी भी राजनीतिक दल के लिए प्रेरक हो सकता है और लक्ष्य भी। भाजपा के पूर्ववर्ती जनसंघ को सीमित सत्ता-सफलताएं गैर कांग्रेसी दलों से गठबंधन में ही मिलीं। हालांकि 1980 में जनसंघ ने भाजपा के रूप में अपनी पृथक वैचारिक पहचान की राह पर लौटने का फैसला किया।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लिए उपजी सहानुभूति लहर में हुए 1984 के अपने पहले ही चुनाव में भाजपा मात्र दो लोकसभा सीटों पर सिमट गई थी। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गजों के नेतृत्व में भी भाजपा को राजनीतिक स्वीकार्यता और लोकप्रियता बढ़ाने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के आरोपों की पृष्ठभूमि में कांग्रेस विरोधी माहौल में हुए 1989 के लोकसभा चुनाव से केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार सत्तारूढ़ होने में वाम मोर्चा और भाजपा दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। राष्ट्रीय मोर्चा के मुख्य घटक जनता दल में विश्वनाथ प्रताप सिंह-देवीलाल और चंद्रशेखर के बीच सत्ता संघर्ष से ही मंडल-कमंडल के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ, जिससे कांग्रेस कमजोर होती गई और भाजपा मजबूत।

कांग्रेस की कमजोरी उसकी संगठनात्मक निष्क्रियता का भी परिणाम रही, जबकि भाजपा ने लगातार कड़ी मेहनत से ‘मंडल’ को भी ‘कमंडल’ में समाहित करते हुए जनाधार का विस्तार किया। 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर से कांग्रेस पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में केंद्र में अल्पमत सरकार बनाने में तो सफल हो गई, लेकिन पहली बार 120 सीटों के साथ भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन गई।

राव सरकार की विदाई के बाद 1996 में 161 सीटों के साथ लोकसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा पहली बार केंद्र में सरकार बनाने में सफल हुई, लेकिन विश्वासमत हासिल करने से पहले ही 13वें दिन वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। सबसे बड़े दल के विरुद्ध राजनीतिक गोलबंदी से बनी कांग्रेस की कठपुतली गठबंधन सरकारों को मतदाताओं ने जनादेश का अपमान माना और 1998 में भाजपा को 182 सीटों के साथ फिर सबसे बड़ा दल बना दिया।

विचार: सत्ता के विस्तार की भाजपाई रणनीति #BJP

इस बीच भाजपा ने अन्य दलों के साथ रिश्ते बनाते हुए राजग का भी विस्तार किया, लेकिन शह-मात के खेल में सरकार साल भर ही चल पाई। बहुचर्चित कारगिल प्रकरण के बावजूद 1999 में भाजपा की सीटें आश्चर्यजनक रूप से न बढ़ीं, न घटीं, लेकिन ‘शाइनिंग इंडिया’ की आत्ममुग्धता का शिकार होकर समय पूर्व लोकसभा चुनाव कराने से पहले वाजपेयी सरकार स्थिर ही नजर आ रही थी।

वाजपेयी सरीखे विराट राजनेता को राजनीति में ‘नौसिखिया’ बताई जा रहीं सोनिया गांधी ने गठबंधन की बिसात से 2004 के लोकसभा चुनाव में मात दे कर देश-दुनिया को चौंका दिया। खुद प्रधानमंत्री बनने के बजाय सोनिया ने मनमोहन सिंह को चुना, जिनके नेतृत्व में 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 1984 के बाद पहली बार 200 सीटों का आंकड़ा भी पार कर गई, जबकि भाजपा 138 से फिसलते हुए 116 पर जा पहुंची।

मनमोहन सरकार के पतन के बाद मोदी के नेतृत्व में चार दशक बाद पहली बार किसी दल को अपने दम पर पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और उसके बाद देश के राजनीतिक इतिहास ने एक नई करवट ली। भाजपा ने राजनीतिक रूप से अनुर्वर समझे जाने वाले राज्यों में भी अपनी सत्ता का जैसा विस्तार किया है, वह अप्रत्याशित ही कहा जाएगा। मोदी के ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के नारे की अब भी चर्चा हो ही जाती है, लेकिन भाजपा के अभूतपूर्व विस्तार में विपरीत विचारधारा वाले अन्य दलों से आए नेताओं की भी एक बड़ी भूमिका रही है, जिनमें सबसे ज्यादा संख्या कांग्रेसियों की ही है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस नेताओं का अक्सर उल्लेख करते हैं। बेशक भाजपा ने कांग्रेस, खासकर नेहरू परिवार की छवि को कमजोर कर सकने वाले हर कांग्रेसी के लिए अपने दरवाजे खोले, लेकिन खुद को मजबूत बनाने वाले कांग्रेसियों पर विशेष फोकस भी किया। परंपरागत भाजपाई एजेंडा से अप्रभावित रहे पूर्वोत्तर राज्यों में भी अगर आज भाजपा या राजग सरकारें हैं, तो उसमें उस रणनीतिक जोड़तोड़ की बड़ी भूमिका है।

भाजपा की इस दोहरी राजनीतिक रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण हिमंत बिस्वा सरमा हैं, जिन्होंने असम गण परिषद से राजनीति शुरू की और फिर कांग्रेस सरकारों में भी मंत्री रहे। गोगोई परिवार के प्रति मोह के चलते राहुल गांधी द्वारा भाव न दिए जाने पर हिमंत ने 2015 में कांग्रेस छोड़ी। लगभग पूरे पूर्वोत्तर में भाजपाई सत्ता का विस्तार करवाने के बाद उन्हें 2021 में असम का मुख्यमंत्री बनाया गया, जिनके नेतृत्व में इस बार भाजपा ने 126 में से मात्र 89 सीटों पर लड़कर 82 सीटों के साथ अकेले दम बहुमत हासिल करने का करिश्मा कर दिखाया।

दरअसल अपने लिए अनुकूल अन्य दलों के ऐसे संभावनाशील नेताओं की लंबी सूची है, जिन पर दांव लगा कर भाजपा तीन-चौथाई भारत के सत्ता सिंहासन तक पहुंची है। ‘कमल’ थाम कर सत्ता सिंहासन तक पहुंचने वाले गैर-भाजपाई मूल के सबसे नए मुख्यमंत्री बंगाल में सुवेंदु अधिकारी हैं, जबकि बिहार के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी की पृष्ठभूमि भी राजद और जदयू की है।

जातीय हिंसा के चलते मणिपुर का मुख्यमंत्री का पद छोड़ने वाले एन. बीरेन सिंह, अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा भी इसी भाजपाई रणनीति के उदाहरण हैं। बेशक भाजपा दावा करती है कि वह विचारधारा से विचलित नहीं हुई, बल्कि अन्य दलों के नेताओं ने उसकी विचारधारा को अपनाया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)


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